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    सूरए बक़रह; आयतें 99-102 (कार्यक्रम 39)

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    सूरए बक़रह की ९९वीं आयत इस प्रकार है।وَلَقَدْ أَنْزَلْنَا إِلَيْكَ آَيَاتٍ بَيِّنَاتٍ وَمَا يَكْفُرُ بِهَا إِلَّا الْفَاسِقُونَ (99)(हे पैग़म्बर) हमने तुम्हारी ओर स्पष्ट आयतें भेजीं हैं कि जिनका इन्कार अवज्ञाकारियों के अतिरिक्त कोई नहीं करता। (2:99) पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि मदीना नगर के यहूदी इस्लाम स्वीकार न करने के लिए विभिन्न प्रकार के बहाने बनाते थे उदाहरण स्वरूप उन्होंने कहा कि चूंकि जिब्रईल ने ये आयतें तुम पर उतारी हैं अतः हम तुम पर ईमान नहीं लाएंगे। इस आयत में उनके एक अन्य बहाने का उल्लेख हुआ है। वे कहते हैं कि हम इस किताब से कुछ नहीं समझते और इसकी बातें हमारे लिए अस्पष्ट हैं अतः हम तुम पर ईमान नहीं लाएंगे और क़ुरआन को तुम्हारे चमत्कार के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। जबकि क़ुरआन के अध्ययन तथा उसकी आयतों पर सोच विचार करके सरलता से पैग़म्बरे इस्लाम की नुबुव्वत अर्थात उनके ईश्वरीय दूत होने की सच्चाई और क़ुरआन की महानता को समझा जा सकता है, अलबत्ता इस वास्तविक्ता को केवल वही लोग समझ सकते हैं जिनके हृदय पाप के कारण अन्धकारमय न हो गए हों और जो सत्य को स्वीकार करने की योग्यता रखते हों। क्योंकि पाप, कुफ़्र का आधार है और मनुष्य अनुचित इच्छाओं के पालन द्वारा कुफ़्र की ओर झुकने लगता है और सत्य को छिपाने का प्रयास करता है, क्योंकि यदि वो सत्य को स्वीकार करले तो सरलता से पाप नहीं कर सकता। सूरए बक़रह की सौवीं आयत इस प्रकार है।أَوَكُلَّمَا عَاهَدُوا عَهْدًا نَبَذَهُ فَرِيقٌ مِنْهُمْ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ (100)क्या ऐसा नहीं था कि हर बार जब उन यहूदियों ने ईश्वर से प्रतिज्ञा की तो उनमें एक गुट ने उसे तोड़ दिया और उसका विरोध किया, बल्कि इनमें से अधिकांश ईमान नहीं लाएंगे। (2:100) यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सांत्वना देते हुए कहती है कि यदि यहूदी ईमान नहीं लाते तो तुम निराश मत हो क्योंकि ये वहीं समुदाय है जो अपने पैग़म्बर के प्रति भी वफ़ादार नहीं रहा है और इसने जब भी हज़रत मूसा से कोई प्रतिज्ञा की तो उसे अवश्य तोड़ दिया तथा बहाने बाज़ी और हठ में इनका बड़ा पुराना इतिहास है। जब पैग़म्बरे इस्लाम मदीने पहुंचे तो वहां के यहूदियों ने उनसे समझौता किया कि वे कम से कम उनके शत्रुओं की सहायता नहीं करेंगे परन्तु उन्होंने इस समझौते को भी तोड़ दिया और अहज़ाब नामक युद्ध में उन्होंने मुसलमानों के विरुद्ध मक्के के अनेकेश्वरवादियों का साथ दिया। आज भी ज़ायोनी इस्राईल में किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौते या क़ानून पर प्रतिबद्ध नहीं हैं और यदि वे किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर भी देते हैं तो शीघ्र ही उसका उल्लंघन कर देते हैं क्योंकि यहूदी एक जातिवादी और वशिष्टताप्रेमी समुदाय है।अब सूरए बक़रह की आयत नंबर १०१ का अनुवाद प्रस्तुत करते हैं।