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    सूरए बक़रह; आयतें 253-255 (कार्यक्रम 72)

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    सूरए बक़रह की २५३वीं आयत इस प्रकार है।تِلْكَ الرُّسُلُ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَى بَعْضٍ مِنْهُمْ مَنْ كَلَّمَ اللَّهُ وَرَفَعَ بَعْضَهُمْ دَرَجَاتٍ وَآَتَيْنَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنَاتِ وَأَيَّدْنَاهُ بِرُوحِ الْقُدُسِ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا اقْتَتَلَ الَّذِينَ مِنْ بَعْدِهِمْ مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ وَلَكِنِ اخْتَلَفُوا فَمِنْهُمْ مَنْ آَمَنَ وَمِنْهُمْ مَنْ كَفَرَ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا اقْتَتَلُوا وَلَكِنَّ اللَّهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيدُ (253)उन पैग़म्बरों में से कुछ को हमने कुछ पर श्रेष्ठता प्रदान की। उनमें से कुछ ऐसे थे जिनसे अल्लाह ने बात की और अल्लाह ने उनमें से कुछ को उच्चतम स्थान प्रदान किया। और हमने मरियम के बेटे ईसा को स्पष्ट निशानियां दीं और उसकी रूहुलक़ुदस द्वारा पुष्टि की और अगर अल्लाह चाहता तो इन दूतों और उनके साथ आने वाले चिन्हों के बाद लोग आपस में न लड़ते किंतु उनमें मतभेद उत्पन्न हो गया तो कुछ लोग पैग़म्बरों पर ईमान ले आए आर कुछ लोगों ने उनका इन्कार कर दिया और यदि ईश्वर चाहता तो वे लोग आपस में झगड़ा न करते परन्तु अल्लाह जो चाहता है करता है। (2:253) इससे पहले वाली आयत में यह संकेत किया गया था कि अल्लाह ने हज़रत दाऊद को असीम बुद्धि और राज प्रदान किया था। इस आयत में ईश्वर के पैग़म्बरों के स्थानों की भिन्नता का उल्लेख किया गया है। अल्लाह के समस्त पैग़म्बर, समान पदों पर आसीन नहीं थे बल्कि कुछ को कुछ अन्य पर श्रेष्ठता प्राप्त थी। जैसा कि हज़रत मूसा ने बिना किसी मध्यस्थ के सीधे ईश्वर से बात की और हज़रत ईसा की सहायता हेतु हज़रत जिब्रईल रहते थे। जिब्रईल, ईश्वर के एक विशेष फ़रिश्ते का नाम है जिन्हें रूहुलक़ुदस भी कहा जाता है। इसके बाद अल्लाह लोगों के बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है कि लोग अपने मार्ग के चयन के लिए स्वतंत्र हैं। चाहे अल्लाह पर विश्वास रखें या उसके अस्तित्व का इन्कार करें। अल्लाह किसी भी मनुष्य पर ज़बरदस्ती नहीं करता। लोग चाहें तो इन ईश्वरीय दूतों को माने और चाहे न मानें। निःसन्देह, अगर अल्लाह चाहता तो लोगों में मतभेद न उत्पन्न होने देता और सबको बलपूर्वक एक ही रास्ते पर लगा देता किंतु अल्लाह की शैली यह है कि लोग किसी धर्म को स्वीकार करने या न करने के बारे में स्वयं निर्णय लें।इस आयत से मिलने वाले पाठःधर्म का सिद्धांत यह है कि उसे स्वेच्छा से स्वीकार किया जाए। इस आधार पर लोगों में मतभेद स्वाभाविक है।अल्लाह ने सदैव ही अपने दूतों को अपने चिन्हों के साथ भेजा है। कुछ लोगों द्वारा इन्हें स्वीकार न किये जाने का कारण कभी अनभिज्ञता तो कभी अपनी इच्छाओं की दासता होती है।सूरए बक़रह की आयत संख्या २५४ इस प्रकार है।