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    सूरए बक़रह; आयतें 89-93 (कार्यक्रम 37)

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    सूरए बक़रह की ८९ वीं आयत का अनुवाद इस प्रकार है।

    وَلَمَّا جَاءَهُمْ كِتَابٌ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِمَا مَعَهُمْ وَكَانُوا مِنْ قَبْلُ يَسْتَفْتِحُونَ عَلَى الَّذِينَ كَفَرُوا فَلَمَّا جَاءَهُمْ مَا عَرَفُوا كَفَرُوا بِهِ فَلَعْنَةُ اللَّهِ عَلَى الْكَافِرِينَ (89

    और जब ईश्वर की ओर से उनके लिए क़ुरआन नामक किताब आई (जो उन निशानियों के अनुकूल थी जो उनके पास थीं) और इससे पूर्व वे काफ़िरों पर विजय की शुभ सूचना दिया करते थे, तो जब उनके पास वे वस्तुएं आ गईं जिन्हें वे पहचान चुके थे, तो उन्होंने उनका इन्कार कर दिया तो इन्कार करने वालों पर ईश्वर की धिक्कार हो। (2:89)इससे पहले हमने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तथा तौरेत के आदेशों के समक्ष बनी इस्राईल के इन्कार और हठ के कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये थे। यह आयत इस्लाम के उदय के समय के यहूदियों से संबंधित है कि जो तौरेत में आने वाली पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की निशानियों के आधार पर उनके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे और इसी कारण वे अपना देश और अपनी धरती छोड़ कर हेजाज़ अर्थात आज के सऊदी अरब आ गए थे।मदीना नगर तथा उसके समीप रहने वाले यहूदी, मदीने के अनेकेश्वरवादियों से कहते थे कि शीघ्र ही मोहम्मद नाम का एक पैग़म्बर आएगा और हम उस पर ईमान लाएंगे और वह अपने शत्रुओं पर विजयी होगा परन्तु जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मदीने की ओर हिजरत की तो वहाँ के अनेकेश्वरवादी उन पर ईमान न आए बल्कि यहूदियों ने संसारप्रेम और हठ के कारण उनका इन्कार कर किया और वास्तव मे उन्होंने तौरेत की भविष्यवाणियों का इन्कार किया।यह आयत बताती है कि केवल ज्ञान और पहचान पर्याप्त नहीं है बल्कि सत्य स्वीकार करने और उसके समक्ष झुकने की भावना भी आवश्यक है। यद्यपि यहूदी और विशेषकर उनके विद्वान, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को पहचान चुके थे परन्तु सत्य को स्वीकार करने और उसके समक्ष झुकने के लिए तैयार नहीं थे।

    सूरए बक़रह की ९०वीं आयत इस प्रकार है।

    بِئْسَمَا اشْتَرَوْا بِهِ أَنْفُسَهُمْ أَنْ يَكْفُرُوا بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ بَغْيًا أَنْ يُنَزِّلَ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ عَلَى مَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ فَبَاءُوا بِغَضَبٍ عَلَى غَضَبٍ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُهِينٌ (90)उन्होंने कितनी बुरी वस्तु के बदले में स्वयं को बेच दिया कि ईर्ष्या के कारण उसका इन्कार करने पर तैयार हो गए जिसे ईश्वर ने उतारा था, क्योंकि ईश्वर अपनी दया से अपने बन्दों में से जिस पर भी चाहे अपनी आयतें उतारता है, तो वे ईश्वर के निरंतर प्रकोप में फंस गए और इन्कार करने वालों के लिए अपमानजनक दंड है। (2:90)यहूदियों को आशा थी कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम भी बनी इस्राईल के मूल से होंगे ताकि वे उन पर ईमान लाएं परन्तु जब उन्होंने देखा कि ऐसा नहीं है तो वे जातीय द्वेष और ईर्ष्या के कारण इस्लाम नहीं लाए, यहां तक कि उन्होंने इस बात पर ईश्वर पर आपत्ति भी की।

    यहूदियों ने इस कार्य द्वारा घाटे का सौदा किया, क्योंकि वे पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान लाने के लिए लम्बी यात्राओं की कठिनाइयां झेल कर मदीने आए थे और वे स्वयं इस्लाम के प्रचारक थे परन्तु केवल हठ और ईर्ष्या के कारण वे काफ़िर हो गए और स्वयं को ईर्ष्या के दामों बेच दिया और अपना लक्ष्य प्राप्त न कर सके।

