islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए बक़रह; आयतें 222-227 (कार्यक्रम 66)

    सूरए बक़रह; आयतें 222-227 (कार्यक्रम 66)

    सूरए बक़रह; आयतें 222-227 (कार्यक्रम 66)
    Rate this post

    सूरए बक़रह की आयत नंबर २२२ और २२३ इस प्रकार है।وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْمَحِيضِ قُلْ هُوَ أَذًى فَاعْتَزِلُوا النِّسَاءَ فِي الْمَحِيضِ وَلَا تَقْرَبُوهُنَّ حَتَّى يَطْهُرْنَ فَإِذَا تَطَهَّرْنَ فَأْتُوهُنَّ مِنْ حَيْثُ أَمَرَكُمُ اللَّهُ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ التَّوَّابِينَ وَيُحِبُّ الْمُتَطَهِّرِينَ (222) نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ وَقَدِّمُوا لِأَنْفُسِكُمْ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاعْلَمُوا أَنَّكُمْ مُلَاقُوهُ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ (223)(हे पैग़म्बर) वे तुमसे महिलाओं के मासिक धर्म के बारे में पूछते हैं। कह दो कि यह यातना (का कारण) है तो इन दिनों में महिलाओं को अलग रखो और उनके समीप न जाओ यहां तक कि उनका मासिक धर्म समाप्त हो जाए और वे स्वयं को पवित्र कर लें। तो जिस प्रकार ईश्वर ने तुम्हें आदेश दिया है उनके पास जाओ, निःसन्देह ईश्वर तौबा करने वालों और पवित्र रहने वालों को पसंद करता है। (2:222) तुम्हारी स्त्रियां, तुम्हारी खेतियों के समान हैं तो तुम जब चाहो अपनी खेतियों में जाओ और भला कर्म अपने से पहले भेजो तथा ईश्वर से डरो और जान लो कि प्रलय के दिन तुम उससे मिलने वाले हो और (हे पैग़म्बर! उस दिन के लिए) ईमान वालों को शुभ सूचना दो। (2:223) विवाह का एक लक्ष्य मानव जाति को बाक़ी रखना है। इस लक्ष्य की पूर्ति में स्त्री और पुरूष दोनों का भाग है परन्तु प्रकृति ने बच्चे के प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण कर्तव्य, उसके जन्म से भी पूर्व माता को दिया है। पवित्र क़ुरआन ने अत्यंत सुन्दर शब्दों में महिला को फ़सल उगाने के लिए तैयार खेत की उपमा दी है जो पुरुष से बच्चे का बीज लेकर ९ महीनों तक अपने पूरे अस्तित्व से उसका पोषण करती है और फिर उसे एक नव अंकुरित पौधे के समान मानव समाज के बाग़ के हवाले कर देती है परन्तु इस खेत को बीच स्वीकार करने के लिए तैयारी की आवश्यकता होती है और महिलाओं का मासिक धर्म इसी तैयारी के लिए होता है। इसी कारण ईश्वर ने आदेश दिया है कि इन विशेष दिनों में महिलाओं के समीप नहीं जाना चाहिए क्योंकि यह उनके शरीर व मानस के लिए यातना व क्षति का कारण है और इन दिनों में वे संतान के लिए तैयार नहीं होती हैं। भले व पवित्र बच्चों के प्रशिक्षण तथा मानव समाज के बाग़ में सुगंधित फूल प्रस्तुत करने के विचार में रहो और जान लो कि प्रलय के न्यायालय में ईश्वर के समक्ष तुम्हें माता-पिता के रूप में अपने बच्चों के बारे में अपने उत्तरदायित्व का जवाब देना है।सूरए बक़रह की आयत संख्या २२४ और २२५ इस प्रकार है।وَلَا تَجْعَلُوا اللَّهَ عُرْضَةً لِأَيْمَانِكُمْ أَنْ تَبَرُّوا وَتَتَّقُوا وَتُصْلِحُوا بَيْنَ النَّاسِ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (224) لَا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ وَلَكِنْ يُؤَاخِذُكُمْ بِمَا كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ (225)हे ईमान वालो! ईश्वर को अपनी सौगंध के लिए निशाना न बनाओ जब तक तुम भलाई न करोगे, ईश्वर का डर रखोगे और लोगों के बीच सुधार का काम न करोगे, जान लो कि ईश्वर (सब कुछ) सुनने और जानने वाला है। (2:224) अलबत्ता ईश्वर बे सोचे-समझे खाई हुई सौगंधों पर नहीं पकड़ेगा बल्कि वो ध्यान से और सोच समझकर तुम्हारे हृदयों ने जो संकल्प