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا أَنْفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاكُمْ مِنْ قَبْلِ أَنْ يَأْتِيَ يَوْمٌ لَا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خُلَّةٌ وَلَا شَفَاعَةٌ وَالْكَافِرُونَ هُمُ الظَّالِمُونَ (254)हे ईमान वालो! हमने तुम्हें जो आजीविका दी है उसमें से दान करो इससे पहले कि वह दिन आ पहुंचे जिसमें न ख़रीदना होगा न बेचना और न ही उस दिन कोई मित्रता या रिश्तेदारी काम आएगी और इन्कार करने वाले ही अत्याचारी हैं। (2:254) यह आयत ईश्वर पर विश्वास रखने वालों के लिए चेतावनी है कि अवसर को अच्छा समझते हुए जब तक संसार में हैं, प्रलय के लिए कुछ प्रबंध कर लें। यहां पर अल्लाह के साथ व्यापार कर लें और अपने धन में से दूसरों को दान करें क्योंकि प्रलय के दिन लेन-देन नहीं होगा। यहां से वहां के लिए कुछ भेज दो ताकि दंड से बच सको अपने मित्रों और बड़ों के भरोसे न रहो कि वहां कोई काम नहीं आएगाइस आयत से मिलने वाले पाठःजो कुछ तुम्हारे पास है वह तुम्हारा नहीं है। उसे हमने तुम्हें प्रदान किया है। हमने कहा है कि धन का थोड़ा सा भाग दान करो न कि सारा धन।यह दान परलोक में तुम्हारे हर मित्र और सगे संबन्धी से अच्छा सिद्ध होगा।सूरए बक़रह की आयत संख्या २५५ इस प्रकार है।اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ مَنْ ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَلَا يَئُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ (255)अल्लाह के अतिरिक्त कोई भी पूज्य नहीं है। वह जीवित और सदैव रहने वाला है। उसे न नींद आती है न ही झपकी। जो कुछ भी पृथ्वी और आकाशों में है उसी का है। कौन है जो उसके आदेश के बिना किसी की सिफ़ारिश कर सकता है। वह जानता है कि उनके सामने क्या है और उनके पहले क्या था किंतु किसी को भी उसके ज्ञान के साधारण से भाग का भी पता नहीं लग सकता सिवाए उतने के कि जितना वह चाहे। उसने पृथ्वी और आकाशों को घेर रखा है और उसे संभालना उसके लिए कठिन नहीं है। वह महान एवं उच्च है। (2:255) इस आयत को आयतलकुर्सी कहते हैं। यह आयत हर दृष्टि से ईश्वर के एक व अनन्य होने को दर्शाती है। एकेश्वरवाद, सभी ईश्वरीय धर्मों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। एकेश्वरवाद मनुष्य को विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की उपासना से बचाता है। एकेश्वरवाद स्वतंत्रता का मार्ग है और अत्याचारी शासकों से स्वतंत्रता का नाम है। इसकी सहायता से मनुष्य सफलता तक पहुंच जाता है। “ला इलाहा इल्लल्लाह” से प्रत्येक मुसलमान के कान परिचित होते हैं। हर रोज़ पांच बार अज़ान के समय वह इसे सुनता है। “ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ है उसके अतिरिक्त किसी में भी पूज्य होने की योग्यता ही नहीं है। समस्त अच्छी विशेषताएं उससे हैं और उसी ने अच्छों को अच्छाई का अत्यन्त साधारण भाग दान दे दिया है। तो फिर हम उसकी उपासना क्यों न करें जो समस्त अच्छाइयों और भलाइयों का स्रोत है। वास्तविक जीवन तो उसी के पास है जो ईश्वर है। उसके सिवा सब कुछ नश्वर है। केवल वही है जो किसी पर निर्भर नहीं है और उसके अतिरिक्त जो कुछ भी है उसी की ओर हाथ पसारे है। वह कभी भी नींद, झपकी या निर्बलता का शिकार नहीं होता क्योंकि अगर वह एक क्षण के लिए भी इस संसार को अपने हाल पर छोड़ दे तो कुछ भी बाक़ी नहीं बचेगा। ब्रह्माण्ड का स्वामी वही है। सबकुछ उसी की संपत्ति है। जब सब ही उसके दास हैं तो फिर क्यों एक दास दूसरे दास की उपासना करे? क्यों न हम अपने रचयिता और स्वामी की उपासना करें? इस आयत के अंत में कुर्सी शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ होता है सिंहासन। यह इसलिए है ताकि हमें पता चल जाए कि अल्लाह मात्र स्वामी ही नहीं अन्यथा इस ब्रह्माण्ड पर शासन करने वाला भी है और कोई भी वस्तु या जीव उसकी इच्छा और शक्ति से दूर नहीं है।इस आयत से मिलने वाला पाठःहमें ऐसे ईश्वर की उपासना करनी चाहिए जो ज्ञान, शक्ति और स्नेह सरीखी समस्त विशेषताओं का स्वामी है और हर प्रकार की कमी या कमज़ोरी से दूर है।