islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए बक़रह; आयतें 256-259 (कार्यक्रम 73)

    सूरए बक़रह; आयतें 256-259 (कार्यक्रम 73)

    Rate this post

    सूरए बक़रह की २५६वीं और २५७वीं आयतें इस प्रकार हैं।لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ قَدْ تَبَيَّنَ الرُّشْدُ مِنَ الْغَيِّ فَمَنْ يَكْفُرْ بِالطَّاغُوتِ وَيُؤْمِنْ بِاللَّهِ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقَى لَا انْفِصَامَ لَهَا وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (256) اللَّهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آَمَنُوا يُخْرِجُهُمْ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ وَالَّذِينَ كَفَرُوا أَوْلِيَاؤُهُمُ الطَّاغُوتُ يُخْرِجُونَهُمْ مِنَ النُّورِ إِلَى الظُّلُمَاتِ أُولَئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (257)धर्म (स्वीकार करने) में ज़बरदस्ती नहीं है क्योंकि सही मार्ग, पथभ्रष्टता से अलग व स्पष्ट है तो अब जो भी ताग़ूत अर्थात झूठे ख़ुदाओं का इन्कार करे और अल्लाह पर ईमान लाए निश्चित रूप से उसने मज़बूत रस्सी को पकड़ लिया है जिससे अलगाव नहीं है और अल्लाह सुनने तथा जानने वाला है। (2:256) अल्लाह विश्वास रखने वालों का स्वामी है और उन्हें अंधकारों से प्रकाश की ओर ले जाता है और इन्कार करने वालों के स्वामी झूठे ख़ुदा होते हैं जो उन्हें प्रकाश से निकाल कर अंधकार में ढकेल देते हैं। वे नरक वाले हैं जहां वे सदैव रहेंगे। (2:257) ईमान या धर्मविश्वास मन की एक ऐसी क्रिया है जो बलपूर्वक नहीं करवाई जा सकती बल्कि तर्क, उपदेश और शिष्टाचार वह तत्व हैं जो किसी भी व्यक्ति को किसी धर्म के अधीन कर देते हैं। अल्लाह ने मनुष्य के विकास और उसकी परिपूर्णता के लिए एक ओर तो पैग़म्बरों और आसमानी किताबों को भेजा ताकि मनुष्य को सही और ग़लत मार्ग की पहचान हो जाए और दूसरी ओर उसे यह अधिकार दिया कि वह जिसका चाहे चयन करे। यही कारण है कि ईश्वरीय दूतों ने भी किसी को ईमान लाने पर विवश नहीं किया क्योंकि ज़बरदस्ती के ईमान और विश्वास का कोई महत्व नहीं होता। अब अगर कोई पापी और अत्याचारी की अधीनता से निकल कर केवल अल्लाह का दास बन जाए तो वह ईश्वर के स्वामित्व में चला जाता है और ईश्वर स्वयं उसके मामलों की देखरेख करता है कुछ इस प्रकार कि जीवन के हर मोड़ पर सदैव उसका सत्य की ओर मार्गदर्शन करता है और उसे विभिन्न ख़तरों से सुरक्षित रखता है। किंतु दूसरी और यदि कोई ईश्वर को छोड़कर किसी अन्य से आशा बांधे और उसपर भरोसा करे तो उसे जान लेना चाहिए कि उसने अपने आप को अंधकार के हवाले कर दिया है और वह लोग प्रकाश का कोई छोटा सा झरोखा भी उसके लिए नहीं छोड़ेंगे।इस आयत से मिलने वाले पाठःउस धर्म का महत्व होता है जो जानकारी और पहचान पर आधारित हो तथा जिसे स्वंतत्रता एवं स्वेच्छा से ग्रहण किया गया हो।सत्य का मार्ग प्रकाश है जो मार्गदर्शन, आशा और शांति का कारण होता है किंतु असत्य का मार्ग अंधकार है कि जो पथभ्रष्टता, अज्ञानता और व्याकुलता का कारण बनता है।सूरए बक़रह की २५८वीं आयत इस प्रकार है।أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِي حَاجَّ إِبْرَاهِيمَ فِي رَبِّهِ أَنْ آَتَاهُ اللَّهُ الْمُلْكَ إِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّيَ الَّذِي يُحْيِي وَيُمِيتُ قَالَ أَنَا أُحْيِي وَأُمِيتُ قَالَ إِبْرَاهِيمُ فَإِنَّ اللَّهَ يَأْتِي بِالشَّمْسِ مِنَ الْمَشْرِقِ فَأْتِ بِهَا مِنَ الْمَغْرِبِ فَبُهِتَ الَّذِي كَفَرَ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ (258)हे पैग़म्बर! क्या तुमने नहीं देखा कि उसने ईश्वर द्वारा प्रदान किये गए राजपाट के बल पर किस प्रकार पैग़म्बर इब्राहीम से अपने स्वामी के बारे में बहस की। जब इब्राहीम ने उससे कहा कि मेरा ईश्वर वह है जो जीवित करता और मारता है तो उसने कहा कि मैं भी जीवित करता हूं और मारता हूं। इब्राहीम ने कहा कि मेरा ईश्वर वह है जो सूर्य को पूरब से निकालता है तो तू उसे पश्चिम से निकाल कर दिखा। वह नास्तिक अवाक रह गया और अल्लाह अत्याचारियों का मार्गदर्शन नहीं करता। (2:258) जैसा कि इतिहास में आया है कि नमरूद, इराक़ के बाबिल क्षेत्र