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    सूरए बक़रह; आयतें 249-252 (कार्यक्रम 71)

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    पहले सूरए बक़रह की २४९वीं आयत इस प्रकार है।فَلَمَّا فَصَلَ طَالُوتُ بِالْجُنُودِ قَالَ إِنَّ اللَّهَ مُبْتَلِيكُمْ بِنَهَرٍ فَمَنْ شَرِبَ مِنْهُ فَلَيْسَ مِنِّي وَمَنْ لَمْ يَطْعَمْهُ فَإِنَّهُ مِنِّي إِلَّا مَنِ اغْتَرَفَ غُرْفَةً بِيَدِهِ فَشَرِبُوا مِنْهُ إِلَّا قَلِيلًا مِنْهُمْ فَلَمَّا جَاوَزَهُ هُوَ وَالَّذِينَ آَمَنُوا مَعَهُ قَالُوا لَا طَاقَةَ لَنَا الْيَوْمَ بِجَالُوتَ وَجُنُودِهِ قَالَ الَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُمْ مُلَاقُو اللَّهِ كَمْ مِنْ فِئَةٍ قَلِيلَةٍ غَلَبَتْ فِئَةً كَثِيرَةً بِإِذْنِ اللَّهِ وَاللَّهُ مَعَ الصَّابِرِينَ (249)और जब तालूत सेना को लेकर बाहर निकले तो उनसे कहा, अल्लाह तुम्हारी परीक्षा एक पानी से भरी हुई नहर से परीक्षा लेगा। जिसने भी उसका पानी पी लिया वह हममें से नहीं होगा और जो उसका पानी नहीं पियेगा वह हममें से है सिवाए उसके कि जो एक चुल्लू पानी पी ले। कुछ को छोड़कर सभी ने उसका पानी पी लिया। अतः जब वह और अल्लाह पर ईमान रखने वाले उनके साथी उस नहर से गुज़रे तो उन्होंने कहा कि आज हममें जालूत और उसकी सेना से मुक़ाबले की शक्ति नहीं है किंतु जिन्हें अल्लाह से भेंट का विश्वास था उन्होंने कहा कि कितने ऐसे छोटे गुट हैं जिन्होंने अल्लाह के आदेश से बड़े गुटों को हरा दिया और अल्लाह धैर्य करने वालों के साथ है। (2:249) इससे पहले के कार्यक्रम में हमने कहा था कि जब अल्लाह ने तालूत को बनी इस्राईल के सेनापति के रूप में चुना तो उस समुदाय के बड़े लोगों ने उसके नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया और वे युद्ध से बचने के लिए बहाने पेश करने लगे। दूसरे चरण में, जिस गुट ने तालूत के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था, वह तालूत के साथ नगर के बाहर गया किंतु तालूत ने उनकी वफ़ादारी देखने के लिए एक नहर का सहारा लिया और कहा कि मेरे सच्चे साथी वे लोग हैं जो प्यास के बावजूद जी भरकर पानी न पियें। मात्र एक चुल्लू पानी पीकर ही संतोष कर लें। इस आयत में आया है कि इस परीक्षा में भी एक गुट ने पानी देखते ही नियंत्रण खो दिया उसके बाद जब शत्रु से लड़ने की बारी आई तो वे बौखला गए और जालूत की सेना से लड़ने में अपनी अक्षमता प्रकट करने लगे और केवल सच्चे साथी ही, कि अल्लाह ने जिनके दिलों को मज़बूत किया था अपनी जगह पर डटे रहे और शत्रु की भारी संख्या से भयभीत नहीं हुए।इस आयत से मिलने वाले पाठःखाने-पीने की वस्तुएं भी ईश्वरीय परीक्षाओं में से हैं। न केवल हराम अर्थात वर्जित बल्कि कभी-कभी हलाल अर्थात वैध चीज़ों से भी दूरी करनी होती है।प्रलय और अल्लाह के वचनों पर विश्वास, कठिनाइयों के समय मनुष्य की सहनशीलता को बढ़ा देता है।संघर्ष में दृढ़ता और उसे जारी रखने को बहुत महत्व प्राप्त है। तालूत और जालूत के क़िस्से में अत्याचारी के विरुद्ध युद्ध का नारा लगाने वाले तो बहुत थे किंतु शत्रु के आगे डट जाने वालों की संख्या बहुत ही कम थी।सूरए बक़रह की आयत संख्या २५० इस प्रकार है।