وَلَمَّا جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌ مِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ كِتَابَ اللَّهِ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ (101)और जब (पैग़म्बरे इस्लाम) ईश्वरीय दूत के रूप में उनके पास आए, जिसकी निशानियां उनके पास मौजूद निशानियों के अनुकूल थीं तो उनमें से एक गुट ने, जिसके पास आस्मानी किताब थी, ईश्वर की किताब को इस प्रकार पीछे डाल दिया मानो उसके बारे में उन्हें कोई ख़बर ही न हो। (2:101) पैग़म्बरे इस्लाम के आगमन से पूर्व यहूदियों के धर्मगुरू लोगों को उनके आने की शुभ सूचना दिया करते थे और तौरेत में वर्णित उनकी निशानियों का उल्लेख करते थे परन्तु जब उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम को देखा तो इस प्रकार उनका इन्कार किया मानो उनके बारे में उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं हो। जी हां, पद प्रेम का ख़तरा, सभी लोगों विशेषकर ज्ञानियों को लगा रहता है। जब यहूदियों के ज्ञानियों और धर्मगुरूओं को ये आभास हुआ कि यदि वे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सत्यता को स्वीकार करलें तो उनका सांसारिक पद उनसे छिन जाएगा तो उन्होंने पैग़म्बर के ईश्वरीय दूत होने का इन्कार कर दिया। अलबत्ता पवित्र क़ुरआन जो न्याय के आधार पर इतिहास का वर्णन करता है, यहूदियों के अच्छे और पवित्र लोगों के अधिकारों को सुरक्षित रखता है और कहता है कि उनमें से अधिक्तर ने इन्कार किया, अर्थात उनके एक गुट ने सत्य को स्वीकार किया यद्यपि उनकी संख्या कम ही थी।अब सूरए बक़रह की आयत नंबर १०२ का अनुवाद प्रस्तुत करते हैं।وَاتَّبَعُوا مَا تَتْلُو الشَّيَاطِينُ عَلَى مُلْكِ سُلَيْمَانَ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمَانُ وَلَكِنَّ الشَّيَاطِينَ كَفَرُوا يُعَلِّمُونَ النَّاسَ السِّحْرَ وَمَا أُنْزِلَ عَلَى الْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَارُوتَ وَمَارُوتَ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ أَحَدٍ حَتَّى يَقُولَا إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِ بَيْنَ الْمَرْءِ وَزَوْجِهِ وَمَا هُمْ بِضَارِّينَ بِهِ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنْفَعُهُمْ وَلَقَدْ عَلِمُوا لَمَنِ اشْتَرَاهُ مَا لَهُ فِي الْآَخِرَةِ مِنْ خَلَاقٍ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا بِهِ أَنْفُسَهُمْ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ (102)यहूदियों ने तौरेत का अनुसरण करने के स्थान पर सुलैमान के काल में जो कुछ जादू टोने शैतान पढ़ा करते थे उसका अनुसरण किया जबकि सुलैमान ने कभी भी अपने हाथों को जादू टोने से दूषित नहीं किया और काफ़िर नहीं हुए बल्कि वो शैतान काफ़िर हुए जो लोगों को जादू टोना सिखाते थे। और यहूदियों ने शहर बाबिल के दो फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर जो कुछ उतारा गया था उसका अनुसरण किया, यद्यपि वे दोनों लोगों को कुछ नहीं सिखाते थे, जब तक कि कह न देते थे कि हम तो बस तुम्हारी परीक्षा का माध्यम हैं तो तुम इसे सीख कर कुफ़्र में न पड़ता। तो ये लोग उनसे केवल वो चीज़ सीखते जिसके द्वारा पति पत्नी में फूट डाल सकें, यद्यपि यह लोग उससे ईश्वर के आदेश के बिना किसी को कोई हानि नहीं पहुंचा सकते थे, और ये वो चीज़ सीखते थे जो उनके लिए हानिकारक थी, लाभदायक नहीं थी। और वे भलि भांति जानते थे कि जो कोई इस चीज़ का ग्राहक हुआ उसका प्रलय में कोई भाग नहीं होगा, क्या ही बुरी