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    सूरए बक़रह; आयतें 94-98 (कार्यक्रम 38)

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    सूरए बक़रह की ९४वीं और ९५वीं आयतें इस प्रकार हैं। قُلْ إِنْ كَانَتْ لَكُمُ الدَّارُ الْآَخِرَةُ عِنْدَ اللَّهِ خَالِصَةً مِنْ دُونِ النَّاسِ فَتَمَنَّوُا الْمَوْتَ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (94) وَلَنْ يَتَمَنَّوْهُ أَبَدًا بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ (95)हे पैग़म्बर! उन यहूदियों से कह दीजिए कि यदि प्रलय का घर स्वर्ग ईश्वर के पास तुम्हारे ही लिए है न कि अन्य लोगों के लिए तो यदि तुम सच्चे हो तो मृत्यु की आशा करो। (2:94) परन्तु हे पैग़म्बर उन्होंने जो बुरे कर्म स्वयं से पहले भेज रखे हैं उनके कारण वे कदापि मृत्यु की आशा नहीं करेंगे। और ईश्वर अत्याचारियों के कर्मों से पूर्णतः अवगत है। (2:95) यहूदी स्वयं को उत्तम समुदाय समझते रहे थे और उनका विचार था कि स्वर्ग को उन्ही के लिए बनाया गया है, नरक की आग उनके लिए नहीं है, वे ईश्वर के बच्चे और मित्र हैं। इन ग़लत विचारों के कारण एक ओर तो वे स्वतंत्रतापूर्वक हर प्रकार के अपराध, अत्याचार, पाप और विद्रोह करते थे और दूसरी ओर घमंड, स्वाभिमान और अहंकार में ग्रस्त रहते थे। यह आयत उनकी अंतरात्मा को फ़ैसले के लिए झिंझोड़ती है और कहती है कि यदि वास्तव में ऐसा ही जैसा तुम दावा करते हो और स्वर्ग केवल तुम्हारे लिए ही है तो तुम लोग मृत्यु की कामना क्यों नहीं करते कि जल्दी से स्वर्ग में चले जाओ, क्यों तुम लोग मौत से डरते हो और उससे भागते हो? मृत्यु के भय, यात्रा से वाहन चालक के भय के समान है, यात्रा से वो चालक भयभीत रहता है जो मार्ग को नहीं पहचानता या जिसके पास पेट्रोल नहीं होता या जिसने ट्रैफ़िक के क़ानून को तोड़ा होता है, या तस्करी का माल लेकर जा रहा होता है, या जिसका गंतव्य में कोई आवास नहीं होता। जबकि वास्तविक मोमिन रास्तें को भी पहचानता है और अच्छे कर्मों द्वारा रास्ते का ईंधन भी अपने पास रखता है। वो तौबा अर्थात पश्चाताप और प्राइश्चित द्वारा अपने उल्लंघनों की क्षतिपूर्ति भी कर देता है और उसके पास तस्करी का माल अर्थात पाप और अत्याचार भी नहीं होता है। प्रलय में उसके पास रहने का ठिकाना भी होगा जो कि स्वर्ग है। अधिकांश लोग जो मृत्यु से डरते हैं उनके भय का कारण इन दो बातों में से एक है। या तो वो मृत्यु को अंत समझते हैं और प्राकृतिक रूप से हर जीव अपने अंत से भयभीत रहता है, या वो प्रलय पर विश्वास रखते हैं परन्तु अपने बुरे कर्मों के कारण मृत्यु से डरते हैं क्योंकि वे मृत्यु को अपने कर्मों के फ़ैसले का आरंभ समझते हैं, इसीलिए वे चाहते हैं कि उनकी मृत्यु देर से आए। परन्तु पैग़म्बर और ईश्वरी दूत कि जो एक ओर मृत्यु को अंत नहीं बल्कि एक नए जीवन का आरंभ समझते हैं और दूसरी ओर उन्होंने विचार और व्यवहार में केवल अच्छी बातें की हैं, वे न केवल ये कि मृत्यु से नहीं डरते बल्कि उससे मिलने को उत्सुक रहते हैं। जैसा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने बारे में कहते हैं, ईश्वर की सौगंध अली को मृत्यु की चाह, दूध से शिशु की चाह से भी अधिक है।सूरए बक़रह की ९६वीं आयत इस प्रकार है।وَلَتَجِدَنَّهُمْ أَحْرَصَ النَّاسِ عَلَى حَيَاةٍ وَمِنَ الَّذِينَ أَشْرَكُوا يَوَدُّ أَحَدُهُمْ لَوْ يُعَمَّرُ أَلْفَ سَنَةٍ وَمَا هُوَ بِمُزَحْزِحِهِ مِنَ الْعَذَابِ أَنْ يُعَمَّرَ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِمَا يَعْمَلُونَ (96)और (हे पैग़म्बर) तुम यहूदियों को सांसारिक जीवन के प्रति लोगों यहां तक कि अनेकेश्वरवादियों की तुलना में अधिक लोभी पाओगे, यहां तक कि उनमें से हर एक चाहता है कि हज़ार वर्ष की आयु बिताए, हलांकि यदि उन्हें ये लम्बी आयु दे भी दी जाए तो उन्हें दंड से नहीं रोक पाएगी और ईश्वर उनके कर्मों को देखने वाला है। (2:96) यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है यहूदी जो ये दावा करते हैं कि स्वर्ग केवल उन्हीं के लिए है, न केवल ये कि मृत्यु की कामना नहीं करते कि शीघ्र ही स्वर्ग में चले जाएं बल्कि अन्य लोगों यहां तक कि