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    सूरए बक़रह; आयतें 215-218 (कार्यक्रम 64)

    सूरए बक़रह; आयतें 215-218 (कार्यक्रम 64)
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    सूरए बक़रह की आयत नंबर २१५ इस प्रकार है।يَسْأَلُونَكَ مَاذَا يُنْفِقُونَ قُلْ مَا أَنْفَقْتُمْ مِنْ خَيْرٍ فَلِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ بِهِ عَلِيمٌ (215)(हे पैग़म्बर) वे आपसे पूछते हैं कि भलाई के मार्ग में क्या ख़र्च करें? कह दीजिए कि माता-पिता, परिजनों, अनाथों, दरिद्रों तथा राह में रह जाने वालों के लिए तुम जो चाहे भलाई करो, और तुम भलाई का जो भी काम करते हो, निःसन्देह ईश्वर उसको जानने वाला है। (2:215) ईमान वालों की एक निशानी, जिसकी ओर पवित्र क़ुरआन की अनेक आयतों में संकेत किया गया है, वंचित लोगों पर ध्यान देना तथा उनकी सहायता करना है इसी कारण इस्लाम के उदय के समय के मुसमलानों ने पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से प्रश्न किया कि हम किस वस्तु को और कितनी मात्रा में, भलाई के मार्ग में ख़र्च करें? चूंकि भलाई के लिए वस्तु और उसकी मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती बल्कि वो हमारी संभावनाओं और दूसरे पक्ष की आवश्यकताओं पर निर्भर होती है अतः पवित्र क़ुरआन इसके उत्तर में कहता है। भलाई के मार्ग में ख़र्च करने के लिए महत्वपूर्ण बात ये है कि वस्तु लाभदायक होनी चाहिए, अब वो चाहे जो वस्तु हो और जितनी मात्रा में हो, और इस का्र्य में तुम्हें सब की ओर ध्यान रखना चाहिए। अपने बूढे मां-बाप, वंचित नातेदार और समाज के अन्य वर्गों के ज़रूरतमंद लोगों की भी सहायता करनी चाहिए। यह आयत अंत में कहती है कि केवल दान दक्षिणा ही नहीं बल्कि लोगों की भलाई के लिए तुम जो कार्य भी करते हो उससे ईश्वर परिचित है अतः तुम इस बात का प्रयास न करो कि लोग तुम्हारे भले कर्मों को जान लें बल्कि तुम छिपा कर दान देने का प्रयत्न करो जो निष्ठा के अधिक समीप है।सूरए बक़रह की आयत संख्या २१६ इस प्रकार है।كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِتَالُ وَهُوَ كُرْهٌ لَكُمْ وَعَسَى أَنْ تَكْرَهُوا شَيْئًا وَهُوَ خَيْرٌ لَكُمْ وَعَسَى أَنْ تُحِبُّوا شَيْئًا وَهُوَ شَرٌّ لَكُمْ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ (216)तुम्हारे लिए युद्ध अनिवार्य किया गया, जबकि वो तुम्हारे लिए अप्रिय है, और हो सकता है कि एक बात तुम्हें बुरी लगे परन्तु (वास्तव में) वो तुम्हारे लिए भली हो, और हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें अच्छी लगे और (वास्तव में) वह तुम्हारे लिए बुरी हो, और ईश्वर जानता है तथा तुम नहीं जानते। (2:216) ईश्वर ने धर्म की सुरक्षा के लिए शत्रुओं से जेहाद को मोमिनों के लिए अनिवार्य किया है परन्तु प्राकृतिक रूप से मनुष्य आराम व ऐश्वर्य में रुचि रखता है और युद्ध को पसंद नहीं करता जो मृत्यु, घाव और क्षति का कारण है। यह आयत कहती है कि यद्यपि शत्रु के साथ युद्ध युद्ध कठिन और अप्रिय है परन्तु तुम्हारे लोक व परलोक का कल्याण उसी पर निर्भर है। अतः तुम ईश्वरीय आदेशों के मुक़ाबले में, अपनी आंतरिक इच्छाओं के आधार पर अच्छे और बुरे का निर्धारण न करो। तुम उस बच्चे की भांति न बन जाओ जो इन्जेक्शन को नापसंद करता है जबकि उसका स्वास्थ्य और जीवन उससे संबन्धित है और वह चटपटी चीज़ों को पसंद करता है जो बीमारी में उसके लिए हानिकार हैं। इस आयत के आधार पर न हर अच्छी लगने वाली वस्तु अच्छी होती है और न हर बुरी लगने वाली वस्तु बुरी होती है।