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    सूरए बक़रह; आयतें 260-263 (कार्यक्रम 74)

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    सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 260 इस प्रकार है।وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ أَرِنِي كَيْفَ تُحْيِي الْمَوْتَى قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِنْ قَالَ بَلَى وَلَكِنْ لِيَطْمَئِنَّ قَلْبِي قَالَ فَخُذْ أَرْبَعَةً مِنَ الطَّيْرِ فَصُرْهُنَّ إِلَيْكَ ثُمَّ اجْعَلْ عَلَى كُلِّ جَبَلٍ مِنْهُنَّ جُزْءًا ثُمَّ ادْعُهُنَّ يَأْتِينَكَ سَعْيًا وَاعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (260)और (हे पैग़म्बर! याद कीजिए उस समय को) जब इब्राहीम ने कहा हे प्रभु! मुझे तू दिखा दे कि किस प्रकार मरे हुए लोगों को जीवित करता है। ईश्वर ने कहा क्या तुम्हें विश्वास नहीं है? इब्राहीम ने कहा, क्यों नहीं किंतु मैं मन को संतुष्ट करना चाहता हूं। अल्लाह ने कहा, तो फिर चार पक्षियों को लाओ और उनके टुकड़े-टुकड़े करके उनके मांस को मिला दो, फिर हर पहाड़ पर थोड़ा-2 भाग रख दो। फिर चारों पक्षियों को उनके नामों से पुकारो ताकि वे तत्काल तुम्हारे पास आ जाएं। और जान लो कि अल्लाह महा शक्तिशाली और अत्यंत युक्तिपूर्ण है। (2:260)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ऐसा ही किया और चार पक्षियों को लेकर उनके टुकड़े-टुकड़े किए और उनके मांस को मिला कर दस पहाड़ियों पर रख दिया। उसके बाद चारों पक्षियों को उनके नाम से बुलाया। ईश्वर की शक्ति से पहाड़ की विभिन्न चोटियों पर रखे हुए उस पक्षी के मांस टुकड़े उड़ उड़ कर आते और आपस में जुड़ जाते और वह पक्षी पहले के भांति जीवित हो जाता और इस प्रकार हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया।इस आयत से मिलन वाले पाठःप्रलय के दिन मनुष्य को पुनः जीवित करना शारीरिक होगा। ईश्वर प्राकृतिक नियमों को अपने नियंत्रण में रखता है न यह कि वह उनके नियंत्रण में रहे। इस आधार पर प्रलय के दिन शरीर के टुकड़ों को जोड़ कर मनुष्य को जीवित करना कोई असंभव काम नहीं है।तर्क मनुष्य को संतुष्ट कर देता है किंतु आवश्यक नहीं है कि मन को भी शांति प्राप्त हो जाए। हमें मन में विश्वास व शांति उत्पन्न करना चाहिए जो ईश्वर की अनगिनत अनुंपाओं पर विचार करके हाथ आ सकती है।सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 261 इस प्रकार है।مَثَلُ الَّذِينَ يُنْفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنْبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِي كُلِّ سُنْبُلَةٍ مِئَةُ حَبَّةٍ وَاللَّهُ يُضَاعِفُ لِمَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ (261)उन लोगों का उदाहरण जो ईश्वर के मार्ग में दान करते हैं उस दाने की भांति है जिससे सात बालियां फूटी हों और प्रत्येक बाली में सौ दाने हों और ईश्वर जिसके लिए चाहता है बढ़ोतरी कर देता है और ईश्वर तो बढ़ोतरी करने वाला और जानने वाला है। (2:261)इस आयत से लेकर बाद वाली चौदह आयतों में दान व सूद के बारे में बात की गई है। आपको ज्ञान है कि हर समाज में स्वाभाविक रूप से लोगों की आय में अंतर होता है। इन समाजों में बाढ़, भूकंप, अकाल और सूखे आदि जैसी आपदाएं या फिर चोरी, डकैती जैसी दुर्घटनाओं के कारण समाज में कुछ लोग नौकरी व आय से वंचित हो जाते हैं और उनके लिए जीवन यापन कठिन हो जाता है।