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    सूरए मरयम, आयतें 18-23, (कार्यक्रम 529)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 18 और 19 की तिलावत सुनें।

    قَالَتْ إِنِّي أَعُوذُ بِالرَّحْمَنِ مِنْكَ إِنْ كُنْتَ تَقِيًّا (18) قَالَ إِنَّمَا أَنَا رَسُولُ رَبِّكِ لِأَهَبَ لَكِ غُلَامًا زَكِيًّا (19)

    मरयम ने (उस फ़रिश्ते से) कहा, मैं तुझ से कृपालु ईश्वर की शरण चाहती हूं, यदि तू ईश्वर से डरने वाला है।(19:18) उसने कहा निश्चित रूप से मैं तुम्हारे पालनहार का दूत हूं ताकि तुम्हें एक पवित्र पुत्र प्रदान करूं।(19:19)

    इससे पहले बताया गया था कि हज़रत मरयम बैतुलमुक़द्दस के एक कोने में ईश्वर की उपासना में लीन थीं कि अचानक ही एक युवा उनके समक्ष प्रकट हुआ। हज़रत मरयम उसे देखते ही हतप्रभ रह गईं और भयभीत हुईं।

    ये आयतें कहती हैं कि उस स्थिति में जब हज़रत मरयम अलैहस्सलाम के पास ईश्वर के अतिरिक्त कोई शरण नहीं थी, उन्होंने उस युवा को संबोधित करते हुए कहा कि मैं तुझसे ईश्वर की शरण चाहती हूं और यदि तू पवित्र व्यक्ति है तो मुझसे दूर हो जा। उस युवा ने हज़रत मरयम को शांत करने के लिए कहा कि मैं मनुष्य नहीं बल्कि फ़रिश्ता हूं और ईश्वर की ओर से मुझे दायित्व दिया गया है कि आपको एक पवित्र व ईश्वर से भय रखने वाला पुत्र प्रदान करूं।

    ये आयतें भली भांति दर्शाती हैं कि पवित्र चरित्र वाली महिलाएं, परपुरुषों के साथ एकांत में नहीं मिलतीं और ऐसे अवसरों पर उपस्थित होने के संबंध में ईश्वर से शरण चाहती हैं। खेद के साथ कहना पड़ता है कि आज के जीवन में लोग इस बात की ओर से निश्चेत हैं और विभिन्न स्थानों पर महिलाओं और परपुरुषों के बीच मेल-जोल एक साधारण सी बात बन चुकी है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि शैतान और शैतानी कर्मों की ओर से ईश्वर की शरण चाहना, क़ुरआने मजीद की सिफ़ारिश और ईश्वर के प्रिय बंदों का चरित्र है।

    फ़रिश्ते धरती पर केवल ईश्वरीय संदेश पहुंचाने के लिए ही नहीं बल्कि ईश्वरीय आदेशों के पालन के लिए भी आते हैं और पैग़म्बरों के अतिरिक्त अन्य लोगों से भी बात करते हैं।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 20 और 21 की तिलावत सुनें।

    قَالَتْ أَنَّى يَكُونُ لِي غُلَامٌ وَلَمْ يَمْسَسْنِي بَشَرٌ وَلَمْ أَكُ بَغِيًّا (20) قَالَ كَذَلِكِ قَالَ رَبُّكِ هُوَ عَلَيَّ هَيِّنٌ وَلِنَجْعَلَهُ آَيَةً لِلنَّاسِ وَرَحْمَةً مِنَّا وَكَانَ أَمْرًا مَقْضِيًّا (21)

    मरयम ने कहा किस प्रकार से मेरे लिए संतान हो सकती है जबकि किसी मनुष्य ने मुझे छुआ तक नहीं है और न ही मैं उद्दंडी हूं? (19:20) (फ़रिश्ते ने) कहा कि बात वही है जो मैंने कही है। तुम्हारे पालनहार ने कहा है कि यह कार्य मेरे लिए बहुत सरल है ताकि हम उसे लोगों के लिए एक निशानी और अपनी ओर से दया बनाएं। और यह कार्य अटल है।(19:21)

