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    सूरए मरयम, आयतें 1-5, (कार्यक्रम 526)

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    इससे पहले सूरए कह्फ़ की व्याख्या समाप्त हुई और अब क़ुरआने मजीद के 19वें सूरे अर्थात सूरए मरयम की व्याख्या आरंभ हो रही है। यह सूरा मक्का नगर में ईश्वर की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भेजा गया।

    इस सूरे में हज़रत ज़करिया, हज़रत मरयम, हज़रत ईसा और इसी प्रकार हज़रत यहया, इब्राहीम, इस्माईल और हज़रत इदरीस अलैहिमस्सलाम जैसे पैग़म्बरों के जीवन की कुछ घटनाओं का उल्लेख किया गया है। रोचक बात यह है कि हज़रत मरयम के अतिरिक्त किसी अन्य महिला के नाम पर पूरे क़ुरआने मजीद में कोई अन्य सूरा नहीं है।

    तो आइये पहले सूरए मरयम की पहली, दूसरी और तीसरी आयतों की तिलावत सुनें।

    بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ كهيعص (1) ذِكْرُ رَحْمَةِ رَبِّكَ عَبْدَهُ زَكَرِيَّا (2) إِذْ نَادَى رَبَّهُ نِدَاءً خَفِيًّا (3)

    अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है, काफ़ हा या ऐन साद,(19:1) यह अपने बंदे ज़करिया पर आपके पालनहार की कृपा का वर्णन है, (19:2) जब उन्होंने अपने पालनहार को धीमी आवाज़ में पुकारा।(19:3)

    सूरए मरयम भी क़ुरआने मजीद के अन्य 28 सूरों की भांति हुरूफ़े मुक़त्तआत या विच्छेदित अक्षरों से आरंभ हुआ है। इससे पूर्व अनेक बार बताया जा चुका है कि क़ुरआने मजीद के लगभग एक चौथाई सूरों के आरंभ में आने वाले इन अक्षरों का अर्थ उन रहस्यों में से है जिसका ज्ञान अब तक मनुष्य के पास नहीं है और आशा की जाती है कि पैग़म्बरे इस्लाम के अंतिम उत्तराधिकारी हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के प्रकट होने के बाद इन अक्षरों का रहस्य खुल जाएगा।

    हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम, हज़रत मूसा के भाई हज़रत हारून की संतानों में से एक हैं। वे बनी इस्राईल की ओर भेजे गए पैग़म्बरों में से एक हैं और क़ुरआने मजीद में उनके नाम का सात बार उल्लेख हुआ है।

    ईश्वर, क़ुरआने मजीद में कुछ पैग़म्बरों और कुछ जातियों के वृत्तांत का वर्णन करता है ताकि अच्छे व बुरे लोगों के प्रति अपने प्रेम व कोप को दर्शाए और यह बात हमारे और आगामी पीढ़ियों के लिए पाठ रहे। ये आयतें हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम पर ईश्वर की दया व कृपा की ओर संकेत करती हैं जिन्होंने लोगों से दूर रहकर एकांत में ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उन्हें संतान प्रदान करे।

    शायद उन्होंने यह प्रार्थना एकांत में इस लिए की कि लोग उनका परिहास न करें और यह न कहें कि यह बूढ़ा व्यक्ति अपनी आयु के अंतिम दिनों में अपने सफ़ेद बालों के साथ ईश्वर से संतान की प्रार्थना कर रहा है। अलबत्ता पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और उनके परिजनों के कथनों के अनुसार उत्तम प्रार्थना वही है जो एकांत में और धीमी आवाज़ में की जाए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदों के नामों का उल्लेख और उनका स्मरण एक मान्यता है जिसकी सीख ईश्वर ने हमें क़ुरआने मजीद में दी है।

    जीवन में प्रार्थना की भूमिका की ओर से निश्चेत नहीं रहना चाहिए क्योंकि प्रार्थना ईश्वर की दया व कृपा को प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करती है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 4 और 5 की तिलावत सुनें।

    قَالَ رَبِّ إِنِّي وَهَنَ الْعَظْمُ مِنِّي وَاشْتَعَلَ الرَّأْسُ شَيْبًا وَلَمْ أَكُنْ بِدُعَائِكَ رَبِّ شَقِيًّا (4) وَإِنِّي خِفْتُ الْمَوَالِيَ مِنْ وَرَائِي وَكَانَتِ امْرَأَتِي عَاقِرًا فَهَبْ لِي مِنْ لَدُنْكَ وَلِيًّا (5)