इस समस्या का समाधान क्या है? क्या इन लोगों को इनके हाल पर छोड़ देना चाहिए कि जो चाहें करें, हम से क्या मतलब। या यह कि ये बेचारे धनवानों से सूद पर ऋण लेकर पेट भरें। यह जो कहा जाता है कि सूदख़ोरी समाज की बीमारी है, वह इस लिए धनवान सूद ले लेकर अधिक धनवान होता जाता है और क़र्ज़दार सूद तथा मूल राशि लौटाते-2 अधिक ग़रीब हो जाता है जिससे समाज में अमीर व ग़रीब के बीच अंतर बढ़ता जाता है।इस्लाम में सूद लेना और देना दोनों ही हराम अर्थात पाप और वर्जित है। इसके स्थान पर इस्लाम में समाज के सदस्यों और मुसलमानों के बीच भाईचारे की भावना को जागृत करने के लिए उन्हें दान के लिए प्रोत्साहित किया गया है। और चूंकि सूद पर धन देने वालों का लक्ष्य अपने धन में वृद्धि करना होता है अतः ईश्वर इस आयत में कहता है कि जो ईश्वर के मार्ग में दान करता है उसके धन में भी वृद्धि होती है और वह सात सौ गुना तक बढ़ जाता है। इससे तुम भी आगे बढ़ोगे और तुम्हारा धन भी और समाज से निर्धनता दूर हो जाएगी।इस आयत से मिलने वाले पाठःसमाज के निर्धन लोगों की सहायता यदि ईश्वर के लिए हो तो न केवल यह कि इससे धन में कोई कमी नहीं होती बल्कि यह चीज़ समाज के विकास का कारण भी बनती है।ईश्वरीय कृपा की कोई सीमा नहीं है और हर कोई अपने प्रयास व क्षमता के अनुसार ईश्वरीय अनुकंपा से लाभान्वित होता है।सूरए बक़रह की आयत नंबर 262 इस प्रकार है।الَّذِينَ يُنْفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ثُمَّ لَا يُتْبِعُونَ مَا أَنْفَقُوا مَنًّا وَلَا أَذًى لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (262) قَوْلٌ مَعْرُوفٌ وَمَغْفِرَةٌ خَيْرٌ مِنْ صَدَقَةٍ يَتْبَعُهَا أَذًى وَاللَّهُ غَنِيٌّ حَلِيمٌ (263)जो लोग अपना धन ईश्वर के मार्ग में दान करते हैं और उसके बाद न एहसान जताते हैं और न ही दुखी करते हैं उनका पुरस्कार उनके पालनहार के पास है, न उन्हें कोई चिंता होगी और न ही वे दुखी होंगे। (2:262) अच्छी बात और क्षमा उस दान से अच्छी होती है जिसके बाद यातना हो और अल्लाह आवश्यकतामुक्त तथा संयमी है। (2:263)इससे पहले वाली आयत में लोगों को दान करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था जिसके बाद इस आयत में लोगों को दान करने की सही शैली से अवगत कराया जा रहा है। आयत कहती है कि यदि तुमने ईश्वर के मार्ग में निर्धनों को कोई चीज़ दान की तो न उस पर यह जताओ कि तुमने उन्हें कुछ दिया है और न ही अपनी करनी व कथनी द्वारा उन्हें दुखी करो। जान लो कि जो कुछ तुमने उन्हें दिया है वह तुम्हारा नहीं था कि तुम उसके बल पर इतराओ, वह ईश्वर का था जो तुम्हें प्रदान किया गया था बल्कि निर्धनों का तुम पर एहसान है कि उन्होंने तुम्हें इस बात का अवसर दिया कि तुम ईश्वर के आदेश का पालन करते हुए उसे प्रसन्न कर सको। यदि कोई ईश्वर के मार्ग में दान करता है तो उसे किसी से फल या आभार की आशा नहीं रखनी चाहिए। ऐसे लोग अपने अच्छे कर्मों पर पश्चाताप का आभास नहीं करते क्योंकि ईश्वर ने दान देने वाले के भविष्य को अच्छा करने की ज़मानत दी है। उनके पास यदि दान करने के लिए कुछ न हो तब भी वे अच्छे और नम्र शब्दों के साथ निर्धनों से व्यवहार करते हैं और यह चीज़ उस धनदान से कहीं अच्छी है जिसके पश्चात एहसान जताया जाए या लेने वाले को दुखी किया जाए।इस आयत से मिलने वाले पाठःजो काम हमने ईश्वर के लिए आरंभ किया है उस पर अत्यधिक ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि हमारे भीतर घमंड, आशा और एहसान जताने जैसे रोग पैदा न होने पाएं कि फिर उस काम का महत्व ही न रह जाए।किसी के मान की रक्षा उसकी शारीरिक व आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने से अधिक अच्छा काम है। प्रयास किया जाए कि दूसरों के आत्म सम्मान को ठेस न लगे।