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    सूरए बक़रह; आयतें 219-221 (कार्यक्रम 65)

    सूरए बक़रह; आयतें 219-221 (कार्यक्रम 65)
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    सूरए बक़रह की आयत नंबर २१९ और २२० इस प्रकार है।يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْخَمْرِ وَالْمَيْسِرِ قُلْ فِيهِمَا إِثْمٌ كَبِيرٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ وَإِثْمُهُمَا أَكْبَرُ مِنْ نَفْعِهِمَا وَيَسْأَلُونَكَ مَاذَا يُنْفِقُونَ قُلِ الْعَفْوَ كَذَلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآَيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ (219) فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْيَتَامَى قُلْ إِصْلَاحٌ لَهُمْ خَيْرٌ وَإِنْ تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ وَاللَّهُ يَعْلَمُ الْمُفْسِدَ مِنَ الْمُصْلِحِ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَأَعْنَتَكُمْ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (220)(हे पैग़म्बर!) वे तुमसे शराब और जुए के बारे में पूछते हैं। कह दो कि इन दोनों में बड़ा पाप है और लोगों के लिए (यद्यपि) कुछ भौतिक लाभ भी हैं परन्तु इनका पाप इनके लाभ से कही बढ़कर है। और वे तुमसे पूछते हैं कि (भलाई के मार्ग में) क्या ख़र्च करें? कह दो कि जो तुम्हारी आवश्यकता से अधिक हो। इस प्रकार ईश्वर तुम्हारे लिए अपनी आयतें स्पष्ट करता है ताकि शायद तुम संसार और प्रलय के बारे में सोच विचार करो। (2:219) इसी प्रकार वे तुमसे अनाथों के बारे में पूछते हैं कह दो कि जिसमें उनका हित हो वही बेहतर है और यदि तुम उन्हें अपने साथ मिला लो तो वे तुम्हारे भाई ही हैं और ईश्वर बिगाड़ चाहने वाले को भला चाहने वाले से अलग पहचानता है, और यदि ईश्वर चाहता तो तुम्हें कठिनाई में डाल देता निःसन्देह वो प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (2:220) इन दो आयतों में मुसलमान अपने जीवन में सामने आने वाले तीन विषयों के बारे में पैग़म्बर से प्रश्न करते हैं और पैग़म्बर, ईश्वरीय सन्देश “वहि” के आधार पर उनका उत्तर देते हैं। इस्लाम से पूर्व अरबों की बुरी आदत शराब पीना और जुआ खेलना थी, इसी कारण कुछ मुसलमानों ने शराब व जुए के बारे में पैग़म्बर से प्रश्न किया। पैग़म्बर ने ईश्वरीय संदेश के आधार पर उत्तर दिया कि यद्यपि अंगूर लगाने तथा उससे शराब बनाकर बेचने में तुममें से कुछ लोगों के लिए आर्थिक लाभ हो या जुए में एक पक्ष को काफ़ी पैसा मिल जाए, परन्तु इन दोनों की बुराई इनके विदित फ़ायदों से कहीं बढ़कर है अतः तुम इन्हें छोड़ दो। मुसलमानों का दूसरा प्रश्न दान-दक्षिणा और दूसरों की सहायता के बारे में था कि क्या चीज़ और कितनी मात्रा में ख़र्च करनी चाहिए इसके उत्तर में भी ईश्वरीय संदेश “वहि” के आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम कहते हैं, जो भी वस्तु तुम्हारी आवश्यकता से अधिक हो उसे दान करो, न अपना पूरा माल दान कर दो कि स्वयं तुम्हें दूसरों से मांगने की आवश्यकता पड़ जाए और न दरिद्रों और वंचितों के प्रति लापरवाह रहो कि दूसरे उसी प्रकार वंचित रह जाएं बल्कि संतुलित मार्ग अपनाओ। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से किया जाने वाला एक अन्य प्रश्न अनाथों की देखभाल के संबन्ध में था, क्योंकि कुछ मुसलमानों ने इस भय से कि कहीं अनाथों का माल उनके माल से मिल न जाए, उनके भोजन और बर्तन तक को अलग कर दिया था और इस कारण उन्हें काफ़ी कठिनाई हो रही थी। पैग़म्बर ने इस प्रश्न के उत्तर में भी ईश्वरीय संदेश के आधार पर कहा कि जो बात महत्वपूर्ण है वो अनाथ के काम में अच्छाई और सुधार है, उसकी इस प्रकार देखभाल की जाए कि जिसमें उसका फ़ायदा हो न ये कि अनाथों का माल अपने माल से मिल जाने के भय से तुम उनकी देखभाल का दायित्व ही न हो या उन्हें अकेला छोड़ दो। उनके जीवन और तुम्हारे जीवन के मिलने में उस समय तक कोई रुकावट नहीं है जबतक उनका माल बर्बाद न हो, या तुम उनके माल से अनुचित लाभ न उठाओ। जान लो कि ईश्वर तुम्हारे कर्मों को देख रहा है और भला चाहने वाले तथा बुरा चाहने वाले को अलग-अलग पहचानता है। ईश्वर नहीं चाहता कि तुम कठिनाई में पड़ो इसलिए उसने अनाथों के माल को अपने माल से अलग रखने का आदेश नहीं दिया है अतः तुम लोग स्वयं इसका ध्यान रखो। सूरए बक़रह की २२१वीं आयत इस प्रकार है।