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    सूरए बक़रह; आयतें 85-88 (कार्यक्रम 36)

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    सूरए बक़रह की ८५वीं आयत इस प्रकार है।ثُمَّ أَنْتُمْ هَؤُلَاءِ تَقْتُلُونَ أَنْفُسَكُمْ وَتُخْرِجُونَ فَرِيقًا مِنْكُمْ مِنْ دِيَارِهِمْ تَظَاهَرُونَ عَلَيْهِمْ بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَإِنْ يَأْتُوكُمْ أُسَارَى تُفَادُوهُمْ وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيْكُمْ إِخْرَاجُهُمْ أَفَتُؤْمِنُونَ بِبَعْضِ الْكِتَابِ وَتَكْفُرُونَ بِبَعْضٍ فَمَا جَزَاءُ مَنْ يَفْعَلُ ذَلِكَ مِنْكُمْ إِلَّا خِزْيٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ يُرَدُّونَ إِلَى أَشَدِّ الْعَذَابِ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ (85)(जबकि हम तुम से प्रतिज्ञा ले चुके हैं फिर भी तुम एक दूसरे की हत्या करते हो) और अपने ही में के एक गुट को उनकी भूमि से निकाल देते हो और उनके विरूद्ध पाप और अतिक्रमण में एक दूसरे की सहायता करते हो। जबकि यदि वही लोग बंदी के रूप में तुम्हारे समक्ष आएं तो तुम उनक ख़रीदते हो और उनके स्वतंत्र करते हो, जबकि (न केवल ये कि उनकी हत्या करना बल्कि) उन्हें उनकी भूमि से बाहर निकालना भी आरंभ से ही तुम्हारे लिए वर्जित था। क्या तुम आसमानी किताब के कुछ आदेशों पर आस्था रखते हो और कुछ का इन्कार करते हो। तो तुममें से जो ऐसा करेगा उसका बदला संसार के जीवन में अपमान के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा और प्रलय के दिन वो सबसे भयानक दंड में ग्रस्त होगा, और जो कुछ तुम करते हो, ईश्वर उसकी ओर से निश्चेत नहीं है। (2:85) यह आयत बनी इस्राईल को लताड़ते हुए कहती है कि ईश्वर से प्रतिज्ञा करने के बावजूद तुम लोग एक दूसरे की हत्या करते हो और उन्हें उनके घरों से बाहर निकालते हो, और विचित्र बात यह है कि तौरेत के आदेशानुसार यदि तुम्हारे सामने कोई बंदी आए तो तुम उसको ख़रीद कर स्वतंत्र कर देते हो। तुम एक दूसरे की हत्या के लिए तैयार हो, परन्तु एक दूसरे का बंदी बनना नहीं चाहते। यदि कैसी बनना अपमान है तो हत्या करना और किसी को उसके घर से निकाल देना तो और बड़ा अपमान है। यदि बंदी का मूल्य देकर उसे स्वतंत्र करना तौरेत का आदेश है तो हत्या और देश निकाले से दूर रहना भी तौरेत का आदेश है। वास्तव में तुम अपनी इच्छाओं का पालन करते हो न कि आसमानी किताब के आदेशों का। क्योंकि जहां भी ईश्वरीय आदेश तुम्हारी इच्छा के अनुसार हो तो तुम उसे स्वीकार कर लेते हो और जहां ऐसा न हो तुम उसे स्वीकार नहीं करते, यहां तक कि तुम पाप करने में भी एक दूसरे की सहायता करते हो। इस आयत के अनुसार मनुष्य में वास्तविक ईमान की निशानी, कर्म है और वो भी ऐसा कर्म जो ईश्वरीय आदेशों के अनुसार हो न कि व्यक्तिगत हितों और इच्छाओं के अनुसार किया गया कर्म हो क्योंकि यह आत्मपूजा है, ईश्वर पूजा नहीं। न केवल पाप करना बल्कि पापी की सहायता करना ही वर्जित है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के एक पौत्र इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने एक मुसलमान को संबोधित करते हुए कहा थाः अब्बासी शासन हारून रशीद के दरबार को ऊंट किराए पर देना ठीक नहीं है चाहे हज की यात्रा के लिए ही क्यों न हो क्योंकि तुम कामना करोगे कि वो यात्रा से ठीक ठाक और स्वस्थ लौट आए और तुम्हारे पैसे तुम्हें दे दे और अत्याचारी के जीवित रहने की इच्छा करना पाप है।

    अब सूरए बक़रह की ८६वीं आयत इस प्रकार है।أُولَئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآَخِرَةِ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ (86)यह ऐसे लोग हैं जिन्होंने संसार के जीवन को प्रलय के बदले ख़रीदा है, तो उनके दंड में कोई ढील नहीं दी जाएगी और न ही उनकी सहायता होगी। (2:86) यह आयत ईश्वरीय आदेशों के उल्लंघन और दूसरों की हत्या करने और उन्हें देश निकाला देने के मूल कारण का वर्णन करते हुए कहती है कि वे सांसारिक जीवन चाहते हैं और केवल उन्हीं आदेशों का पालन करते हैं जो उनके हितों की पूर्ति करते हों परन्तु प्रलय से संबन्धित बातों पर वो ध्यान नहीं देते। इतने सारे पापों और संसार के लोभ के बावजूद यहूदी दावा करते थे कि उन्हें दंड नहीं दिया जाएगा। ये दंड आयत कहती है, इन निराधार आशाओं और कामनाओं के विपरीत उन्हें भी सभी पापियों की भांति, ग़लत कार्यों पर दंड दिया जाएगा और कोई भी उनकी सहायता नहीं करेगा।