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    सूरए बक़रह; आयतें 268-272 (कार्यक्रम 76)

    सूरए बक़रह; आयतें 268-272 (कार्यक्रम 76)
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    सूरए बक़रह की आयत संख्या २६८ तथा २६९ इस प्रकार है।الشَّيْطَانُ يَعِدُكُمُ الْفَقْرَ وَيَأْمُرُكُمْ بِالْفَحْشَاءِ وَاللَّهُ يَعِدُكُمْ مَغْفِرَةً مِنْهُ وَفَضْلًا وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ (268) يُؤْتِي الْحِكْمَةَ مَنْ يَشَاءُ وَمَنْ يُؤْتَ الْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِيَ خَيْرًا كَثِيرًا وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ (269)दान के समय शैतान तुम्हें निर्धनता से डराता है और ग़लत कामों का आदेश देता है और ईश्वर तुम्हें क्षमा और वृद्धि का वचन देता है और अल्लाह सुनने तथा जानने वाला है। (2:268) जिसे चाहता है अपार बुद्धि दे देता है और जिसे अपार बुद्धि दे दी गई उसे अत्याधिक अच्छाई प्रदान कर दी गई और बुद्धिमानों के अतिरिक्त कोई याद नहीं रखता। (2:269) शैतान या शैतान के अनुयाई दुष्ट प्रवृत्ति के लोग विभिन्न रूपों में लोगों को निर्धनों की सहायता करने से रोकते हैं। वे कभी तो यह कहते हैं कि तुमको आगे चलकर स्वयं इस पैसे की आवश्यकता होगी और कभी यह समझाते हैं कि जब मेहनत तुम कर रहे हो तो पैसे उसे क्यों दे रहे हो। अल्लाह चाहता तो उसे भी धन देता और वह निर्धन न होता। ऐसे लोग एक ओर तो लोगों को दान देने से रोकता है और उन्हें धन बटोरने का प्रलोभन देते हैं तथा दूसरी ओर मनुष्य को भविष्य में निर्धन होने से डराते हैं। हालांकि प्रलय के दिन ईश्वरीय दान की हमें इससे कहीं अधिक आवशयकता होगी जितनी इस समय संसार में है। इसके अतिरिक्त अल्लाह ने दान देने वाले के भविष्य की ज़मानत ली है और वस्तुतः उसे निर्धनता से सुरक्षित रखने का वचन दिया है। किंतु खेद की बात है कि बहुत से लोग इन बातों पर कोई ध्यान न देते हुए दुष्ट लोगों और शैतान की बात माल लेते हैं। ऐसे लोग केवल धन-संपत्ति को अच्छाई समझते हैं हालांकि वास्तविक अच्छाई सही पहचान और विचार का स्वामी होने में है ताकि मनुष्य ईश्वरीय वचनों पर ध्यान देते हुए शैतानी बहकावे में न आए। इस आयत से हम यह सीखते हैं कि निर्धनता के भय से हमें कंजूसी नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह शैतानी बहकावा है। इस भय के मुक़ाबले में हमें ईश्वरीय कृपा और दया को याद रखना चाहिए तथा अपने भीतर भरोसे की भावना को जीवित रखना चाहिए।सही बुद्धि का चिन्ह, ईश्वरीय वचनों को शैतानी वचनों पर प्राथमिकता देना है। धार्मिक दृष्टिकोण से बुद्धिमान वह होता है जो ईश्वर के आदेशों का पालन करता हो न कि अपनी या अन्य लोगों की इच्छाओं का।बुद्धिमान वह होता है जो ईश्वर पर आदेशों का पालन करता हो न कि अपनी या अन्य लोगों की इच्छाओं का।सूरए बक़रह की आयत संख्या २७० तथा २७१ इस प्रकार है।وَمَا أَنْفَقْتُمْ مِنْ نَفَقَةٍ أَوْ نَذَرْتُمْ مِنْ نَذْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُهُ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنْصَارٍ (270) إِنْ تُبْدُوا الصَّدَقَاتِ فَنِعِمَّا هِيَ وَإِنْ تُخْفُوهَا وَتُؤْتُوهَا الْفُقَرَاءَ فَهُوَ خَيْرٌ لَكُمْ وَيُكَفِّرُ عَنْكُمْ مِنْ سَيِّئَاتِكُمْ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ (271)तुमने जो भी दान किया है या मन्नत मानी है निःसन्देह अल्लाह उससे अवगत है और अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं होगा। (2:270) अगर दान सबके सामने दो तो अच्छा है किंतु यदि उसे छिपा कर निर्धनों को दो तो यह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा