islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए बक़रह; आयतें 245-248 (कार्यक्रम 70)

    सूरए बक़रह; आयतें 245-248 (कार्यक्रम 70)

    Rate this post

    सूरए बक़रह की २४५वीं आयत इस प्रकार है।مَنْ ذَا الَّذِي يُقْرِضُ اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا فَيُضَاعِفَهُ لَهُ أَضْعَافًا كَثِيرَةً وَاللَّهُ يَقْبِضُ وَيَبْسُطُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ (245)कौन है जो अल्लाह को ऋण देगा? एक अच्छा ऋण ताकि उल्लाह उसे उसके लिए बहुत अधिक बढ़ा दे। (अल्लाह ही आजीविका को) बढ़ाता और घटाता है और तुम उसी की ओर लौटोगे। (2:245) इससे पहले के कार्यक्रमों में हमने जिन आयतों पर चर्चा की थी वे अल्लाह पर ईमान रखने वालों को उसकी राह में जेहाद पर प्रोत्साहित करती थीं और चूंकि युद्ध में लोगों की जान के साथ धन की भी आवश्यकता होती है इसीलिए यह आयत अत्यन्त सुन्दर शब्दों में अर्थात अल्लाह को ऋण देने का विषय केवल धर्मयुद्ध तक ही सीमित नहीं होता बल्कि समाज के निर्धन लोगों की हर प्रकार की सहायता और दान उस ऋण की भांति है जो मनुष्य अल्लाह को देता है और अल्लाह उसे लोक और परलोक में कई गुना बढ़ाकर चुकाएगा क्योंकि हमारी आजीविका उसके हाथ में है और जो कुछ भी हम उस की राह में दान कर देते हैं उसका वह हिसाब करता है ताकि अवसर आने पर मनुष्य को लौटा दिया जाए।इस आयत से मिलने वाला पाठःअगर हम आजीविका को अल्लाह के हाथ में मान लें तो बड़ी सरलता से उसकी राह में दान करेंगे या कम से कम दूसरों को क़र्ज की देंगे और इस कार्य में हम किसी पर एहसान नहीं जताएंगे क्योंकि इसपर इनाम हमें ईश्वर द्वारा प्राप्त होगा।सूरए बक़रह की आयत संख्या २४६ और २४७ इस प्रकार है।أَلَمْ تَرَ إِلَى الْمَلَإِ مِنْ بَنِي إِسْرَائِيلَ مِنْ بَعْدِ مُوسَى إِذْ قَالُوا لِنَبِيٍّ لَهُمُ ابْعَثْ لَنَا مَلِكًا نُقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ قَالَ هَلْ عَسَيْتُمْ إِنْ كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِتَالُ أَلَّا تُقَاتِلُوا قَالُوا وَمَا لَنَا أَلَّا نُقَاتِلَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَقَدْ أُخْرِجْنَا مِنْ دِيَارِنَا وَأَبْنَائِنَا فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ تَوَلَّوْا إِلَّا قَلِيلًا مِنْهُمْ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ (246) وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ اللَّهَ قَدْ بَعَثَ لَكُمْ طَالُوتَ مَلِكًا قَالُوا أَنَّى يَكُونُ لَهُ الْمُلْكُ عَلَيْنَا وَنَحْنُ أَحَقُّ بِالْمُلْكِ مِنْهُ وَلَمْ يُؤْتَ سَعَةً مِنَ الْمَالِ قَالَ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَاهُ عَلَيْكُمْ وَزَادَهُ بَسْطَةً فِي الْعِلْمِ وَالْجِسْمِ وَاللَّهُ يُؤْتِي مُلْكَهُ مَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ (247)क्या तुमने बनी इस्राईल के नेताओं को नहीं देखा कि जिन्होंने मूसा के बाद अपने पैग़म्बर से कहा कि हमारे लिए एक शासक का चयन करो ताकि हम अल्लाह की राह में लड़ सकें तो पैग़म्बर ने कहा, क्या यह हो सकता है कि तुम्हें जेहाद का आदेश दिया जाए और तुम जेहाद न करो? उन्होंने कहा यह कैसे संभव है कि हम अल्लाह की राह में युद्ध न करें जबकि हमें हमारे घरों और बच्चों से दूर भगा दिया गया है। किंतु जब युद्ध उनके लिए लिख उठा तो कुछ लोगों को छोड़कर सभी ने अवज्ञा की और अल्लाह अत्याचारियों को जानता है। (2:246) और उनके पैग़म्बर ने उनसे कहा कि अल्लाह ने तालूत को तुम्हारे लिए शासक के रूप में चुन लिया है तो उन लोगों ने कहा यह कैसे संभव है जबकि हम शासन के लिए उससे बेहतर है उसके पास अधिक भी नहीं है। उनके पैग़म्बर ने उनसे कहा कि अल्लाह ने उसे तुम्हारे लिए चुन लिया और उसकी शारीरिक क्षमता और ज्ञान में वृद्धि कर दी है और अल्लाह जिसे चाहता है राजपाट देता है और अल्लाह अधिक देने और जानने वाला है। (2:247) बनी