وَلَمَّا بَرَزُوا لِجَالُوتَ وَجُنُودِهِ قَالُوا رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ (250)सच्चे लोग जब जालूत और उसके सैनिकों के सामने आए तो कहा हे ईश्वर, हम पर धैर्य और दृढ़ता उतार और पैरों को जमा दे। हमें काफ़िरों पर विजय प्रदान कर। (2:250) जैसा कि हमने कहा कि बनी इस्राईल, जालूत की सेना को देखते ही डर गए और केवल तालूत के सच्चे साथी ही उनसे लड़ने पर तैयार हो सके किंतु उन्हें भी पता था कि ईश्वरीय सहायता के बिना इतनी बड़ी और शक्तिशाली सेना से जीतना संभव नहीं है इसीलिए उन्होंने अल्लाह से प्रार्थना की थी कि वह उन्हें शत्रु के सामने डटे रहने में सहायता करे।इस आयत से मिलने वाले पाठःप्रार्थना या दुआ संघर्ष और प्रयास के साथ ही उपयोगी होती है। ऐसा नहीं है कि दुआ को काम या प्रयास का स्थान दे दिया जाए। तालूत के साथी पहले रणक्षेत्र में आए उसके बाद उन्होंने विजय की दुआ की।ईमान वालों का लक्ष्य, सत्य की असत्यता पर विजय होता है न कि किसी जाति या समुदाय की अन्य पर श्रेष्ठता। इसीलिए तालूत के साथियों ने ईश्वर के न मानने वालों के सामने अपनी विजय की प्रार्थना की थी।सूरए बक़रह की आयत संख्या २५२-२५३ इस प्रकार है।فَهَزَمُوهُمْ بِإِذْنِ اللَّهِ وَقَتَلَ دَاوُودُ جَالُوتَ وَآَتَاهُ اللَّهُ الْمُلْكَ وَالْحِكْمَةَ وَعَلَّمَهُ مِمَّا يَشَاءُ وَلَوْلَا دَفْعُ اللَّهِ النَّاسَ بَعْضَهُمْ بِبَعْضٍ لَفَسَدَتِ الْأَرْضُ وَلَكِنَّ اللَّهَ ذُو فَضْلٍ عَلَى الْعَالَمِينَ (251) تِلْكَ آَيَاتُ اللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّكَ لَمِنَ الْمُرْسَلِينَ (252)फिर अल्लाह की इच्छा से तालूत और उसके साथियों ने शत्रु की सेना को पराजित कर दिया और दाऊद ने जो तालूत की सेना में से थे, जालूत को मार दिया तो अल्लाह ने उन्हें ज्ञान व शासन प्रदान किया और जो चाहा उन्हें सिखाया। अगर अल्लाह कुछ लोगों की कुछ अन्य लोगों द्वारा सुरक्षा न करे तो पृथ्वी नष्ट हो जाएगी। किंतु अल्लाह, संसार वासियों पर उपकार और कृपा करने वाला है। (2:251) हे पैग़म्बर! यह अल्लाह की आयते हैं कि जिन्हें सत्य के साथ तुम्हारे लिए पढ़ते हैं और निःसन्देह तुम ईश्वरीय पैग़म्बर हो। (2:252) अंततः सत्यवादियों के संघर्ष और ईश्वरीय सहायता से यह छोटा सा गुट उस बड़ी सेना से जीतने में सफल हो गया और दाउद नामक कम आयु का एक साहसी नवयुवक जिसे ईश्वर पर विश्वास था, शत्रु के सेनापति को मारने में सफल हो गया। ईश्वर ने उस नवयुवक की वीरता पर उसे नुबुव्वत अर्थात प्रथ्वी पर ईश्वरीय दूत का पद प्रदान कर दिया और उसे ज्ञान व बुद्धि की और हज़रत सुलैमान पैग़म्बर जैसा बेटा देकर उन्हें अत्यधिक सम्मानित किया पांच आयतों में वर्णन की गयी यह कथा प्रोत्साहन और उन मुसलमानों को चेतावनी देती है जो इस्लाम के आरंभ में मक्के से निकलने पर विवश हो गए थे। उनके पास साधन नहीं थे और दूसरी और मक्के के नास्तिक कहते थे कि मुहम्मद हमसे किस मामले में श्रेष्ठ हैं कि हमारे पैग़म्बर हों जबकि मक्के में बहुत से प्रतिष्ठित और धनवान लोग मौजूद हैं।इस आयत से मिलने वाले पाठःजब तक कोई अपने आप से कोई योग्यता नहीं दिखाता उस समय तक वह ईश्वर की विशेष कृपा का पात्र नहीं बनता। अल्लाह के मार्ग में जेहाद करने से दाऊद को पैग़म्बरी का सम्मानीय पद मिला।अगर शत्रुओं से युद्ध कर्तव्य न होता तो फिर संसार में बुराइयां ही बुराइयां होतीं।इस घटना से हमें ज्ञात हुआ कि सही और योग्य नेता, सच्चे साथी, अल्लाह पर भरोसा, धैर्य, मनोबल तथा युद्ध में ईश्वरीय भावना जैसे विशेषताएं, सफलता के कारक होते हैं।