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    सूरए मरयम, आयतें 24-28, (कार्यक्रम 530)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 24 और 25 की तिलावत सुनें।

    فَنَادَاهَا مِنْ تَحْتِهَا أَلَّا تَحْزَنِي قَدْ جَعَلَ رَبُّكِ تَحْتَكِ سَرِيًّا (24) وَهُزِّي إِلَيْكِ بِجِذْعِ النَّخْلَةِ تُسَاقِطْ عَلَيْكِ رُطَبًا جَنِيًّا (25)

    तो (नवजात शिशु ने) नीचे की ओर से उन्हें पुकारा कि (हे माता!) दुखी न हों कि निसंदेह आपके पालनहार ने आपके (पैरों के) नीचे से सोता जारी कर दिया है(19:24) और इस खजूर के पेड़ के तने को अपनी ओर हिलाइये तो आपके ऊपर ताज़ा खजूरें गिरने लगेंगी।(19:25)

    इससे पहले बताया गया कि ईश्वर की इच्छा से जिब्रईल नामक फ़रिश्ते ने फूंक मारकर हज़रत मरयम अलैहस्सलाम को गर्भवती बना दिया और कुछ ही दिनों में उन्हें प्रसव पीड़ा होने लगी अतः वे विवश होकर बैतुल मुक़द्दस में स्थित अपने उपासना स्थल से बाहर निकल गईं। उन्होंने लोगों के आरोपों से बचने के लिए नगर के बजाए मरुस्थल का रुख़ किया और खजूर के एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गईं।

    ये आयतें कहती हैं कि ईश्वर की इच्छा से नवजात शिशु बोलने लगा ताकि उन्हें शांति प्राप्त हो। हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम ने जन्म से पहले अपनी माता से बात की और उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि आप दुखी न हों, यद्यपि कोई आपकी सहायता के लिए नहीं आया है किंतु ईश्वर ने आपके लिए अपनी अनुकंपाएं जारी कर दी हैं, आपके पैरों के नीचे से पानी का सोता फूट पड़ा है और आपके सिर पर ताज़ा खजूरें मौजूद हैं।

    रोचक बात यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कथनों में वर्णित है कि गर्भवती महिला के लिए सबसे अच्छा आहार ताज़ा खजूर है तथा प्रसव के पश्चात महिलाओं को सबसे पहले खजूर खाने के लिए देनी चाहिए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि गर्भवति महिला को मानसिक शांति की आवश्यकता होती है और उसके परिजनों व निकटवर्ती लोगों को अपनी बातों से सांत्वना देकर उसकी चिंता व बेचैनी को कम करना चाहिए।

    ताज़ा खजूर, ईश्वर के प्रिय बंदों के लिए उसकी विशेष अनुकंपाओं में से एक है और उसके प्रयोग की बहुत अधिक सिफ़ारिश की गई है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 26 की तिलावत सुनें।

    فَكُلِي وَاشْرَبِي وَقَرِّي عَيْنًا فَإِمَّا تَرَيِنَّ مِنَ الْبَشَرِ أَحَدًا فَقُولِي إِنِّي نَذَرْتُ لِلرَّحْمَنِ صَوْمًا فَلَنْ أُكَلِّمَ الْيَوْمَ إِنْسِيًّا (26)

    तो (खजूर) खाइये और (वह शीतल पानी) पीजिए और (ऐसे शिशु के कारण) आपकी आंखें ठंडी हों तो यदि आप किसी मनुष्य को देखें तो उससे कहिए कि मैंने कृपालु ईश्वर के लिए रोज़े की मनौती मानी है और आज मैं किसी भी मनुष्य से बात नहीं करूंगी।(19:26)

    नवजात शिशु की बातों से हज़रत मरयम की चिंता में कुछ कमी आई किंतु वे अब भी लोगों की ओर से लगाए जाने वाले ओरोपों की ओर से चिंतित थीं कि ईश्वर की ओर से उनके लिए संदेश आया कि वे चुप का रोज़ा रखें और किसी से भी बात न करें तथा किसी के भी प्रश्न का उत्तर न दें यहां तक कि ईश्वर उन्हें कोई मार्ग बता कर किसी प्रकार उनकी समस्या का समाधान करे।

    रोचक बात यह है कि यह आयत संतान को माता-पिता की आंखों की ठंडक बताती है और यह बात आज मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध हो चुकी है तथा संतान के जन्म से माता-पिता के जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए मनौती, ऐसा माध्यम है जिसे ईश्वर के प्रिय बंदों ने प्रयोग किया है। अलबत्ता मनौती, ईश्वर के लिए होनी चाहिए चाहे उसका लक्ष्य समस्याओं से मुक्ति प्राप्त करना हो।

    कभी कभी लोगों की बातों और आरोपों के मुक़ाबले में मौन धारण करना चाहिए ताकि वास्तविकता स्वयं ही स्पष्ट हो जाए।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 27 और 28 की तिलावत सुनें।

    فَأَتَتْ بِهِ قَوْمَهَا تَحْمِلُهُ قَالُوا يَا مَرْيَمُ لَقَدْ جِئْتِ شَيْئًا فَرِيًّا (27) يَا أُخْتَ هَارُونَ مَا كَانَ أَبُوكِ امْرَأَ سَوْءٍ وَمَا كَانَتْ أُمُّكِ بَغِيًّا (28)

    तो मरयम अपने नवजात बच्चे को गोद में लिए अपनी जाति के लोगों के पास आईं। उन लोगों ने कहा, हे मरयम! निश्चित रूप से तुमने बहुत ही बुरा कर्म किया है।(19:27) हे हारून की बहन! न तो तुम्हारे पिता बुरे आदमी थे और न ही तुम्हारी माता व्यभिचारी थीं।(19:28)

    प्रसव के बाद हज़रत मरयम अलैहस्सलाम बहुत अधिक समय तक मरुस्थल में नहीं रह सकती थीं और उन्हें अपनी जाति के लोगों के पास लौटना ही था किंतु उन्हें पता था कि लोग उन्हे बुरी दृष्टि से देखेंगे और उन पर व्यभिचार का आरोप लगाएंगे। अपने समय की सबसे पवित्र महिला पर व्यभिचार का आरोप, जिस प्रकार से ज़ुलैख़ा ने अपने समय के सबसे पवित्र पुरुष हज़रत यूसुफ़ पर व्यभिचार का आरोप लगाया था।

    यह एक बहुत बड़ा पाठ है कि हमें लोगों की बुरी दृष्टि या ग़लत विचारों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। संभव है कि लोग अज्ञानता, ईर्ष्या या द्वेष के चलते किसी पर कोई आरोप लगाएं जो पूर्ण रूप से निराधार हो बल्कि वास्तविकता उसके बिल्कुल विपरीत हो।

    इन आयतों से हमने सीखा कि कभी कभी लोगों के फ़ैसले, ठोस बातों और वास्तविकता को समझने के लिए नहीं बल्कि जल्दबाज़ी और विदित लक्षणों पर आधारित होते हैं अतः हमें उनसे प्रभावित नहीं होना चाहिए।

    माता-पिता चाहें या न चाहें, वे अपने बच्चों के व्यवहार के लिए उत्तरदायी होते हैं अतः उन्हें अपने बच्चों के प्रशिक्षण का हर संभव प्रयास करना चाहिए ताकि वे उनका नाम ऊंचा करें।

    बुरा काम जो भी करे बुरा ही होता है किंतु यदि अच्छे व पवित्र परिवार के लोग ऐसा कर्म करें तो वह अधिक बुरा समझा जाता है।