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    सूरए मरयम, आयतें 12-17, (कार्यक्रम 528)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 12 और 13 की तिलावत सुनें।

    يَا يَحْيَى خُذِ الْكِتَابَ بِقُوَّةٍ وَآَتَيْنَاهُ الْحُكْمَ صَبِيًّا (12) وَحَنَانًا مِنْ لَدُنَّا وَزَكَاةً وَكَانَ تَقِيًّا (13)

    हे यहया! (ईश्वर की) किताब को दृढ़ता से पकड़े रहो। और हमने उन्हें बचपने में ही पैग़म्बरी प्रदान कर दी।(19:12) और अपनी ओर से कृपा व पवित्रता भी प्रदान की और वे ईश्वर से डरने वाले थे।(19:13)

    इससे पहले बताया गया था कि ईश्वर ने अपने पैग़म्बर हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम की प्रार्थना को स्वीकार किया और उनके तथा उनकी पत्नी के बहुत वृद्ध होने के बावजूद उन्हें एक पुत्र प्रदान किया। ईश्वर ने उस बच्चे का नाम, यहया भी स्वयं निर्धारित किया।

    ये आयतें कहती हैं कि ईश्वर ने इस बच्चे को तथ्यों व तत्वदर्शिता को समझने के लिए बड़ी प्रबल बुद्धि प्रदान की थी। वे बड़े ही पवित्र व सभी से प्रेम करने वाले व्यक्ति थे। उन्हें ईश्वर की ओर से इस बात का आदेश था कि वे अपने समय की आसमानी किताब अर्थात तौरैत के आदेशों के क्रियान्वयन के लिए हर संभव प्रयास करें तथा उस किताब को लोगों के समझाने के लिए बहुत गंभीरता से काम लें।

    अलबत्ता ईश्वर का यह आदेश केवल हज़रत यहया से विशेष नहीं था और क़ुरआने मजीद ने विभिन्न आयतों में ईश्वरीय पैग़म्बरों के अनुयाइयों को, आसमानी किताब का ज्ञान प्राप्त करने तथा उसे क्रियान्वित करने के माध्यम से जीवन में गंभीर प्रयास करने की सिफ़ारिश की है तथा ईश्वरीय आदेशों के पालन में हर प्रकार की ढिलाई से रोका है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों व उनके अनुयाइयों का दायित्व है कि वे धार्मिक आदेशों को व्यवहारिक बनाने में गंभीर व दृढ़ रहें तथा समाज में ईश्वरीय धर्म की रक्षा करें।

    दूसरों के साथ प्रेम और ईश्वर के बंदों के प्रति स्नेह का व्यवहार, एक ईश्वरीय गुण है जिसे वह अपने प्रिय बंदों को भी प्रदान करता है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 14 और 15 की तिलावत सुनें।

    وَبَرًّا بِوَالِدَيْهِ وَلَمْ يَكُنْ جَبَّارًا عَصِيًّا (14) وَسَلَامٌ عَلَيْهِ يَوْمَ وُلِدَ وَيَوْمَ يَمُوتُ وَيَوْمَ يُبْعَثُ حَيًّا (15)

    और यहया अपने माता-पिता के प्रति बहुत अधिक भलाई करने वाले थे और (लोगों के प्रति) उद्दंडी व अवज्ञाकारी नहीं थे।(19:14) तो उन पर सलाम हो जिस दिन उनका जन्म हुआ, जिस दिन उनकी मृत्यु होगी और जिस दिन वे (जीवित करके) पुनः उठाए जाएंगे।(19:15)

    ईश्वर इन आयतों में हज़रत यहया की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहता है कि वे अपने पालनहार से डरने वाले थे, अपने माता-पिता के साथ बड़ा भला व्यवहार करते थे और लोगों के साथ भी घमंड और कड़ाई से नहीं बल्कि प्रेम व स्नेह का व्यवहार करते थे।

    आगे चलकर आयतों में हर मनुष्य के जीवन के तीन महत्वपूर्ण कालखंडों की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि ईश्वर ने इन तीनों चरणों में उसके लिए सुरक्षा उपलब्ध कराई है। पहला चरण, जन्म या इस संसार में आने के समय का है, दूसरा चरण मृत्यु या इस संसार से वापस जाने का समय है और तीसरा चरण प्रलय के दिन ईश्वर के समक्ष न्यायपूर्ण हिसाब-किताब का समय है। यह ऐसा दिन होगा कि सभी लोग जीवित होंगे और उन्हें वास्तविक जीवन प्रदान किया जाएगा।