    हज़रत मरयम अलैहस्सलाम, जो आरंभ में उस युवा के आने से हतप्रभ और भयभीत हो गई थीं, अब उसकी बातें सुन कर आश्चर्यचकित रह गईं कि किस प्रकार एक कुंवारी लड़की, माता बन सकती है? यह ऐसी स्थिति में था कि जब वे सामान्य जीवन से अलग हो गईं थीं और उन्होंने स्वयं को बैतुलमुक़द्दस में उपासना के लिए विशेष कर दिया था।

    किंतु फ़रिश्ते की बातें एक अटल घटना की ओर संकेत कर रही थीं। ईश्वर का इरादा था कि कुंवारी मरयम माता बनें ताकि हज़रत ईसा मसीह का जन्म ही ईश्वरीय चमत्कार के साथ हो। यद्यपि यह बात सामान्य दृष्टि से और प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार असंभव प्रतीत होती है किंतु ईश्वर के लिए, जो संपूर्ण सृष्टि का रचयिता है, यह बात अत्यंत सरल है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर का इरादा सृष्टि के सभी कारणों और साधनों से इतर है और कोई भी बात उसके व्यवहारिक होने में बाधा नहीं बन सकती।

    पैग़म्बरों का अस्तित्व लोगों के लिए ईश्वरीय दया व कृपा का कारण है। जैसे कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का अस्तित्व, हृदय में ईश्वर पर ईमान को सुदृढ़ बनाता है और लोगों के मार्गदर्शन का कारण बनता है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 22 और 23 की तिलावत सुनें।

    فَحَمَلَتْهُ فَانْتَبَذَتْ بِهِ مَكَانًا قَصِيًّا (22) فَأَجَاءَهَا الْمَخَاضُ إِلَى جِذْعِ النَّخْلَةِ قَالَتْ يَا لَيْتَنِي مِتُّ قَبْلَ هَذَا وَكُنْتُ نَسْيًا مَنْسِيًّا (23)

    तो मरयम गर्भवती हो गईं और लोगों से दूर एक स्थान पर (एकांत में) रहने लगीं।(19:22) तो प्रसव पीड़ा उन्हें खजूर के एक पेड़ की ओर ले गई। मरयम ने (अपने आप से) कहा कि काश मैं इससे पूर्व ही मर गई होती और पूर्ण रूप से भुला दी गई होती।(19:23)

    ईश्वर के इरादे से फ़रिश्ते ने हज़रत मरयम अलैहस्सलाम पर फूंक मारी तो वे गर्भवती हो गईं और उनमें गर्भ के चिन्ह दिखाई देने लगे। जिसके बाद वे विवश हो कर अपने उपासना स्थल से बाहर निकलीं और मरुस्थल की ओर चली गईं ताकि उन्हें लोगों का सामना न करना पड़े।

    कुछ ही समय बाद उन्हें प्रसव पीड़ा होने लगी और नौ महीनों के बजाए अल्पावधि में ही ईश्वर की ओर से प्रसव की परिस्थितियां उत्पन्न हो गईं। हज़रत मरयम अलैहस्सलाम यह सोचने लगीं कि वे लोगों की बातों और उनके लांछनों का किस प्रकार उत्तर देंगी और अपने गर्भवती होने का क्या औचित्य प्रस्तुत करेंगी? इसी दुख और लज्जा के कारण उन्होंने कहा कि काश मैं इस स्थिति से पूर्व ही मर गई होती। यद्यपि मैंने छोटी सी भी ग़लती नहीं की है किंतु संसार का सबसे बड़ा आरोप अर्थात व्यभिचार का लांछन मुझ पर लगने वाला है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि यद्यपि गर्भ और प्रसव महिला के लिए अत्यंत कठिन कार्य है किंतु यह एक ऐसी संतान के जन्म का मार्ग प्रशस्त करता है जो उसके लिए ढेरों भलाइयां और अनुकंपाएं लेकर आती है।

    पवित्र लोगों की दृष्टि में, मृत्यु, बदनामी से उत्तम है। जीवन का मूल्य पवित्रता में ही है।