किया, उसके कारण तुम्हें पकड़ेगा और ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और सहनशील है। (2:225) तफ़सीर की किताबों में लिखा है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के एक साथी की बेटी और दामाद के बीच कुछ अनबन हो गई। उन्होंने क़सम खाई कि दोनों के बीच मेल कराने के लिए वे कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। ईश्वर ने ये आयत भेजी और कहा कि लोगों के बीच सुधार करने के अपने दायित्व से बचने के लिए सौगंध न खाओ और अनुचित सौगंधों द्वारा स्वयं को भले कर्मों से वंचित न करो बल्कि मूल रूप से इस प्रकार की सौगंधों का कोई मूल्य नहीं है और इन्हें तोड़ने के कारण ईश्वर किसी को दंडित नहीं करेगा बल्कि बिना सोचे समझे होने वाली इन ग़लतियों को क्षमा कर देगासूरए बक़रह की आयत संख्या २२६ तथा २२७ इस प्रकार है।لِلَّذِينَ يُؤْلُونَ مِنْ نِسَائِهِمْ تَرَبُّصُ أَرْبَعَةِ أَشْهُرٍ فَإِنْ فَاءُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (226) وَإِنْ عَزَمُوا الطَّلَاقَ فَإِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (227)जो लोग (अपनी पत्नियों को यातना देने के उद्देश्य से) क़सम खाते हैं कि वे अपनी पत्नियों से दूर रहेंगे तो उनके पास चार महीने की मोहलत है तो यदि वे अपनी सौगंध से पलट आए तो ईश्वर क्षमाशील और दयावान है। (2:226) और यदि उन्होंने तलाक़ का निश्चय कर लिया है तो जान लो कि ईश्वर, सुनने और जानने वाला है। (2:227) इस्लाम से पूर्व अरबों की एक बुरी आदत यह थी कि वे अपनी पत्नियों को शारीरिक व मानसिक यातनाएं देने व दबाव में डालने के लिए सौगंध खाते थे कि वे अपनी पत्नियों के पास नहीं जाएंगे न उसे तलाक देकर स्वतंत्र करेंगे, न उसके लिए अच्छे पति बनेंगे। इस्लाम ने इस अप्रिय व्यवहार को रोकने के लिए घोषणा की कि जिसने भी इस प्रकार की क़सम खाई है उसके पास चार महीने की मोहलत है कि वह अपनी पत्नी के बारे में निर्णय करते, या अपनी क़सम से पलट आए और अपनी पत्नी के साथ जीवन जीवन व्यतीत करे या फिर उसे औपचारिक रूप से तलाक़ दे दे।इन आयतों से मिलने वाले पाठः इस्लाम एक व्यापक धर्म है और उसने परिवार के गठन या संतान पैदा करने सहित सभी मामलों में मनुष्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति की है। धर्म के आदेश, सृष्टि व प्रकृति से समन्वित हैं। जो कार्य स्वयं या अन्य लोगों के लिए हानिकारक हो उसे धर्म ने वर्णित किया है ताकि समाज के सदस्यों की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाया जा सके, चाहे वे पुरुष हों या महिलाएं। इस्लाम की दृष्टि में स्त्री एक बाग़ के समान है जो पति के लिए आराम का कारण भी है और अच्छी संतान तथा सुगंधित फूलों के प्रशिक्षण का साधन भी। सौगंध को भले काम में रुकावट नहीं बनाना चाहिए, ईश्वर के पवित्र नाम का सम्मान करना चाहिए तथा उसे हर तुच्छ तथा महत्वहीन काम में प्रयोग नहीं करना चाहिए। ईश्वर ही की भांति हमें भी दूसरों की उन बातों को क्षमा कर देना चाहिए जो उन्होंने क्रोध में या बिना सोचे समझे कही हैं।मानव समाजों की भलाई और सुधार के लिए ईश्वरीय पैग़म्बरों का एक कर्तव्य, ग़लत परंपराओं तथा रीति-रिवाजों को समाप्त करना है।यद्यपि घर चलाना पुरुष का दायित्व होता है परन्तु पति अपनी पत्नी से ज़बरदस्ती काम करवाने या उसे यातना देने का अधिकार नहीं रखता।तलाक़ को इस्लाम उसकी समस्त कड़वाहटों के साथ स्वीकार करता है परन्तु पत्नी को अधर में रखने को नहीं स्वीकार करता। अलबत्ता इस्लाम उस तलाक़ को स्वीकार करता है जो परिवार की भलाई में हो न कि वह तलाक़ जो स्त्री या पुरुष की अनुचित इच्छाओं के कारण हो कि ऐसी दशा में उन्हें प्रलय में जवाब देना होगा।