इस्राईल, पैग़म्बर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद धन-दौलत और पेट पर अधिक ध्यान देने वाले होने के कारण एक बार पुनः अत्याचारी शासके के अधीन हो गए और अपनी भूमि से हाथ धो बैठे यहां तक कि उनके एक गुट ने इस दशा से छुटकारे और स्वतंत्रता हेतु युद्ध का निर्णय किया यही कारण था कि उन्होंने अपने काल के पैग़म्बर से मांग की थी कि वह उनके लिए एक सेनापति का चयन करें ताकि वह उसके नेतृत्व में क्रूर शासक से युद्ध कर सकें हालांकि पैग़म्बर को बनी इस्राईल के अतीत को देखते हुए ज्ञात था कि युद्ध इस समुदाय के बस की बात नहीं है किंतु उनके पास कोई बहाना न रहे इसलिए तालूत नामक एक निर्धन चरवाहे को उनका सेनापति नियुक्त कर दिया किंतु बनी इस्राईल को आशा थी कि उनके समुदाय का कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति ही सेनापति के पद के लिए चुना जाएगा। इसलिए उन्होंने तालूत के नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया बल्कि यह दावा किया कि हम उससे अधिक योग्य हैं हालांकि युद्ध के लिए शक्तिशाली भुजाओं और अच्छी रणनीति की आवश्यकता होती है। यह विशेषताएं तालूत में उन सबसे अधिक थीं और यही कारण था कि अल्लाह ने तालूत को इस पद के लिए चुना था।इन आयतों से मिलने वाले पाठः अपने परिवार या देश के लिए युद्ध, एक प्रकार का अल्लाह की राह में किया जाने वाला धर्मयुद्ध होता है। धर्म राजनीति से अलग नहीं है। इतिहास में बहुत से ईश्वरीय दूतों ने प्रजा को क्रूर शासकों से छुटकारा दिलाने और अच्छे लोगों को शासक बनाने के लिए बहुत प्रयास किये हैं।किसी भी पद के लिए सही मानदंड उस काम को करने के लिए शारीरिक और बौद्धिक क्षमता होती है न कि धन और ख्याति की।सूरए बक़रह की आयत संख्या २४८ इस प्रकार है।وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ آَيَةَ مُلْكِهِ أَنْ يَأْتِيَكُمُ التَّابُوتُ فِيهِ سَكِينَةٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَبَقِيَّةٌ مِمَّا تَرَكَ آَلُ مُوسَى وَآَلُ هَارُونَ تَحْمِلُهُ الْمَلَائِكَةُ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَةً لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (248)उनके पैग़म्बर ने उनसे कहा कि इस युवक के नेतृत्व का चिन्ह यह है कि पवित्र संदूक़ तुम्हारे पास लौट आएगा ऐसी स्थिति में कि देवदूत उसे उठाए होंगे और वह सन्दूक़ तुम्हारे ईश्वर की ओर से तुम्हारे लिए शांति एवं मूसा व हारून के परिवार की बची हुई धरोहर है, और यही तुम्हारे लिए स्पष्ट प्रमाण है अगर तुम्हें अल्लाह पर भरोसा है। (2:248) जब बनी इस्राईल की हठधर्म जाति ने अपने पैग़म्बर की बात नहीं मानी तो उन्होंने कहा कि अल्लाह बनी इस्राईल का पवित्र संदूक़ तालूत द्वारा तुम्हें लौटा देगा। यह संदूक़ वही था जिसमे हज़रत मूसा की माता ने अपने नवजात शिशु को रखकर नील नदी में डाल दिया था और इस प्रकार हज़रत मूसा को फ़िरऔन के सैनिकों से छुटकारा मिला किंतु जब यह संदूक़ फ़िरऔन को प्राप्त हुआ तो फ़िरऔन और उसकी पत्नी के हृदय में इस शिशु के प्रति स्नेह उमड़ पड़ा और उन्होंने हज़रत मूसा को अपना बेटा बना लिया। इस संदूक़ को फ़िरऔन के दरबार में सुरक्षित रखा गया था और जब हज़रत मूसा को ईश्वरीय संदेश पहुंचाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई तो आपने तौरेत की रख्तियों को उसमें रखा और मृत्यु के समय अपने कवच और अन्य सामग्रियों को उसी में रख दिया और अपने अनुयाइयों के हवाले कर दिया। इस संदूक़ को बनी इस्राईल पवित्र मानते थे और युद्ध के समय उसे सेना के आगे-आगे लेकर चलते थे ताकि इससे सैनिकों का उत्साह बढ़े किंतु यह संदूक़ शत्रुओं के हाथों लग गया जिससे बनी इस्राईल बहुत दुखी हुए। तालूत के काल में ईश्वरीय सहायता द्वारा यह संदूक़ बनी इस्राईल के पास वापिस आ गया।इस आयत से हमने सीखा कि अपने देश के लिए प्राणों की आहूति देने में असमंजस का शिकार नहीं होना चाहिए और नेताओं के चयन में लोगों की नैतिकता व योग्यता पर ध्यान देना चाहिए न कि उनकी ख्याति और धन दौलत पर।