सूरए बक़रह की आयत संख्या २१७ और २१८ इस प्रकार है।يَسْأَلُونَكَ عَنِ الشَّهْرِ الْحَرَامِ قِتَالٍ فِيهِ قُلْ قِتَالٌ فِيهِ كَبِيرٌ وَصَدٌّ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ وَكُفْرٌ بِهِ وَالْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَإِخْرَاجُ أَهْلِهِ مِنْهُ أَكْبَرُ عِنْدَ اللَّهِ وَالْفِتْنَةُ أَكْبَرُ مِنَ الْقَتْلِ وَلَا يَزَالُونَ يُقَاتِلُونَكُمْ حَتَّى يَرُدُّوكُمْ عَنْ دِينِكُمْ إِنِ اسْتَطَاعُوا وَمَنْ يَرْتَدِدْ مِنْكُمْ عَنْ دِينِهِ فَيَمُتْ وَهُوَ كَافِرٌ فَأُولَئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَأُولَئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (217) إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَالَّذِينَ هَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أُولَئِكَ يَرْجُونَ رَحْمَةَ اللَّهِ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (218)(हे पैग़म्बर) यह लोग आपसे वर्जित महीने में युद्ध के बारे में प्रश्न करत हैं, कह दीजिए कि उसमें युद्ध करना बड़ा पाप है परन्तु ईश्वर के मार्ग से रोकना, उसका इन्कार करना, मस्जिदुल हराम का अनादर तथा उसमें रहने वालों को वहां से निकालना, ईश्वर की दृष्टि में युद्ध करने से भी बड़ा पाप है और दंगा फैलाना, रक्तपात से भी बढ़कर है। और (हे ईमान वालो!) जान लो कि यह अनेकेश्वरवादी सदैव तुमसे युद्ध करते रहेंगे यहां तक कि यदि उनसे हो सके तो वे तुम्हें तुम्हारे धर्म से फेर दें, और जान लो कि तुम में से जो कोई भी धर्म से पलट जाए और कुफ़्र की अवस्था में मर जाए तो लोक व परलोक में उसके कर्म नष्ट हो जाते हैं और ऐसे ही लोग नरक (में रहने) वाले हैं और सदैव उसी में रहेंगे। (2:217) निःसन्देह, जो लोग ईमान लाए और जिन्होंने हिजरत अर्थात पलायन किया और ईश्वर के मार्ग में जेहाद किया, वही ईश्वर की दया व कृपा की आशा रखते हैं और ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (2:218) जैसा कि हमने पिछले कार्यक्रमों में कहा था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के काल से अरबों में यह परंपरा थी कि वे वर्ष के ४ महीनों में युद्ध को वर्जित समझते थे, इस्लाम ने भी इस अच्छी परंपरा को स्वीकार किया और रजब, ज़ीक़ादा, ज़िलहिज्जा तथा मुहर्रम के महीनों में युद्ध को वर्जित घोषित कर दिया। इस आयत के बारे में इतिहास में आया है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने बद्र नामक युद्ध से पूर्व, आठ लोगों के एक गुट को शत्रु की स्थिति की सूचना एकत्रित करने के लिए मक्के भेजा। उन्हें मार्ग में क़ुरैश का एक कारवां मिला जिसमें मक्के के काफ़िरों का एक मुखिया भी था। पैग़म्बर के प्रतिनिधियों ने इस बात पर ध्यान दिये बिना कि वे वर्जित महीने में हैं, कारवान पर आक्रमण