    सूरए बक़रह की 91वीं आयत इस प्रकार है।

    وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آَمِنُوا بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ قَالُوا نُؤْمِنُ بِمَا أُنْزِلَ عَلَيْنَا وَيَكْفُرُونَ بِمَا وَرَاءَهُ وَهُوَ الْحَقُّ مُصَدِّقًا لِمَا مَعَهُمْ قُلْ فَلِمَ تَقْتُلُونَ أَنْبِيَاءَ اللَّهِ مِنْ قَبْلُ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (91)और जब उनसे कहा जाता कि जो कुछ ईश्वर ने उतारा है उसपर ईमान ले आओ तो वे कहते कि हम केवल उसी बात पर ईमान लाएंगे जो हमारे (पैग़म्बर) पर उतरी है। और उसके अतिरिक्त बातों का इन्कार कर देते। जबकि ये (क़ुरआन) सत्य है और उनके पास ईश्वरीय आयतों में से जो कुछ है, उसकी पुष्टि करता है। हे पैग़म्बर! उनसे कह दीजिए कि यदि तुम उन बातों पर ईमान रखते हो जो तुम पर उतारी गई हैं तो इससे पहले तुम लोगों ने पैग़म्बरों की हत्या क्यों की? (2:91)यह आयत यहूदियों को संबोधित करते हुए कहती है, यदि अपने मूल का न होने के कारण तुम मुहम्मद पर ईमान नहीं लाए तो तुम उन पैग़म्बरों को क्यों झुठलाते और उनकी हत्या करते थे, जो तुम्हारे ही मूल के थे?अतः तुम सत्य के विरोधी हो और इसमें कोई अंतर नहीं है कि सत्य को तुम्हारे पैग़म्बर प्रस्तुत करें या पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम, वह तुम्हारी तौरेत में आया हो या क़ुरआन में।मूल रूप से आसमानी किताबों में जो कुछ आया है वह अनन्य ईश्वर की ओर से और सभी लोगों के लिए आया है तथा किसी भी जाति या मूल से विशेष नहीं है कि कोई यह कहे कि मैं केवल उसी बात पर ईमान रखता हूं जो हमारे पैग़म्बर लाए हैं और उसके अतिरिक्त किसी भी बात को नहीं मानता हूं।क्योंकि आसमानी किताबों में जो बातें आई हैं वे सारी की सारी एक ही दिशा में है और एक दूसरे से समन्वित हैं, उनमें विरोधाभास नहीं है जैसा कि विश्व विद्यालय की पाठ्य पुस्तकें, कॉलेज की पाठ्य पुस्तकों से समन्वित और उनके अनुकूल होती हैं परन्तु अधिक परिपूर्ण रूप में।सूरए बक़रह की 92वीं आयत इस प्रकार है।

    وَلَقَدْ جَاءَكُمْ مُوسَى بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ اتَّخَذْتُمُ الْعِجْلَ مِنْ بَعْدِهِ وَأَنْتُمْ ظَالِمُونَ (92)

    निसन्देह, मूसा तुम्हारे लिए अनके चमत्कार लाए, परन्तु तुमने उनकी अनुपस्थिति में बछड़े को (ईश्वर के स्थान पर) मान लिया जबकि तुम अत्याचारी थे। (2:92)इस बात का दूसरा तर्क कि यहूदियों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अरब होने को, उन पर ईमान ल जाने का एक बहाना बना रखा था ये था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम स्वयं उन्हीं के मूल के थे और उनके लिए अनेक स्पष्ट चमत्कार लाए थे परन्तु जब हज़रत मूसा नूर नामक पहाड़ पर तौरेत लेने के लिए गए तो बनी इस्राईल ने बछड़े की पूजा आरंभ कर दी और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के सारे कष्टों पर पानी फेर दिया। वास्तव में उन्होंने स्वयं पर भी और अपने नेता पर भी अत्याचार किया।