وَلَا تَنْكِحُوا الْمُشْرِكَاتِ حَتَّى يُؤْمِنَّ وَلَأَمَةٌ مُؤْمِنَةٌ خَيْرٌ مِنْ مُشْرِكَةٍ وَلَوْ أَعْجَبَتْكُمْ وَلَا تُنْكِحُوا الْمُشْرِكِينَ حَتَّى يُؤْمِنُوا وَلَعَبْدٌ مُؤْمِنٌ خَيْرٌ مِنْ مُشْرِكٍ وَلَوْ أَعْجَبَكُمْ أُولَئِكَ يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ وَاللَّهُ يَدْعُو إِلَى الْجَنَّةِ وَالْمَغْفِرَةِ بِإِذْنِهِ وَيُبَيِّنُ آَيَاتِهِ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ (221)और अनेकेश्वरवादी स्त्रियों से जब तक वे ईमान न लाएं विवाह न करो, ईमान वाली एक दासी, एक अनेकेश्वरवादी महिला से बेहतर है, यद्यपि वो तुम्हें भली ही लगे। और इसी प्रकार अनेकेश्वरवादी पुरूषों से अपनी स्त्रियों का विवाह न करो जब तक कि वे ईमान न ले आएं, निःसन्देह ईमान वाला एक दास एक अनेकेश्वरवादी पुरुष से बेहतर है चाहे वो तुम्हें भला ही क्यों न लगे। ये लोग तुम्हें (नरक की) आग की ओर बुलाते हैं और ईश्वर अपनी आज्ञा से स्वर्ग तथा क्षमा की ओर बुलाता है और वह अपनी आयतों को लोगों के लिए स्पष्ट कर देता है शायद वे सचेत हो जाएं। (2:221) इस्लाम, विवाह तथा परिवार गठन के विषय को विशेष महत्व देता है और जीवन साथी के चयन के लिए उसने कुछ शर्तें रखी हैं। सबसे पहली शर्त उसका सही ईमान और उचित आस्था है क्योंकि अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि परिवार का वातावरण और माता पिता का व्यवहार बच्चों के प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खेद के साथ कहना पड़ता है कि आजकल लोगों की सामाजिक स्थिति और संपत्ति, जीवनसाथी के चयन में महत्वपूर्ण भमिका निभाती है और आध्यात्मिक मान्यताओं तथा विशेषताओं पर इस पवित्र काम में कम ही ध्यान दिया जाता है। परन्तु धर्म की दृष्टि से एक ईमान वाले दास को, जो सामाजिक दृष्टि से अत्यंत निचले स्तर पर है, ईमान न रखने वाले एक स्वतंत्र व्यक्ति पर वरीयता प्राप्त है क्योंकि इस्लाम की दृष्टि में वरीयता का मानदंड, पवित्रता तथा अच्छा चरित्र है न कि धन और पद।इन आयतों से मिलने वाले पाठः कार्य का चयन करते समय हमें अपनी आत्मा तथा मन के लिए हानिकारक कार्य नहीं चुनना चाहिए चाहे उसमें आय अधिक ही क्यों न हो। जैसाकि शराब बनाने और बेचने तथा जुए में अधिक आय होती है परन्तु पवित्र क़ुरआन ने इससे रोका है। समाज की सुरक्षा व स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए। ईश्वर ने बुद्धि को नष्ट करने वाली शराब और आर्थिक अशांति तथा द्वेष और अपराधों का कारण बनने वाले जुए को हराम कर दिया है। अपने अतिरिक्त माल में से संतुलन के साथ वंचितों की सहायता करनी चाहिए, ऐसी दशा में हमने दूसरों का जीवन भी बचाया और स्वयं भी अपव्यय नहीं किया। यदि हम ईश्वरीय आदेशों पर विचार करें तो हम समझ जाएंगे वे सभी क़ानून मनुष्य तथा समाज की भलाई के लिए बनाए गए हैं अतः उनके पालन में हमें सुस्ती नहीं करनी चाहिए। बिना अभिभावक के बच्चों को समाज में यूंही नहीं छोड़ देना चाहिए। इस्लामी समाज को ऐसे बच्चों की देखभाल तथा उनकी संपत्ति की रक्षा करनी चाहिए। विवाह का पवित्र बंधन ईमान के आधार पर बांधना चाहिए ताकि समाज को पवित्र और भली पीढ़ी दी जा सके। जीवन साथी के चयन में आध्यात्मिक मान्यताओं को दृष्टि में रखना चाहिए न कि विदित सौन्दर्य और धन संपत्ति को। हमें अपने अंत के बारे में सोचना चाहिए कि यह विवाह हमारे लिए स्वर्ग की भूमि समतल कर रहा है या नरक की।