चीज़ है जिसके बदले उन्होंने अपने प्राणों का सौदा किया, क्या ही अच्छा होता कि वे इसको जानते। (2:102) हज़रत सुलैमान पैग़म्बर के काल में जादू टोने का बहुत अधिक प्रचलन था अतः उन्होंने आदेश दिया कि सभी जादूगरों की पोथियों को एकत्रित किया जाए और उनकी देखभाल की जाए परन्तु उनके पश्चात एक गुट को वो पोथियां मिल गईं और उन्होंने समाज में जादू की शिक्षा और उसे फैलाना आरंभ किया। यह आयत कहती है कि बनी इस्राईल के कुछ लोगों ने तौरेत का अनुसरण करने के स्थान पर, जादू टोने की उन्ही किताबों का अनुसरण किया और अपने कार्य के औचित्य में कहा कि ये किताबें सुलैमान से संबंधित हैं और वे एक बहुत बड़े जादूगर थे। क़ुरआन उनके उत्तर में कहता है, सुलैमान कदापि जादूगर नहीं थे बल्कि वो ईश्वरीय दूत हैं और उन्होंने जो कुछ किया वो जादू नहीं चमत्कार था और तुम लोगों ने उन शैतानों का अनुसरण किया जो इन बातों को प्रचलित करते थे। अलबत्ता यहूदियों ने एक अन्य मार्ग से भी जादू सीखा था। वह इस प्रकार कि हारूत व मारूत नामक दो ईश्वरीय फ़रिश्ते मनुष्य के रूप में आकर बाबिल नगर के लोगों को जादू का तोड़ सिखाते थे। यद्यपि ये दो फ़रिश्ते लोगों को ये आदेश देते रहते थे कि उन्हें इस पद्धति का ग़लत प्रयोग नहीं करना चाहिए परन्तु वे लोग इस ज्ञान का दुरुपयोग करके अपने भौतिक हितों व लक्ष्यों की पूर्ति किया करते थे। बहरहाल यहूदियों ने इन दो मार्गों से जादू सीख लिया था और उसे अपने अनैतिक हितों के लिए प्रयोग कर रहे थे जबकि वे जानते थे कि जादू का परिणाम कुफ़्र के समान है और वो परिवार तथा समाज को नुक़सान पहुंचाता है। ये आयत बताती है कि जादू वास्तविक्ता रखता है और मानव जीवन में प्रभावशाली है, परन्तु चूंकि हर बात ईश्वर के हाथ में है अतः उससे शरण मांग कर तथा उसपर भरोसा करके और प्रार्थना और दान दक्षिणा द्वारा जादू के बुरे परिणामों से बचा जा सकता है। इसी प्रकार यह भी ज्ञात होता है कि ज्ञान सीखना भी सदैव लाभदायक नहीं होता यदि सीखने वाला अच्छा आदमी न हो तो वो ज्ञान द्वारा लोगों की सेवा के स्थान पर समाज में बुराई फैलाता है।आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा। यदि हम देखते हैं कि बहुत से मनुष्य ईमान लाने के लिए तैयार नहीं हैं तो हमें ईश्वरीय धर्मों में सन्देह नहीं करना चाहिए बल्कि ये समझना चाहिए कि पाप और अपराध मनुष्य की आत्मा पर इतना प्रभाव डालता है कि वो सत्य को स्वीकार करने की तत्परता खो बैठता है। केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है बल्कि सत्य को स्वीकार करने की भावना भी आवश्यक है। यहूदियों के ज्ञानियों को तौरेत के आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम की सत्यता का ज्ञान था परन्तु न केवल ये कि वे स्वंय उनपर ईमान नहीं लाए बल्कि दूसरों को भी उनपर ईमान लाने से रोकते थे। ज्ञान सदैव लाभदायक नहीं है बल्कि वो एक तेज़ चाक़ू की भांति है कि यदि डाक्टर के हाथ में हो तो रोगी की मृत्यु से मुक्ति का कारण बनता है और यदि किसी हत्यारे के हाथ में हो तो स्वस्थ मनुष्य की मौत का कारण बनता है। शैतान, पति-पत्नी के बीच मतभेद उत्पन्न करने और समाज में फूट डालने का प्रयास करते हैं जबकि फ़रिश्ते पति-पत्नी के बीच सुधार व शांति चाहते हैं। मनुष्यों के भी दो गुट हैं एक गुट शैतान के मार्ग पर चलता है तथा दूसरा फ़रिश्तों के मार्ग पर।