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    सूरए बक़रह; आयतें 233-237 (कार्यक्रम 68)

    सूरए बक़रह; आयतें 233-237 (कार्यक्रम 68)
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    सूरए बक़रह की आयत नंबर २३३ इस प्रकार है।وَالْوَالِدَاتُ يُرْضِعْنَ أَوْلَادَهُنَّ حَوْلَيْنِ كَامِلَيْنِ لِمَنْ أَرَادَ أَنْ يُتِمَّ الرَّضَاعَةَ وَعَلَى الْمَوْلُودِ لَهُ رِزْقُهُنَّ وَكِسْوَتُهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ لَا تُكَلَّفُ نَفْسٌ إِلَّا وُسْعَهَا لَا تُضَارَّ وَالِدَةٌ بِوَلَدِهَا وَلَا مَوْلُودٌ لَهُ بِوَلَدِهِ وَعَلَى الْوَارِثِ مِثْلُ ذَلِكَ فَإِنْ أَرَادَا فِصَالًا عَنْ تَرَاضٍ مِنْهُمَا وَتَشَاوُرٍ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا وَإِنْ أَرَدْتُمْ أَنْ تَسْتَرْضِعُوا أَوْلَادَكُمْ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِذَا سَلَّمْتُمْ مَا آَتَيْتُمْ بِالْمَعْرُوفِ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ (233)माताएं अपनी संतानों को पूरे दो वर्ष दूध पिलाएंगी अलबत्ता वे माताएं जो पूरी अवधि तक दूध पिलाना चाहें और इस दौरान उनके खाने और पहनने की व्यवस्था संतान के पिता पर होगी। रीति के अनुसार किसी पर भी उसकी क्षमता से बाहर का भार लादा नहीं जाता और माता-पिता को एक-दूसरे से मतभेद होने की स्थिति में भी संतान को हानि पहुंचाने का अधिकार नहीं है और पिता के न होने की स्थिति में उत्तराधिकारी के ऊपर भी यही सब कुछ है और अगर माता-पिता एक दूसरे की इच्छा और सलाह से दो वर्ष से पहले ही दूध छुड़ाना चाहें तो उन पर कोई पाप नहीं है और अगर वे अपनी संतान के लिए दूध पिलाने वाली दाई का प्रबंध करना चाहें तो भी कोई बात नहीं है। ऐसी स्थिति में कि तुम माता का अधिकार भलि-भांति चुका चुके हो। अल्लाह से डरो और जान लो कि अल्लाह हर बात से अवगत है। (2:233) प्रत्येक समाज का स्तंभ परिवार होता है। परिवार में हर प्रकार की अस्थिरता, समाज को प्रभवित करती है। आपको याद होगा कि इससे पहले के कार्यक्रम में आने वाली आयत के अन्तर्गत हमने पति-पत्नी के अलगाव पर चर्चा की थी। आजके कार्यक्रम में तलाक़ के पश्चात संतान की स्थिति के बारे में क़ुरआन के दृष्टिकोण पर चर्चा करेंगे। इस आयत में मां के दूध के महत्व और संतान से उसके स्नेह व लगाव को ध्यान में रखते हुए संतान को दो वर्षों तक दूध पिलाने की सिफ़ारिश की गयी है। यहां तक कि अगर माता-पिता एक दूसरे से अलग हो गए हों या पिता का देहांत हो गया हो तब भी माता का यह कर्तव्य है कि अपनी संतान के इस अधिकार की उपेक्षा न करे। अलबत्ता दूसरी ओर पिता का भी कर्तव्य है कि माता और संतान के लिए उचित सुविधाओं तथा खान-पान की व्यवस्था करे और हर उस काम से बचे जिससे उन्हें नुक़सान पहुंच सकता हो।इस आयत से हमें यह सीख मिलती है। संतान के अधिकारों पर ध्यान देना माता-पिता का परम कर्तव्य होता है और तलाक़ की दशा में भी संतान को माता-पिता के मतभेदों की बलि नहीं चढ़नी चाहिए। इस्लामी व्यवस्था में परिवारों की मूल आवश्यक्ताओं को पूरा करना पुरूष का कर्तव्य होता है और जीवन यापन हेतु साधर जुटाना महिला की ज़िम्मेदारी नहीं है।