    इस प्रकार की आयतों में प्रयोग किए गए सलाम शब्द का तात्पर्य केवल शाब्दिक व ज़बानी सलाम नहीं है बल्कि इसका अर्थ सुरक्षा व शांति है जो इस बात का कारण बनती है कि मनुष्य हर उस बात से दूर रहे जो उसकी प्रवृत्ति से मेल नहीं खाती।

    इन आयतों से हमने सीखा कि माता-पिता के साथ भलाई सभी का दायित्व है और इस मामले में कोई भी अपवाद नहीं है चाहे वह उच्च सामाजिक या ईश्वरीय पद पर ही क्यों न आसीन हो।

    स्वस्थ जीवन व सुरक्षित मृत्यु, पवित्रता, माता-पिता के साथ भलाई और पाप व उद्दंडता से दूरी की छाया में ही प्राप्त होती है और सभी लोग इस प्रकार के कार्य करके लोक-परलोक में अपने जीवन की सुरक्षा को सुनिश्चित बना सकते हैं।

    आइये अब अब सूरए मरयम की आयत नंबर 16 और 17 की तिलावत सुनें।

    وَاذْكُرْ فِي الْكِتَابِ مَرْيَمَ إِذِ انْتَبَذَتْ مِنْ أَهْلِهَا مَكَانًا شَرْقِيًّا (16) فَاتَّخَذَتْ مِنْ دُونِهِمْ حِجَابًا فَأَرْسَلْنَا إِلَيْهَا رُوحَنَا فَتَمَثَّلَ لَهَا بَشَرًا سَوِيًّا (17)

    और (हे पैग़म्बर!) इस किताब में मरयम का भी उल्लेख कीजिए जब वे अपने परिजनों से दूर हो कर (बैतुल मुक़द्दस के) पूर्वी छोर की ओर चली गईं।(19:16) उन्होंने अपने और उनके बीच एक पर्दा डाल दिया तो हमने मरयम की ओर अपना दूत भेजा जो उनके समक्ष एक अच्छे भले मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ।(19:17)

    हज़रत यहया अलैहिस्सलाम की जीवनी के संक्षिप्त वर्णन के पश्चात इन आयतों से हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम की जीवनी आरंभ होती है। हज़रत यहया और हज़रत ईसा में कई समानताएं हैं जिनका उल्लेख अगली आयतों में किया जाएगा।

    इन आयतों में सबसे पहले पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहा गया है कि इस किताब में और इस सूरे में, जिसका नाम सूरए मरयम है, ईसा मसीह की माता हज़रत मरयम अलैहस्सलाम और ईश्वर के दूत की घटना का वर्णन कीजिए कि जो अपने परिजनों से अलग होकर उनके बैतुल मुक़द्दस में उपासना के लिए जाने से आरंभ हुई। हज़रत मरयम ने स्वयं को दूसरों से अलग किया और अपने तथा दूसरों के बीच एक पर्दा डाल दिया ताकि ईश्वर की उपासना के लिए उन्हें एकांत प्राप्त रहे।

    ईश्वर की इच्छा से ईश्वर का एक अत्यंत प्रिय फ़रिश्ता, सुंदर मनुष्य के रूप में उनके समक्ष प्रकट हुआ जिसे देख कर हज़रत मरयम भयभीत व हथप्रभ हो गईं कि किस प्रकार यह व्यक्ति उनके एकांत में आ गया।

    इन आयतों से हमने सीखा कि आध्यात्मिक दर्जों और परिपूर्णता तक पहुंचने में स्त्री व पुरुष के बीच कोई अंतर नहीं है। पैग़म्बरी ऐसा दायित्व है जो ईश्वर ने महिलाओं के कंधों पर नहीं रखा है अन्यथा सभी आध्यात्मिक व भौतिक गुणों की प्राप्ति में स्त्री व पुरुष एकसमान हैं।

    जिब्रईल व अन्य फ़रिश्ते, पैग़म्बरों के अतिरिक्त भी दूसरों के पास जाते हैं तथा उनसे बात करते हैं।

    महिलाएं, आध्यात्मिक गुण व प्रतिष्ठा प्राप्त करके उस स्थान तक पहुंच सकती हैं कि फ़रिश्ते उनके पास आएं और उनसे बात करें।