सूरए बक़रह की ८७वीं आयत इस प्रकार है।وَلَقَدْ آَتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ وَقَفَّيْنَا مِنْ بَعْدِهِ بِالرُّسُلِ وَآَتَيْنَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنَاتِ وَأَيَّدْنَاهُ بِرُوحِ الْقُدُسِ أَفَكُلَّمَا جَاءَكُمْ رَسُولٌ بِمَا لَا تَهْوَى أَنْفُسُكُمُ اسْتَكْبَرْتُمْ فَفَرِيقًا كَذَّبْتُمْ وَفَرِيقًا تَقْتُلُونَ (87)और हमने मूसा को किताब दी और उनके पश्चात निरंतर पैग़म्बर अर्थात अपने दूत भेजे और मरयम के बेटे ईसा को हमने स्पष्ट चमत्कार निशानियां दीं और रूहुल क़ुदुस द्वारा उनकी पुष्टि और सहायता की, तो क्यों जब भी कोई पैग़म्बर तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कोई वस्तु लाया तो तुमने उसके समक्ष घमंड किया और कुछ को झुठलाया और कुछ की हत्या की? (2:87) ये आयत मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए ईश्वर की निरंतर कृपा की ओर संकेत करते हुए कहती हैः ईश्वर ने हज़रत मूसा के पश्चात बनी इस्राईल के लिए निरंतर कई पैग़म्बर भेजे जिनमें से एक हज़रत ईसा मसीह थे। परन्तु बनी इस्राईल का संसार प्रेम और इच्छापालन इस बात का कारण बना कि उन्होंने घमंड और अहं द्वारा उन पैग़म्बरों को झुठलाया, यहां तक कि कुछ की हत्या भी की क्योंकि वे पैग़म्बर उनकी अनुचति मांगों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।सूरए बक़रह की ८८वीं आयत इस प्रकार है।وَقَالُوا قُلُوبُنَا غُلْفٌ بَلْ لَعَنَهُمُ اللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيلًا مَا يُؤْمِنُونَ (88)उन्होंने (पैग़म्बरों से) कहाः हमारे हृदय ढके हुए हैं (और हम आपकी बातें नहीं समझते) ऐसा नहीं है बल्कि उनके कुफ़्र के कारण ईश्वर ने उन्हें अपनी दया से दूर कर दिया है (और वे कुछ भी नहीं समझते) और कम ही है जो ईमान लाते हैं। (2:88) पैग़म्बरों के आमंत्रण पर अवज्ञाकारी लोग परिहास करते हुए ये उत्तर देते हैं कि हम इन बातों को नहीं समझते और जिन बातों को हम नहीं समझते उन्हें मान नहीं सकते। क़ुरआन उनके उत्तर में कहता हैः ऐसा नहीं है कि पैग़म्बरों की बातें लोगों की समझ में न आती हों बल्कि कुछ लोगों की हठ और सत्य छिपाने की भावना इस बात का कारण बनीं कि वे वास्तविकताओं को समझ न पाएं और कम ही ईमान लाएं। मूल रूप से अपनी ग़लत इच्छाओं का अनुसरण इस बात का कारण बनता है कि मनुष्य के विचारों और उसके हृदय पर स्वार्थ और अहं के मोटे परदे पड़ जाएं और सभी वास्तिवकताओं को वो केवल भौतिक दृष्टि से देखें और परिणामस्वरूप आसमानी शिक्षाओं का इन्कार कर दे।अब देखते हैं कि इन आयतों से हमें क्या बातें ज्ञात हुई हैं। ईश्वर के सभी आदेशों का पालन करना चाहिए। ऐसा न हो कि जो आदेश हमारी इच्छा और मर्ज़ी के अनुसार हो उसे स्वीकार कर लें और जो पसंद न आए उसको छोड़ दें क्योंकि इस दशा में हमने अपनी इच्छा का पालन किया है न कि ईश्वरीय आदेश का। हम जो कुछ कहते हैं, उस पर ईश्वर को साक्षी मानना चाहिए। हम उसकी ओर से निश्चेत रह सकते हैं, वो हमारी ओर से नहीं। हम जो कुछ भी करते हैं, वो उससे परिचित है। ईश्वरीय क़ानून के सामने सारे मनुष्य समान हैं। यदि कोई ये सोचे कि उनकी जाति वरिष्ठ है और वे ईश्वर को अधिक प्रिय हैं तो ये एक निराधार विचार है और ऐसे ग़लत विचार अपराधियों और पापियों के दंड को कम नहीं करेंगे। ईश्वर ने मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए अनेक पैग़म्बर भेजे हैं, परन्तु मनुष्य ने आभार प्रकट करने के स्थान पर उनको झुठलाया तथा उनकी हत्या की। मनुष्य का सौभाग्य और दुर्भाग्य उसके अपने हाथ में है। यदि किसी गुट पर ईश्वर का प्रकोप होता है तो वो उसके कुफ़्र और हठ के कारण है वरना ईश्वर ने सभी लोगों के मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध कराए हैं।