    ज़करिया ने कहा, प्रभुवर! निश्चित रूप से मेरी हड्डियां कमज़ोर हो गई हैं और मेरे (सिर के बाल) बुढ़ापे से सफ़ेद हो गए हैं और मैं कभी भी तेरी ओर से प्रार्थना (की स्वीकृति) से वंचित नहीं रहा हूं।(19:4) हे मेरे पालनहार! मुझे अपने बाद अपने परिजनों के बारे में भय है और मेरी पत्नी बांझ है तो तू अपनी ओर से मुझे एक उत्तराधिकारी प्रदान कर।(19:5)

    इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि हज़रत ज़करिया वृद्ध हो चुके थे किंतु उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्हें चिंता थी कहीं ऐसा न हो कि उनके पश्चात उनकी जाति के कुछ लोग जिनमें उनका उत्तराधिकारी बनने की योग्यता व क्षमता नहीं थी, स्वयं को उनके उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तुत कर दें। इसी कारण उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उन्हें एक योग्य पुत्र प्रदान करे जो उनका उत्तराधिकारी बने और उनके बाद उनके मार्ग को जारी रखे। किंतु विदित रूप से यह प्रार्थना स्वीकार होने योग्य नहीं थी क्योंकि हज़रत ज़करिया और उनकी पत्नी दोनों ही बहुत अधिक वृद्ध हो चुके थे और स्वाभाविक रूप से उनके माता-पिता बनने की संभावना नहीं थी।

    किंतु ईश्वर के हाथ बंधे हुए नहीं हैं, जिसने इस सृष्टि की रचना की है और इसके लिए क़ानून निर्धारित किए हैं वह जब चाहे और जहां आवश्यक हो इन क़ानूनों को समाप्त कर सकता है, जिस प्रकार से कि ईश्वर की इच्छा से हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सालम के लिए आग ठंडी हो गई और उसकी जलाने की विशेषता समाप्त हो गई।

    सैद्धांतिक रूप से ईमान वाला व्यक्ति भौतिक व रसायन शास्त्र के सिद्धांतों को स्वीकार करता है और उन्हें समझने व प्रयोग करने का प्रयास करता है किंतु वह ईश्वर की शक्ति को प्रकृति से इतर समझता है। वह स्वयं को और अपनी इच्छाओं को भौतिक क़ानूनों के परिप्रेक्ष्य में सीमित नहीं समझता।

    स्पष्ट है कि उन इच्छाओं की प्राप्ति का सबसे उत्तम मार्ग, जिन्हें स्वाभाविक एवं प्राकृतिक ढंग से प्राप्त करना संभव नहीं है, ईश्वर से प्रार्थना करना है। अलबत्ता वह प्रार्थना जो व्यक्ति एवं समाज के विकास का कारण हो न कि आंतरिक इच्छाओं के चलते अनुचित प्रार्थना। महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति को अपना हर संभव प्रयास व प्रयत्न करना चाहिए, यह सोच कर नहीं बैठ जाना चाहिए कि प्रार्थना, कार्य व प्रयास का स्थान ले सकती है।

    यहां इस बात पर ध्यान रहना चाहिए कि प्रार्थना का स्वीकार होना, ईश्वर की तत्वदर्शिता पर निर्भर है और संभव है कि हमारे भरपूर प्रयास और प्रार्थना के बावजूद हमारी इच्छाएं पूरी न हों, अतः हमें निराश नहीं होना चाहिए बल्कि इस बात पर विश्वास रखना चाहिए कि ईश्वर उन बातों को जानता है जिन्हें हम नहीं जानते और संभव है कि प्रार्थना का स्वीकार होना हमारे हित में न होता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर पर ईमान रखने वाले लोग सदैव उसकी दया की ओर से आशावान रहते हैं क्योंकि ईश्वर की दया की ओर से निराशा, मनुष्य की तबाही का कारण बनती है।

    ईश्वर, मनुष्य की इच्छाओं से अवगत है किंतु प्रार्थना करना, मनुष्य के भीतर विकास, बंदगी की भावना और निष्ठा का कारण बनता है और मनुष्य को आभास होता है कि उसे ईश्वर की आवश्यकता है अतः दूसरों से मन नहीं लगाना चाहिए।

    भली संतान, ईश्वरीय अनुकंपा है जो मृत्यु के पश्चात भी मनुष्य की भलाइयों के जारी रहने का कारण बनती है।