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    सूरए बक़रह; आयतें 273-277 (कार्यक्रम 77)

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    सूरए बक़रह की आयत संख्या २७३ तथा २७४ इस प्रकार है।لِلْفُقَرَاءِ الَّذِينَ أُحْصِرُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ ضَرْبًا فِي الْأَرْضِ يَحْسَبُهُمُ الْجَاهِلُ أَغْنِيَاءَ مِنَ التَّعَفُّفِ تَعْرِفُهُمْ بِسِيمَاهُمْ لَا يَسْأَلُونَ النَّاسَ إِلْحَافًا وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ بِهِ عَلِيمٌ (273) الَّذِينَ يُنْفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ سِرًّا وَعَلَانِيَةً فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (274)दान उन निर्धनों के लिए है जो अल्लाह की राह में कठिनाई का शिकार हुए हों और आजीविका के लिए कहीं की यात्रा पर सक्षम न हों। जानकारी न रखने वाला उनके आत्म सम्मान के कारण उन्हें धनवान समझता है किंतु तुम उन्हें उनके चेहरे से पहचानते हों। वे लोगों से कोई वस्तु आग्रह के साथ नहीं मांगते और तुम जो भी अच्छी वस्तु दान करते हो निःसन्देह अल्लाह उससे अवगत है। (2:273) जो लोग अपना धन, रात में दिन में और खुल्लम खुल्ला या छिपा कर दान करते हैं उनका बदला अल्लाह के पास है। उन्हें न कोई डर है और न दुख। (2:274) इससे पहले कहा गया कि इस्लाम ने इस्लामी समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए बहुत सी सिफ़ारिशें की हैं जिनमे दान ही सम्मिलित है। अर्थात धनवानों को अपने धन में से ग़रीबों की सहायता करनी चाहिए। यह आयत दान के एक महत्वपूर्ण पात्र उन पलायनकार्ताओं और मुजाहिदयों की ओर संकेत करती है जिन्होंने जेहाद और पलायन के दौरान अपना घर-बार छोड़ दिया और परदेस में उनके पास न तो धन है और न ही कमाने का कोई साधन। ऐसे लोग इस प्रकार की दशा के बावजूद अपने आत्म सम्मान के कारण लोगों से कुछ नहीं मांगते हैं। यही कारण है कि लोग उन्हें धनवान समझते हैं। मोमिनों को अपने इस प्रकार के भाइयों का ध्यान रखना चाहिए ताकि उन्हें कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। इतिहास में मिलता है कि इस्लाम के आरंभ में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के कुछ अनुयाइयों ने आपके साथ ही मक्के से मदीने की ओर पलायन किया। मदीने में उनके पास न तो भूमि थी और न ही घर। इस्लाम स्वीकार कर लेने के कारण मक्के के लोगों ने इन मुसमलानों के घर और उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली थी। मदीने के लोगों ने उनमें से कुछ लोगों को अपने घर मे रखकर उनका ख़र्च उठाया किंतु अधिकांश लोग पैग़म्बर द्वारा बनाई गई मस्जिद के निकट सुफ़्फ़ा नामक एक स्थान में रहते थे। आयत में उन्हीं लोगों की सहायता की ओर संकेत किया गया है।इस आयत से हम यह सीखते हैं कि अल्लाह ने धनवानों के धन में ग़रीबों का भी कुछ हिस्सा रखा है।इस्लामी समाज में इससे पूर्व कि निर्धन अपनी आवश्यकता बताए उसकी ज़रूरत पूरी करके उसके मान को सुरक्षित रखना चाहिए।पवित्र क़ुरआन की दृष्टि में ग़रीब वह है जो बाढ़ या भूकंप जैसी आपदाओं या फिर युद्ध जैसी घटनाओं के कारण जीवन यापन की क्षमता खो बैठ हो। इसके बावजूद मान-सम्मान की रक्षा करना भौतिक सुख से अधिक आवश्यक बताया गया है। जो लोग सबके सामने आकर आग्रह के साथ पैसे मांगते हैं वह ग़रीबों में नहीं है। ईश्वर ने अपनी राह में दान करने वाले मनुष्य को ग़रीबी से बचाने का वचन दिया है और ऐसे लोगों को कोई चिंता नहीं होनी चाहिए अतः उन्हें भी अल्लाह पर भरोसा रखते हुए कभी भी उचित दान से नहीं बचना चाहिए।सूरए बक़रह की आयत संख्या २७५-२७६ इस प्रकार है।