    सूरए बक़रह की 93वीं आयत का अनुवाद इस प्रकार है।

    وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَاقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ الطُّورَ خُذُوا مَا آَتَيْنَاكُمْ بِقُوَّةٍ وَاسْمَعُوا قَالُوا سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَأُشْرِبُوا فِي قُلُوبِهِمُ الْعِجْلَ بِكُفْرِهِمْ قُلْ بِئْسَمَا يَأْمُرُكُمْ بِهِ إِيمَانُكُمْ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (93)और याद करो उस समय को जब हम ने तुमसे प्रतिज्ञा ली थी और तूर पहाड़ की चोटियों को तुम्हारे ऊपर उठा दिया था और तुमसे कहा था कि जो कुछ हमने तौरेत और उसके आदेशों में से तुम्हें दिया है उसको मज़बूती से पकड़ो और सुनो। परन्तु उन्होंने कहाः हमने सुना और अवज्ञा की। अपने कुफ़्र के कारण उन्होंने अपने हृदय में बछड़े को बसा लिया। हे पैग़म्बर! उनसे कह दीजिए कि तुम्हारा ईमान तुम्हें जिस बात का आदेश देता है वो कितनी बुरी बात है, यदि तुम ईमान रखते हो। (2:93)हमने कहा था कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर ईमान न लाने के लिए यहूदी जाति का एक बहाना यह था कि वो बनी इस्राईल से नहीं हैं और हम केवल उसी पैग़म्बर पर ईमान लाएंगे जो हमारी जाति का हो और हम केवल मूसा की किताब तौरेत का पालन करेंगे।क़ुरआन ने पिछली आयतों में कुछ उदाहरण देकर ये सिद्ध कर दिया है कि ये अपने पैग़म्बर हज़रते मूसा और उनकी किताब तौरे पर भी ईमान नहीं रखते और उसके विपरीत काम करते हैं, इस आयत में भी ऐसे ही एक उदाहरण का वर्णन हुआ है।ईश्वर ने तूर नामक पहाड़ पर बनी इस्राईल से कुछ बातों की प्रतिज्ञा ली थी और उनसे कहा था कि उन प्रतिज्ञाओं पर प्रतिबद्ध रहें परन्तु उन लोगों ने सुनने के बाद भी अवज्ञा की क्योंकि अनेकेश्वरवाद तथा संसारप्रेम, जिसका एक उदाहरण सामेरी के सोने के बछड़े की उपासना थी, उनके हृदय में इतना अधिक रच-बस गया था कि सोच विचार और ईमान के लिए कोई स्थान नहीं बचा था और रोचक बात यह है कि इतनी सारी अवज्ञा के बाद भी उन्हें ईमान का दावा था।क़ुरआन उनके उत्तर में स्वयं उन्हीं से एक प्रश्न करता है कि क्या तुम्हारा ईमान तुम्हें आदेश देता है कि तुम ईश्वर की प्रतिज्ञा तोड़ो, बछड़े की पूजा करो और ईश्वरीय पैग़म्बरों की हत्या करो? यदि ऐसा ही है तो तुम्हारा ईमान तुम्हें बुरे आदेश देता है।

    इन आयतों से मिलने वाले पाठः

    • यदि हम देखते हैं कि आज यहूदी और ईसाई, इस्लाम स्वीकार नहीं करते तो हमें इस्लाम की सत्यता में सन्देह नहीं करना चाहिए, बल्कि उनमें से बहुत से ऐसे हैं जो सत्य को समझ चुके हैं परन्तु अहं और आत्मिक इच्छाओं के कारण उसे स्वीकार नहीं करते जैसा कि मदीने के यहूदी पैग़म्बरे इस्लाम को पहचान गए थे परन्तु उनपर ईमान नहीं लाए।• ईर्ष्या, कुफ़्र व इन्कार का कारण बनती है, बनी इस्राईल ने जब देखा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम उनमें से नहीं हैं तो उन्होंने ईर्ष्या के कारण उनका इन्कार कर दिया और उन्हें झुठलाया।

    • ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी हद से अधिक प्रेम ख़तरनाक है क्योंकि वह मनुष्य को वास्तविकताएं देखने नहीं देता। जब एक बछड़े की सोने की प्रतिमा ने बनी इस्राईल के हृदय में स्थान बना लिया, तो उनकी दृष्टि में ईश्वर, मूसा तथा तौरेत के आदेशों का महत्व समाप्त हो गया तथा उसके स्थान पर अनेकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा ने जड़ पकड़ ली।