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    सूरए बक़रह; आयतें 238-244 (कार्यक्रम 69)

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    सूरए बक़रह की आयत संख्या २३८ और २३९ आयतें इस प्रकार हैं।حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ (238) فَإِنْ خِفْتُمْ فَرِجَالًا أَوْ رُكْبَانًا فَإِذَا أَمِنْتُمْ فَاذْكُرُوا اللَّهَ كَمَا عَلَّمَكُمْ مَا لَمْ تَكُونُوا تَعْلَمُونَ (239)समस्त नमाज़ों विशेषकर दिन के बीच की नमाज़ पर विशेष ध्यान दो और अल्लाह के आदेश के पालन हेतु नम्रता के साथ खड़े हो। (2:238) तो जब तुम्हें शत्रु या किसी अन्य वस्तु से ख़तरा हो तो पैदल या सवारी में नमाज़ पढ़ो और जब सुरक्षित हो जाओ तो अल्लाह को याद करो जैसाकि उसने तुम्हें उन चीज़ों की शिक्षा दी जिन्हें तुम नहीं जानते थे। (2:239) स्वस्थ और सही मनुष्य वही है जिसके शरीर और आत्मा को उचित आहार मिलता रहे। जिस प्रकार कुछ दिन हमारे शरीर में पौष्टिक आहार न पहुंचे तो हम कमज़ोर या बीमार हो जाते हैं, उसी प्रकार हमारी आत्मा भी है। आत्मा के विकास और सवास्थ्य के लिए सृष्टिकर्ता से निरंतर सम्पर्क बना रहना आवश्यक होता है इसीलिए प्रतिदिन के भोजन की भांति प्रतिदिन नमाज़ पढ़ना भी वाजिब अर्थात अनिवार्य किया गया है ताकि हमारा शरीर और हमारी आत्मा एक साथ विकसित हों और मन व आत्मा, बुराइयों से दूर रहें। इस आधार पर नमाज़ पढ़े जाने पर बल देने वाली यह आयतें हर दशा में यहां तक कि युद्ध के दौरान भी नमाज़ पढ़ने की आवश्यकता बताती है किंतु युद्ध में चूंकि पूर्णरूप और विधि-विधान के साथ यह संभव नहीं है इसलिए अल्लाह युद्ध या भय के समय यथासंभव दशा में उसे स्वीकार करता है।इन आयतों से मिलने वाले पाठः नमाज़ न केवल अपनी सुरक्षा हेतु बाधा नहीं है बल्कि इससे लड़ने वाले के उत्साह और आत्मविश्वास मे वृद्धि होती है।सूरए बक़रह की आयत संख्या २४०, २४१ तथा २४२ इस प्रकार है। وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا وَصِيَّةً لِأَزْوَاجِهِمْ مَتَاعًا إِلَى الْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍ فَإِنْ خَرَجْنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِي مَا فَعَلْنَ فِي أَنْفُسِهِنَّ مِنْ مَعْرُوفٍ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (240) وَلِلْمُطَلَّقَاتِ مَتَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ (241) كَذَلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آَيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ (242)और तुम में से जो लोग, पत्नियां छोड़कर मर जाते हैं और वसीयत कर जाते हैं कि उनकी पत्नियों को एक वर्ष तक घर से बाहर न निकाला जाए और उनका ख़र्च उठाया जाए तो अगर वे स्वयं अपनी इच्छा से घर छोड़ दें तो तुम पर कोई गुनाह नहीं है और अल्लाह प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (2:240) और तलाक पाने वाली महिलाओं के लिए भी एक लाभ है कि जो पति द्वारा दिया जाना चाहिए और यह अल्लाह से डरने वाले पुरुषों का कर्तव्य है। (2:241) और इस प्रकार अल्लाह अपनी निशानियों का तुम्हारे लिए वर्णन करता है कि शायद तुम