الَّذِينَ يَأْكُلُونَ الرِّبَا لَا يَقُومُونَ إِلَّا كَمَا يَقُومُ الَّذِي يَتَخَبَّطُهُ الشَّيْطَانُ مِنَ الْمَسِّ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا إِنَّمَا الْبَيْعُ مِثْلُ الرِّبَا وَأَحَلَّ اللَّهُ الْبَيْعَ وَحَرَّمَ الرِّبَا فَمَنْ جَاءَهُ مَوْعِظَةٌ مِنْ رَبِّهِ فَانْتَهَى فَلَهُ مَا سَلَفَ وَأَمْرُهُ إِلَى اللَّهِ وَمَنْ عَادَ فَأُولَئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (275) يَمْحَقُ اللَّهُ الرِّبَا وَيُرْبِي الصَّدَقَاتِ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ كَفَّارٍ أَثِيمٍ (276)जो लोग सूद या व्याज खाते हैं वह जब भी उठते हैं, उस व्यक्ति की भांति उठते हैं जिस पर शैतान की परछाईं पड़ गयी हो। यह इस लिए है कि वे कहते हैं कि व्यापार भी सूद की ही भांति है और अल्लाह ने व्यापार को वैध और सूद को हराम या वर्जित किया है। तो जो भी अल्लाह की सिफ़ारिश के बाद रुक गया तो जो कुछ ले चुका है उसका है और उसका मामला अल्लाह देख लेगा किंतु जो लौट गए तो वही नरक वाले हैं जिसमें वे सदैव रहेंगे। (2:275) अल्लाह सूद के धन को मिटाता है और दान के धन को बढ़ाता है और कोई भी इन्कार करने वाला पापी, ईश्वर को पसंद नहीं है। (2:276) यहां पर यह उल्लेख करना उचित होगा कि अल्लाह ने सूरए बक़रह की चार आयतों में निरंतर लोगों को दान की ओर प्रोत्साहित किया और उसके व्यक्तिगत और सामूहिक प्रभावों का वर्णन किया है ताकि एक ओर लोगों में दान की भावना को जीवित किया जाए और दूसरे उनके हृदयों से संसार प्रेम को कम किया जा सके। दूसरी और सामाजिक अंतर को यथासंभव कम करते हुए समाज में भाईचारे और बराबरी का वातावरण बनाया जा सके। इसके पश्चात अल्लाह सूद के बारे में कहता है कि सूद समाज के आर्थिक संतुलन के साथ ही सूदख़ोर के संतुलन को भी समाप्त कर देता है। एक ओर सूद लेना इस बात का कारण बनता है कि ग़रीबों में धनवानों के प्रति घृणा जन्म ले और समाज, एक विस्फ़ोटक स्थिति की ओर बढ़ने लगे तथा दूसरी ओर इससे सूदख़ोरों में एक प्रकार का पागलपन पैदा हो जाता है अर्थात वह ऐसा हो जाता है जैसे उस पर किसी प्रेतात्मा का प्रभाव हो और वह पैसे तथा सोने-चांदी के अतिरिक्त कुछ पहचानता ही नहीं और मानवीय मूल्यों का भी पैसे से सौदा करता है। सूदख़ोर अपने धन द्वारा उत्पादन या समाज में सुविधा की चिंता और किसी प्रकार का परिश्रम किये बिना केवल लोगों को पैसा क़र्ज देकर अपना धन बढ़ाना चाहता है। इसके परिणाम स्वरूप ग़रीब अधिक ग़रीब हो जाता है तथा धनवान अधिक धन बटोरता चला जाता है और यह किसी भी समाज के निर्धनों पर सबसे बड़ा अत्याचार है। यही कारण है कि समस्त ईश्वरीय धर्मों में सूद वर्जित है और सूदख़ोर के लिए दण्ड निर्धारित किया गया है। हालांकि देखने में सूद, धन में वृद्धि करता है और दान उसमें कमी किंतु धन में वृद्धि अल्लाह के हाथ में है इसीलिए जो धन सूद द्वारा प्राप्त किया जाता है वह बजाए इसके कि सूदख़ोर के लिए सफलता और सुख का कारण बने निर्धनों की घृणा के साथ होने के कारण सूदख़ोर की जान व माल को ख़तरे में डाल देता है। कभी-कभी तो यह मूल पूंजी के विनाश का कारण भी बन जाता है जैसाकि दान देने वाला समाज में अपनी लोकप्रियता के कारण सुख व शांति के साथ जीवन व्यतीत करता है और विकास व उन्नति के मार्ग उसके लिए खुले रहते हैं। इस आयत से मिलने वाले पाठः सूदख़ोरी लोगों के मानसिक संतुलन के बिगड़ जाने का कारण होती है। इसी प्रकार सूद से समाज में आर्थिक असंतुलन उत्पन्न होता है और समाज में प्रेम के स्थान पर घृणा और न्याय के स्थान पर अत्याचार आम हो जाता है। इस्लाम व्यापकता को महत्व देने वाला एक व्यापक धर्म है। यही कारण है कि लोगों की अर्थव्यवस्था के लिए भी उसके पास योजना है। ऐसा नहीं है कि इस्लाम ने लोगों को केवल उपासना का ही आदेश दिया और दूसरों मामलों में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया हो। सूदख़ोरी एक प्रकार से ईश्वर के उपकारों को भुला देने के समान है। अल्लाह ने जो धन हमको दिया है वह हमारे पास एक धरोहर की भांति है और इस धन में से निर्धनों को दान न करना अल्लाह की अनुकंपाओं पर अकृतज्ञता प्रकट करने जैसा है कि जो धन के विनाश का कारण भी बनती है।सूरए बक़रह की आयत संख्या २७७ इस प्रकार है।إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآَتَوُا الزَّكَاةَ لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (277)निःसन्देह, जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात देते हैं उनका बदला उनके अल्लाह के पास है। वे न तो भयभीत होते होंगे और न ही दुखी। (2:277) यह आयत सच्चे मोमिन या अल्लाह पर विश्वास रखने वाले की विशेषताएं बताती हैं कि जो नमाज़ और उपासना द्वारा ईश्वर से संबन्ध स्थापित करने के साथ ही साथ उसके शब्दों से भी संबन्ध बनाने की सोचते हैं और धर्म को शुष्क कर्तव्यों में ही सीमित नहीं समझते बल्कि सदैव दूसरों को भी चिंता करते हैं।