का शासक था जो ईश्वर होने का दावा करता और लोगों को अपना दास समझता था। जब उसे पता चला कि हज़रत इब्राहीम लोगों को एक ईश्वर की ओर बुला रहे हैं तो वो उनसे बहस करने लगा और उसने उनसे कहा, जो काम भी तुम्हारा ईश्वर करेगा मैं भी उसे करके दिखाऊंगा। हज़रत इब्राहीम ने आरंभ में मनुष्य की मृत्यु और जीवन की ओर संकेत किया कि यह चीज़ ईश्वर के हाथ में है। नमरूद ने आदेश दिया कि दो क़ैदियों को लाया जाए उसमें से एक को उसने स्वतंत्र कर दिया और दूसरे की गर्दन उड़ाने का आदेश दिया और फिर कहा कि मैं भी जिसे चाहूं जीवित रखूं और जिसे चाहूं मार दूं। हालांकि उसकी यह बात तर्कहीन थी किंतु फिर भी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने सूरज के पूरब से निकलने की बात कही और उससे पूछा कि क्या तू पश्चिम से सूर्य निकाल सकता है? इस बात का नमरूद के पास कोई उत्तर नहीं था किंतु इसके बावजूद उसने सत्यता को स्वीकार नहीं किया और जैसा कि आगामी आयतों में उल्लेख हुआ है नमरूद ने आदेश दिया कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आग में जला दिया जाए।इस आयत से मिलने वाले पाठः अगर किसी व्यक्ति में योग्यता नहीं होती और इसके बावजूद वह किसी पर पर पहुंच जाता है तो स्वयं को ईश्वर का दास समझने के बजाए स्वयं को ही परमात्मा बताने लगता है और घमण्ड में डूब जाता है।ईश्वरीय दूत लोगों को तर्क के आधार पर ही धर्म की ओर बुलाया करते थे किंतु असत्य के पुजारी तर्कहीन बातों के सिवा कुछ नही कर पाते थे।सूरए बक़रह की २५९वीं आयत इस प्रकार है।أَوْ كَالَّذِي مَرَّ عَلَى قَرْيَةٍ وَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَى عُرُوشِهَا قَالَ أَنَّى يُحْيِي هَذِهِ اللَّهُ بَعْدَ مَوْتِهَا فَأَمَاتَهُ اللَّهُ مِئَةَ عَامٍ ثُمَّ بَعَثَهُ قَالَ كَمْ لَبِثْتَ قَالَ لَبِثْتُ يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ قَالَ بَلْ لَبِثْتَ مِئَةَ عَامٍ فَانْظُرْ إِلَى طَعَامِكَ وَشَرَابِكَ لَمْ يَتَسَنَّهْ وَانْظُرْ إِلَى حِمَارِكَ وَلِنَجْعَلَكَ آَيَةً لِلنَّاسِ وَانْظُرْ إِلَى الْعِظَامِ كَيْفَ نُنْشِزُهَا ثُمَّ نَكْسُوهَا لَحْمًا فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُ قَالَ أَعْلَمُ أَنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (259)या तुमने उस व्यक्ति का हाल सुना है जो एक ऐसे गांव से गुज़रा जिसकी छतें गिर चुकी थीं। उसने कहा, अल्लाह किस प्रकार से इन लोगों को पुनः जीवित करेगा? उसने कहा एक दिन या दिन के कुछ भाग से। अल्लाह ने उससे कहा, नहीं बल्कि तुम सौ वर्ष इसी प्रकार रहे हो अपनी खाने-पीने की वस्तुओं पर दृष्टि डालो बदली नहीं है और अपने गधे पर ध्यान दो और हम तुम्हें निश्चित ही एक चिन्ह बनाएंगे और गधों की हड्डियों को देखो कि हम उन्हें कैसे जोड़ते और उसपर मांस चढ़ाते हैं। जब उसके लिए यह स्पष्ट हो गया तो कहने लगा, मुझे पता है कि अल्लाह हर काम पर सक्षम है। (2:259) जैसा कि इन आयतों की व्याख्या में आया है कि उक्त घटना उज़ैर नामक एक पैग़म्बर के साथ घटी। वे एक वीरान नगर से गुज़र रहे थे। हालांकि उन्हें प्रलय पर पूर्ण विश्वास था किंतु अधिक संतोष के लिए उन्होंने अल्लाह से यह प्रार्थना की कि प्रलय के दिन मरे हुए लोगों को जीवित करना उन्हें दिखा दिया जाए। इस पूरी घटना में अल्लाह की शक्ति स्पष्ट है। ख़राब हो जाने वाली खाद्य सामग्री सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी जूं की तूं थी किंतु मज़बूत हड्डियां बुरादा हो चुकी थीं जिसे अल्लाह ने अपनी शक्ति से पुनः प्रथम अवस्था में ला दिया और इन सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि स्वयं हज़रत उज़ैर सौ साल तक मरे होने के बावजूद उनके शरीर में कोई परिवर्तन नहीं आया और गहरी नींद में सोने वाले की भांति उठ गए।इन आयतों से मिलने वाले पाठःप्रलय में मुर्दों का जीवित होना कोई असंभव बात नहीं है। अल्लाह ने इसके कई उदाहरणों का प्रदर्शन इसी संसार में किया है। अलबत्ता संसार में अपनी शक्ति को विभिन्न रूपों और शैलियों में दिखाता है ताकि लोगों को यह पता चल जाए कि वह हर काम पर सक्षम है इसलिए प्रलय या मरने के बाद हिसाब-किताब लिए जाने को शंका की दृष्टि से न देखें।