सूरए बक़रह की आयत संख्या २३४ इस प्रकार है।وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِي أَنْفُسِهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ (234)और जो लोग तुम में से मर जाते हैं और उनकी पत्नियां जीवित रहती हैं तो उन पत्नियों को चार महीने दस दिन तक प्रतीक्षा करनी चाहिए और जब यह अवधि समाप्त हो जाए तो फिर तुम पर कोई पाप नहीं है कि जो कुछ वह चाहें उसे उचित ढंग से करें और जान लो कि तुम जो भी करते हो अल्लाह उससे अवगत है। (2:234) तलाक़ के अतिरिक्त मृत्यु भी पति-पत्नी को अलग कर देती है। विभिन्न धर्मों और समुदायों में विधवा के प्रति अलग-अलग प्रकार के व्यवहार देखने को मिलते हैं। कुछ का विचार है कि पति की मृत्यु के पश्चात पत्नी को भी मर जाना चाहिए। कुछ लोग मृत पति के साथ जीवित पत्नी को भी जीवित गाड़ देते थे या फिर पत्नी सति हो जाती थी। इसी प्रकार कुछ अन्य समुदायों में पति के मरने के बाद पत्नी को पुनर्विवाह का अधिकार नहीं था जब कि कुछ समुदायों में पति के मरने के तुरन्त बाद पत्नी दूसरा विवाह कर सकती थी। इन असंतुलित रीति-रिवाजों के मुक़ाबले में इस्लाम ने मरने वाले पति के सम्मान को सुरक्षित रखने और महिला की गर्भावस्था के बारे में सही स्थिति स्पष्ट होने के लिए कुछ समय तक प्रतीक्षा को आवश्यक बताया है किंतु इस निर्धारित अवधि के बाद पत्नी को अधिकार होता है कि वह जिससे चाहे विवाह कर ले। पहली शादी के बाद दूसरे विवाह के लिए महिलाओं को कुंवारी युवतियों की भांति पिता या अभिभावक की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। इस्लाम एक प्राकृतिक धर्म है और प्रत्येक मनुष्य प्राकृतिक रूप से विवाह मं रुचि रखता है इसीलिए इस्लाम में न केवल यह कि इस इच्छा का विरोध नहीं किया बल्कि उसके लिए उचित और नैतिक वातावरण भी उत्पन्न किया है।हमें विवाह से पहले विवाह के गुप्त वादों, वचनों अनुचित बातों और कामों से बचना चाहिए।सूरए बक़रह की आयत संख्या २३५ इस प्रकार है।وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا عَرَّضْتُمْ بِهِ مِنْ خِطْبَةِ النِّسَاءِ أَوْ أَكْنَنْتُمْ فِي أَنْفُسِكُمْ عَلِمَ اللَّهُ أَنَّكُمْ سَتَذْكُرُونَهُنَّ وَلَكِنْ لَا تُوَاعِدُوهُنَّ سِرًّا إِلَّا أَنْ تَقُولُوا قَوْلًا مَعْرُوفًا وَلَا تَعْزِمُوا عُقْدَةَ النِّكَاحِ حَتَّى يَبْلُغَ الْكِتَابُ أَجَلَهُ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي أَنْفُسِكُمْ فَاحْذَرُوهُ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٌ (235)और तुम पर पाप नहीं है अगर तुम निर्धारित अवधि बिताने वाली महिला से सांकेतिक रूप में विवाह का प्रस्ताव रख दो और अपने मन में इरादा बना लो। अल्लाह को पता है कि तुम इसे याद रखोगे किंतु कभी भी उनसे गुप्त रूप में कोई वादा न करो। यह और बात है कि तुम उनसे अच्छी बात करो और विवाह उस समय तक न करो जब तक निर्धारित अवधि समाप्त न हो जाए तो तुम अवज्ञा से बचो और जान लो कि अल्लाह क्षमा