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    सूरए बक़रह; आयत २३ (कार्यक्रम 12)

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    सूरए बक़रह की २३वीं आयत इस प्रकार है।وَإِنْ كُنْتُمْ فِي رَيْبٍ مِمَّا نَزَّلْنَا عَلَى عَبْدِنَا فَأْتُوا بِسُورَةٍ مِنْ مِثْلِهِ وَادْعُوا شُهَدَاءَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (23)और यदि तुम्हें उस चीज़ अर्थात क़ुरआन के बारे में, जो हमने अपने दास अर्थात पैग़म्बर पर उतारी है, संदेह है तो तुम कम से कम उस जैसा एक सूरह ही ले आओ और अल्लाह के अतिरिक्त जो तुम्हारी सहायता करने वाले हों उनको भी बुला लो, यदि तुम सच्चे हो। (2:23) हर पैग़म्बर को अपनी पैग़म्बरी सिद्ध करने के लिए ऐसा चमत्कार प्रस्तुत करना होता है जिसे अन्य लोग न कर सकें। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का चमत्कार पवित्र क़ुरआन है जिसका किसी भी प्रकार से उदाहरण लाने में मानव जाति असमर्थ है। ईश्वर ने अनेक बार इस्लाम विरोधियों को मुक़ाबले का निमंत्रण दिया है कि यदि तुम इस किताब को ईश्वर की किताब नहीं समझते तथा इसे मनुष्य द्वारा लिखी हुई किताब समझते हो तो इसी जैसी एक किताब ले आओ ताकि इस्लाम की आवाज़ मंद पड़ जाए। रोचक बात तो यह है कि पवित्र क़ुरआन ने मुक़ाबले के इस निमंत्रण में कई बार अपने शत्रुओं को छूट भी दी है। क़ुरआन एक बार कहता है कि उसी की भांति कोई किताब ले आओ। एक अन्य स्थान पर कहता है कि क़ुरआन जैसे दस सूरे ले आओ और इस आयत में कहता है कि कम से कम क़ुरआन की भांति एक सूरह ही ले आओ। दूसरी ओर क़ुरआन इस काम के लिए उन्हें प्रोत्साहन भी देता है। वह कहता है कि इस काम के लिए तुम पूरे संसार में अपने मित्रों और अपने जैसे विचार रखने वालों को आमंत्रित करो और सबसे सहायता मांगो। परन्तु यह जान लो कि तुममें इस काम की क्षमता नहीं है। यद्यपि सभी पैग़म्बरों के पास मोजिज़ा या चमत्कार था परन्तु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के चमत्कार अर्थात क़ुरआन की कुछ ख़ास विशेषताएं हैं जिनमें से चार का हम संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। पहली विशेषता क़ुरआन का बोलना है। अन्य पैग़म्बरों के चमत्कारों की ज़बान नहीं थी। उन्हें उनके चमत्कार का परिचय कराना पड़ता था परन्तु क़ुरआन को परिचय की आवश्यकता नहीं है बल्कि वह स्वयं विरोधियों को मुक़ाबले का निमंत्रण देता है। क़ुरआन स्वयं क़ानून भी है और क़ानून का प्रमाण भी। क़ुरआन की दूसरी विशेषता उसका स्थाई व सर्वकालिक होना है। अन्य पैग़म्बरों के चमत्कार एक विशेष काल में प्रकट हुए तथा उसी समय के लोगों ने उन्हें देखा या सुना था परन्तु क़ुरआन, केवल पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल के लिए चमत्कार नहीं था बल्कि हर काल के लिए है और समय बीतने के कारण न केवल यह कि उसमें अस्थिरता नहीं आई है वरन् उसकी बातें और शिक्षाएं दिन-प्रतिदिन अधिक स्पष्ट होती जा रही हैं। पवित्र क़ुरआन की तीसरी विशेषता उसका विश्वव्यापी होना है। जिस प्रकार से क़ुरआन किसी ख़ास समय से विशेष नहीं है उसी प्रकार वह किसी ख़ास स्थान से भी विशेष नहीं है। क़ुरआन के संबोध्य केवल हेजाज़ के अरब लोग नहीं हैं बल्कि क़ुरआन का संबोधन हर राष्ट्र तथा हर मूल के लोगों से है। इसी कारण क़ुरआन में कहीं भी हे अरब लोगों, नहीं कहा गया बल्कि सभी लोगों को संबोधित करते हुए हे लोगो! कहा गया है। पवित्र क़ुरआन की चौथी विशेषता उसका उसका आत्मिक होना है। आम तौर पर अन्य पैग़म्बरों के चमत्कार भौतिक हुआ करते थे और आंखों तथा कानों को आश्यर्च में डाल देते थे। परन्तु क़ुरआन, कथन और बातचीत के रूप में है तथा यह सामान्य अक्षरों से बना हुआ है परन्तु मनुष्य की आत्मा पर ऐसा प्रभाव डलता है कि बुद्धि को सम्मान करने पर विवश कर देता है। इस आयत से हमने यह बातें सीखीं।पैग़म्बरों की महत्वपूर्ण विशेषता जिसके कारण वे वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने के योग्य हो सके, केवल ईश्वर का दास होना तथा उसकी उपासना करना है अतः क़ुरआन ने कई आयतों में पैग़म्बरों को अपना दास कहा है जैसा कि इस आयत में भी कहा गया है, हमने क़ुरआन को अपने दास पर उतारा है।क़ुरआन तर्क की किताब है और शंका या संदेह का कोई मार्ग नहीं छोड़ती। इस आधार पर ईश्वर कहता है, यदि तुम्हें संदेह है तो उस जैसा एक ही सूरा ले आओ। पवित्र क़ुरआन ईश्वर का स्थायी चमत्कार है।इस्लाम एक विश्वव्यापी एवं स्थायी धर्म है क्योंकि उसका चमत्कार क़ुरआन भी ऐसा ही है और वह किसी समय, स्थान या पीढ़ी से विशेष नहीं है। हमें अपने भीतर धर्म के सिद्धातों के प्रति किसी भी प्रकार की शंका उत्पन्न नहीं होने देनी चाहिए और यदि कोई शंका उत्पन्न होती है तो उसे तुरंत दूर कर लेना चाहिए ताकि हमारे धर्म में अस्थिरता न पैदा हो सके।सबसे अच्छा फ़ैसला अंतरात्मा करती है। यह आयत कहती है कि यदि तुम्हारी अंतरात्मा भी कह दे कि जो कुछ तुम लाए हो वह क़ुरआन के समान है तो हम स्वीकार कर लेंगे अर्थात फ़ैसला, हम स्वयं तुम पर छोड़ते हैं।पवित्र क़ुरआन की सत्यता इतनी विश्वसनीय है कि यदि विरोधी, क़ुरआन के समान एक सूरह भी ले आएं तो हम उसे सम्पूर्ण क़ुरआन के स्थान पर स्वीकार कर लेंगे।