अनेकेश्वरवादियों से भी अधिक इस संसार के जीवन का लोभ रखते हैं जबकि अनेकेश्वरवादी तो प्रलय को स्वीकार ही नहीं करते और मृत्यु को ही अपने जीवन का अंत समझते हैं। वे सांसारिक जीवन से इतना प्रेम करते हैं कि चाहते हैं इस संसार में हज़ार वर्षों तक जीवन व्यतीत करें, यहां तक कि वे दुर्भाग्य से पूर्ण अत्यंत तुच्छ जीवन व्यतीत करने के लिए भी तैयार हैं ताकि ईश्वरीय दंड और प्रकोप से भी बचे रहें और सांसारिक धन बटोरने का प्रयास भी करते रहें। परन्तु ईश्वर कहता है कि यदि उन्हें हज़ार वर्ष की आयु दे भी दी जाए तक भी वो ईश्वरीय दंड से उनकी मुक्ति का कारण नही बन सकती क्योंकि उनके सभी कर्म ईश्वर की दृष्टि में हैं और इन बचकाना आशाओं का कोई लाभ नहीं है।सूरए बक़रह की ९७वीं और ९८वीं आयतें इस प्रकार हैं।قُلْ مَنْ كَانَ عَدُوًّا لِجِبْرِيلَ فَإِنَّهُ نَزَّلَهُ عَلَى قَلْبِكَ بِإِذْنِ اللَّهِ مُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهِ وَهُدًى وَبُشْرَى لِلْمُؤْمِنِينَ (97) مَنْ كَانَ عَدُوًّا لِلَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَرُسُلِهِ وَجِبْرِيلَ وَمِيكَالَ فَإِنَّ اللَّهَ عَدُوٌّ لِلْكَافِرِينَ (98)(हे पैग़म्बर उन लोगों से जो ये कहते हैं कि यिद जिब्रईल तुम्हारे लिए वहय अर्थात ईश्वरीय सन्देश लाते हैं, तो हम तुम पर ईमान नहीं लाएंगे क्योंकि हम जिब्रईल के शत्रु हैं) कह दो कि जो जिब्रईल का शत्रु है (वास्तव में वह ईश्वर का शत्रु है) क्योंकि जिब्रईल ने ईश्वर के आदेश से क़ुरआन को तुम्हारे हृदय पर उतारा है, वो क़ुरआन जो पहले की आस्मानी किताबों की पुष्टि करने वाला और ईमान वालों के लिए शुभ सूचना है। (2:97) और जो कोई भी ईश्वर, उसके फ़रिश्तों व पैग़म्बरों और जिब्रईल व मीकाईल का शत्रु है तो (वह जान ले कि) ईश्वर काफ़िरों का शत्रु है। (2:98) जब पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम मदीने आए तो यहूदियों का एक गुट अपने एक ज्ञानी के साथ उनके पास आया और उनसे कुछ प्रश्न किये, उन्होंने एक प्रश्न ये किया कि उस फ़रिश्ते का क्या नाम है जो आपके पास ईश्वरीय संदेश लेकर आता है। जब पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि उसका नाम जिब्रईल है तो उन्होंने कहा कि यदि वो मीकाईल होता तो हम ईमान ले आते क्योंकि जिब्रईल हमारा शत्रु है और जेहाद अर्थात धर्मयुद्ध जैसे कड़े आदेश लाता है। जब मनुष्य सत्य को स्वीकार न करना चाहे तो वो बहाने ढूंढता है, यहां तक कि वो किसी फ़रिश्ते पर बेजा कड़ाई का आरोप लगाने पर ही तैयार हो जाता है कि शायद सत्य को स्वीकार न करने का कोई मार्ग बचा रहे। बिल्कुल उस नटखट विद्यार्थी की भांति जो गणित के अध्यापक को बुरा और खेल के अध्यापक को अच्छा समझता है। नैतिक रूप से ईश्वरीय फ़रिश्ते चाहे जिब्रईल हों या मीकाईल, अपनी ओर से कोई आदेश नहीं लाते कि उनसे मित्रता या शत्रुता की जाए। वे ईश्वर के आदेश के अतिरिक्त कुछ नहीं करते वे केवल ईश्वर और उसके पैग़म्बरों के बीच केवल एक माध्यम हैं अतः यहूदियों की बातें इस्लाम स्वीकार न करने के लिए केवल एक बहाना थीं न कि इस्लाम स्वीकार करने के लिए कोई स्वीकारीय तर्क।आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा। मनुष्य को इस प्रकार जीवन व्यतीत करना चाहिए कि वो सदैव, हर पल मरने के लिए तैयार रहे। उसने अपने कर्तव्यों का ठीक से पालन किया हो और पापों की प्राइश्चित द्वारा भरपाई कर ली हो, इस दशा में मृत्यु से डरने का कोई कारण नहीं है। लम्बी आयु महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आयु की विभूति मूल्यवान है जो ईश्वर के सामिप्य में है। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम एक प्रार्थना में कहते हैं, प्रभुवर यदि मेरी आयु तेरे आज्ञापालन का साधन हो तो उसे लंबा कर दे परन्तु यदि वो शैतान की शिकारगाह हो तो उसे समाप्त कर दे। धर्म कई बातों के एक समूह का नामक है तथा उसकी हर बात पर आस्था रखना आवश्यक है, ये नहीं कहा जा सकता मैं ईश्वर पर ईमान रखता हूं परन्तु इस फ़रिश्ते को शत्रु समझता हूं या उस पैग़म्बर पर विश्वास नहीं रखता। सच्चा मोमिन ईश्वर और उसके सभी पैग़म्बरों और फ़रिश्तों पर ईमान रखता है।