करने और क्रोध पर नियंत्रण करने वाला है। (2:235) इससे पहले वाली आयत के बाद कि जिसमें अल्लाह, तालक़ लेने वाली अथवा विधवा महिला को मनपसंद जीवनसाथी के चयन का अधिकार देता है। आयत कहती है कि हालांकि इस निर्धारित अवधि के दौरान विवाह सही नहीं है किंतु पुरुष द्वारा इस दौरान सामाजिक रूप से विवाह का प्रस्ताव देने में इस शर्त के साथ कोई आपत्ति नहीं है कि यह प्रस्ताव सामाजिक सिद्धांतों और महिला की मानसिक स्थिति पर ध्यान देते हुए दिया जाए।सूरए बक़रह की आयत संख्या २३६ तथा २३७ इस प्रकार है।لَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِنْ طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ مَا لَمْ تَمَسُّوهُنَّ أَوْ تَفْرِضُوا لَهُنَّ فَرِيضَةً وَمَتِّعُوهُنَّ عَلَى الْمُوسِعِ قَدَرُهُ وَعَلَى الْمُقْتِرِ قَدَرُهُ مَتَاعًا بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُحْسِنِينَ (236) وَإِنْ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِنْ قَبْلِ أَنْ تَمَسُّوهُنَّ وَقَدْ فَرَضْتُمْ لَهُنَّ فَرِيضَةً فَنِصْفُ مَا فَرَضْتُمْ إِلَّا أَنْ يَعْفُونَ أَوْ يَعْفُوَ الَّذِي بِيَدِهِ عُقْدَةُ النِّكَاحِ وَأَنْ تَعْفُوا أَقْرَبُ لِلتَّقْوَى وَلَا تَنْسَوُا الْفَضْلَ بَيْنَكُمْ إِنَّ اللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ (237)अगर महिलाओं को तलाक़ दो तो अगर तुम उनके निकट नहीं गए हो या उनका मेहर निर्धारित नहीं किया है तो तुम पर कोई पाप नहीं है किंतु उन्हें कोई अच्छा सा उपहार देकर अलग करो। अलबत्ता धनवान अपने अनुसार और निर्धन अपने अनुसार कि यह अच्छा काम है। (2:236) लेकिन अगर तुमने पत्नी को निकटता से पहले और मेहर निर्धारित करने के बाद तलाक़ दिया तो निर्धारित महर का आधा भाग उन्हें देना आवश्यक है अलबत्ता अगर वे अपना अधिकार माफ़ कर दें या वह माफ़ कर दे कि जिसके अधिकार में उनका विवाह करना है तो कोई बात नहीं किंतु अगर तुम अच्छाई करो तो वह ईश्वर के निकट प्रशंसनीय है और आपस में दान व उपहार को मत भूलना और अल्लाह तुम्हारे कामों को देखने वाला है। (2:237) इन दोनों आयतों में पति की आर्थिक स्थिति पर तलाक़ के समय ध्यान देने पर बल दिया गया है और कहा जाता है कि अगर तुमने महर भी निर्धारित नहीं किया है तब भी अपनी आर्थिक स्थिति के अन्तर्गत उन्हें कोई अच्छा सा उपहार देकर अलगाव की कटुता को किसी सीमा तक कम कर दो कि यह अच्छे लोगों का तरीक़ा है। और अगर महर के रूप में कोई चीज़ निर्धारित कर दी है और पत्नी से निकटता भी की है तब पूरा महर अदा करो भले ही निकटता एक दिन ही की क्यों न हो। और अगर निकटता नहीं है तब अच्छा यही है कि मेहर की पूरी राशि अदा करो कि यह अच्छे लोगों का आचरण है और नहीं तो आधी रक़म देना आवश्यक है।इन आयतों में हमने यह बातें सीखीं। क़ुरआनी परिवार वह है जो तलाक़ की दशा में भी नैतिक सिद्धांतों और मानवीय मूल्यों को नहीं भुलाता। तलाक़ के समय दोनों पक्षों को आवश्यक अधिकारों को अदा करने के साथ ही साथ शिष्टाचार और उदारता का प्रदर्शन करना चाहिए न कि द्वेष और घृणा के साथ।