करके उस व्यक्ति की हत्या करके कुछ लोगों को बंदी बना लिया और कारवां के माल के साथ वे पैग़म्बरे इस्लाम के पास आए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम इस कार्य से बहुत अप्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि मैंने उनपर आक्रमण का आदेश नहीं दिया था, वह भी वर्जित महीने में। अतः उन्होंने बंदियों और कारवां के माल को स्वीकार नहीं किया और अन्य मुसलमानों ने भी उस आठ सदस्सीय गुट की आलोचना की। शत्रु ने इस परिस्थिति से ग़लत लाभ उठाते हुए कहा कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम वर्जित महीने में युद्ध, रक्तपात तथा बंदी बनाए जाने को वैध समझते हैं और मुसलमानों को इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं। शत्रुओं के इस प्रकार के प्रचारों के मुक़ाबले में ये आयत उतरी और इसने इस महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत किया कि यद्यपि वर्जित महीने में युद्ध करना पाप है परन्तु यह कार्य पैग़म्बरे इस्लाम की अनुमति के बिना किया गया जबकि तुम्हारे द्वारा मुसलमानों को यातनाएं देना और उन्हें उनके घरों से निकालना तथा ईश्वर के घर, काबे का मार्ग उनपर केवल कुछ महीनों के लिए नहीं अपितु पूरे वर्ष के लिए बंद करना, इस हत्या से कहीं बड़ा पाप है। इसके बाद यह आयत मुसलमानों को सचेत करती है कि तुम होशियार रहो और यह न सोचो कि शत्रु ने तुम्हे छोड़ दिया है। ऐसा नहीं है बल्कि वह सदैव तुम्हें तुम्हारे धर्म से विचलित करने के प्रयास में है, तो तुम जान लो कि जो कोई अपना ईमान छोड़ दे तो संसार में उसके सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं और प्रलय में भी वो नरक में जाएगा। दूसरी ओर चूंकि मुसलमानों ने कारवान पर आक्रमण किया था और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए अपना घर-बार छोड़ा और जेहाद किया था तथा उनका कोई सांसारिक उद्देश्य नहीं था, अतः ईश्वर ने उनके पाप को क्षमा कर दिया तथा २१८वीं आयत उनके क्षमा दान के बारे में भेजी।इन आयतों से मिलने वाले पाठः भले कार्यों में ज़रूरतमंद माता-पिता, परिजनों और नातेदारों को प्राथमिकता देनी चाहिए। भला कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता, चाहे दूरे उसे जानें या न जानें चाहे वो स्पष्ट रूप से किया गया हो या छिपा कर। भलाई और बुराई का मानदंड, मनुष्य की इच्छाएं नहीं बल्कि ईश्वरीय आदेश हैं जो मनुष्य के हित व उसके सौभाग्य के आधार पर निर्धारित किए गए हैं। मनुष्य का ज्ञान सीमित है जबकि ईश्वर का ज्ञान असीम है अतः हमें ईश्वरीय आदेशों के सामने नतमस्तक होना चाहिए, चाहे कुछ आदेशों का उद्देश्य और लाभ हमारी समझ में न आए या उसे करना हमारे लिए कठिन हो। हमें अपने व्यवहार और कार्यों के प्रति सचेत करना चाहिए कहीं ऐसा न हो कि शत्रु हमारी ग़लतियों को बहाना बनाकर उन्हें हमारे विरुद्ध प्रयोग करो। निर्णय लेने में सामने की बातों को नहीं बल्कि वास्तविकताओं को देखना चाहिए, घटना के मूल कारण को देखना चाहिए न कि उसके बाद की परिस्थिति को, एक उपद्रवी व षड्यंत्रकारी खुल कर किसी की हत्या नहीं करता, परन्तु उसका कार्य दंगे और अशांति का कारण बनकर कई लोगों की हत्या करा सकता है।