चिंतन करो। (2:242) यह आयतें एक बार पुनः परिवार के विषय की ओर संकेत करते हुए उन महिलाओं के बारे में जो अपने पतियों से अलग हो गयी है, कुछ सिफ़ारिश करती है। आरंभ में कहा जाता है कि अगर पत्नी अपने पति के सम्मान में एक वर्ष तक पुनर्विवाह न करे और उसके घर में उसकी विधवा के रूप में रहना चाहे तो उसका ख़र्चा उचित रूप में दिया जाना चाहिए और किसी को उसके उसके मरे पति के घर से निकालने का अधिकार नहीं है। और इसी प्रकार अगर निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने के बाद वह किसी से विवाह करना चाहे तो भी कोई उसे रोकने का अधिकार नहीं रखता वह अपने लिए उपयुक्त पति के चयन में स्वतंत्र है। इसके बाद क़ुरआन में आया है ईश्वर पर विश्वास रखने वाले पुरुष, अलगाव के समय महर के अतिरिक्त कोई अच्छा सा उपहार भी अपनी पत्नियों को देते हैं ताकि उसके दुखों में थोड़ी बहुत कमी हो जाए।इन आयत से मिलने वाले पाठः इस्लाम ने परिवार मे महिलाओं के अधिकारों पर अत्यधिक ध्यान दिया है और उसके ख़र्च का यहां तक कि पति के मरने के पश्चात भी उचित प्रबंध किया है। महिला अपने लिए उचित पति के चयन में स्वतंत्र है और उसे परिवार में सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।सूरए बक़रह की आयत संख्या २४३ और २४४ इस प्रकार है।أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ خَرَجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ الْمَوْتِ فَقَالَ لَهُمُ اللَّهُ مُوتُوا ثُمَّ أَحْيَاهُمْ إِنَّ اللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ (243) وَقَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (244)क्या तुमने नहीं देखा उन हज़ारों लोगों का परिणाम जो मृत्यु के भय से अपने घर से निकल गए किंतु अल्लाह ने उनसे कहा मर जाओ तो मर गए, फिर अल्लाह ने उन्हें जीवित किया निःसन्देह, अल्लाह इसी प्रकार से लोगों पर कृपा करता है किंतु अधिकांश उसका शुक्र नहीं करते। (2:243) हे अल्लाह पर भरोसा रखने वालों, मृत्यु से डरो, उसके लिए जेहाद करो और जान लो कि अल्लाह सुनने और जानने वाला है। (2:244) यह आयतें आरंभ में उस समुदाय की दशा का वर्णन करती हैं जो अपने शत्रु के मुक़ाबले में अपने धर्म की रक्षा पर तैयार न हुआ हो और उसने मृत्यु के भय से अपना घरबार छोड़ दिया हो किंतु अल्लाह ने उन्हें यह समझाने के लिए कि मृत्यु केवल रणक्षेत्र में नहीं आती बल्कि किसी भी स्थान पर आ सकती है इसलिए उन्हें मार डाला फिर उन्हें जीवित कर दिया ताकि यह उनके बाद वालों के लिए एक चेतावनी हो जाए। उसके बाद मुसलमानों को संबोधित करके कहा जाता है कि इस कथा से पाठ सीखो और यह जान लो कि युद्ध से भागने का अर्थ मृत्यु से भागना नहीं है बल्कि यह भी संभव है कि इस भागने के कारण ईश्वरीय प्रकोप के शिकार हो जाओ।इस आयत से मिलने वाले पाठः प्रलय के समय मुर्दों को जीवित करना असंभव नहीं है। अल्लाह ने इसी संसार में कई बार मुर्दों को जीवित किया है।शायद रणक्षेत्र से भागा जा सकता हो किंतु अल्लाह के इरादे और निर्णय से भागने का कोई अर्थ नहीं है। इस्लामी जेहाद अल्लाह के धर्म की सुरक्षा के लिए है न कि देशों पर अधिकार या शक्ति प्रदर्शन के लिए।