होगा और यह तुम्हारे कुछ पापों को कम कर देगा और अल्लाह तुम्हारे समस्त कर्मों से अवगत है। (2:271) समाज में दान के मार्ग की एक बाधा यह भी है कि दान देने वाले को आशा होती है कि उसके प्रति आभार प्रकट किया जाए। यह आयत कहती है कि भले ही तुम्हारे अच्छे कामों या दान देने को अन्य लोग न देखें किंतु क्या तुमने अल्लाह के लिए दान नहीं दिया है? तो फिर क्यों लोगों से आभार की आशा रखते हो? अगर मनुष्य को विश्वास हो कि वह जो कुछ भी करता है अल्लाह उसे देख रहा है तो स्वयं यह विश्वास अच्छे काम के लिए एक प्रेरणा होता है। इस आधार पर निर्धनों की उपेक्षा क़ुरआन के शब्दों में वह अत्याचार है कि जो प्रलय के दिन मनुष्य को हर सहायक से वंचित कर देता है। दन की शैली के बारे में भी जैसा कि किताबों में उल्लेख हुआ है अनिवार्य दान कि जिसे ज़कात कहा जाता है सबके सामने देना चाहिए और इसके अतिरिक्त जो कुछ भी निर्धनों को दे उसे छिपा कर देना अच्छा होता है। संभवतः इसका कारण यह है कि इस प्रकार से दिये जाने वाले दान में दिखावे की भावना उत्पन्न होने की संभावना कम होती है।इस आयत से मिलने वाले पाठःअलल्लाह को हमारे दान का ज्ञान है अतः हमें अच्छे धन को अच्छी भावना के साथ दान करना चाहिए।दान कभी सबके सामने दें और कभी छिप कर। सबके सामने दान करने से अन्य लोगों को भी इसका प्रोत्साहन होता है और गुप्त दान मनुष्य को दिखावे से दूर रखने के साथ-साथ दान देने वाले के सम्मान को सुरक्षित रखता है। दान पापों के धुलने का साधन है। प्रायश्चित के लिए कभी धन का मोह त्याग देना चाहिए ताकि हमारे पापों में कुछ कमी हो।सूरए बक़रह की आयत संख्या २७२ इस प्रकार है।لَيْسَ عَلَيْكَ هُدَاهُمْ وَلَكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَلِأَنْفُسِكُمْ وَمَا تُنْفِقُونَ إِلَّا ابْتِغَاءَ وَجْهِ اللَّهِ وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ خَيْرٍ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنْتُمْ لَا تُظْلَمُونَ (272)(हे पैग़म्बर!) लोगों को सही मार्ग पर लगा देना तुम्हारा कर्तव्य नहीं है बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है रास्ते पर लगा देता है और तुम जो भी नेकी लोगों में बांटते हो वह तुम्हारे लिए होती है और तुम अल्लाह को प्रसन्न करने के अतिरिक्त किसी अन्य उद्देश्य से दान नहीं करते और तुम जो भी दान करते हो तुम्हें लौटा दिया जाएगा और तुम पर अत्याचार नहीं होगा। (2:272) जैसाकि पवित्र क़ुरआन की विभिन्न व्याख्याओं में आया है कि मुसलमानों को ईश्वर का इन्कार करने वालों को दान देने में असमंजस होता था जब उन्होंने पैग़म्बर से इस बारे में पूछा तो यह आयत उतरी कि जिसमें कहा गया है कि धर्म ग्रहण करना बल पूर्वक नहीं होना चाहिए कि निर्धन धन के लिए इस्लाम ले आएं ताकि इस प्रकार उन्हें मुसलमान दान दें कि जो उस समय मदीने के बहुसंख्यक थे। बल्कि जिस प्रकार इस संसार में अल्लाह की दी हुई नेमतों से सभी मनुष्य चाहे वह किसी भी धर्म से संबन्ध रखता हो लाभान्वित होते हैं, उसी प्रकार उसके मानने वालों को भी दान के लिए धर्म या समुदाय पर ध्यान नहीं देना चाहिए यह सोच कर कि सभी अल्लाह के बंदे और उसके दास हैं। उन्हें दान देना चाहिए कि इसका बदला अल्लाह देगा।इस आयत मिलने वाले पाठःधर्म को बलपूर्वक ग्रहण नहीं कराया जाना चाहिए यहां तक कि पैग़म्बर को भी यह अधिकार नहीं होता कि वह किसी को धर्म ग्रहण करने पर विवश करे।इस्लाम मानवप्रेमी धर्म है और निर्धनता को ग़ैर मुस्लिम लोगों के लिए भी पसंद नहीं करता।अगर दान देने के पीछे ईश्वर को प्रसन्न करने की भावना हो तो मनुष्य को अपने इस अच्छे काम का बदला लोक-परलोक दोनों में मिलेगा।