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    सूरए मरयम, आयतें 35-40, (कार्यक्रम 532)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 35 की तिलावत सुनें।

    مَا كَانَ لِلَّهِ أَنْ يَتَّخِذَ مِنْ وَلَدٍ سُبْحَانَهُ إِذَا قَضَى أَمْرًا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ (35)

    ईश्वर के लिए उचित नहीं है कि वह किसी को अपनी संतान बनाए कि वह पवित्र व आवश्यकतामुक्त है। जब वह किसी बात का निर्णय करता है तो जैसे ही वह उससे कहता है कि हो जाओ तो वह हो जाती है।(19:35)

    पिछली आयतों में कहा गया गया कि हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम ने झूले में ही अपनी माता की पवित्रता की गवाही दी और स्वयं को ईश्वर का एक दास बताया जो एक दिन संसार में आया है और एक दिन इस संसार से चला जाएगा।

    यह आयत कहती है कि जिन लोगों ने हज़रत ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र समझा और उन्हें मनुष्य के स्तर से ऊपर उठा दिया उन्होंने अनुचित बात कही है क्योंकि ईश्वर इस बात से कहीं पवित्र है कि उसकी कोई संतान हो। यह विषय कि हज़रत ईसा मसीह का जन्म बिना पिता के हुआ है, इस अर्थ में नहीं है कि वे ईश्वर के पुत्र हैं क्योंकि यदि ईश्वर चाहे तो वह बिना माता-पिता के भी मनुष्य को पैदा कर सकता है जैसा कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का जन्म इसी प्रकार हुआ था। तो क्या यह कहा जा सकता है कि हज़रत आदम ईश्वर के पुत्र हैं? जबकि सभी जानते हैं कि वे भी ईश्वर के बंदों में से एक हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर सर्वसक्षम है और सृष्टि के लिए उसे प्राकृतिक कारकों की आवश्यकता नहीं होती।

    आसमानी किताब वालों को उनकी भ्रष्ट आस्थाओं के संबंध में सही मार्ग दिखाने का प्रयास करना चाहिए। इस संबंध में तटस्थ रहना उचित नहीं है।

    सृष्टि की सभी वस्तुओं के साथ ईश्वर का संबंध, पिता व संतान का नहीं बल्कि रचयिता व रचना का संबंध है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 36 की तिलावत सुनें।

    وَإِنَّ اللَّهَ رَبِّي وَرَبُّكُمْ فَاعْبُدُوهُ هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ (36)

    और निश्चित रूप से ईश्वर मेरा और तुम्हारा पालनहार है तो उसी की उपासना करो कि यही सीधा मार्ग है।(19:36)

    यह आयत हज़रत ईसा मसीह की ज़बान से है जो अपना परिचय इस प्रकार कराते हैं कि मैं ईश्वर का दास हूं और मेरा तथा तुम्हारा पालनहार एक ही है कि जो अल्लाह है। अतः तुम लोग भी मेरी ही भांति केवल उसी की उपासना करो और किसी को उसका समकक्ष न ठहराओ। यदि तुम ऐसा करोगे तो सीधे मार्ग पर रहोगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि तीन ईश्वरों के संबंध में ईसाइयों की आस्था, ईश्वर की उपासना के सीधे मार्ग से पथभ्रष्टता है।

    उपासना केवल ईश्वर की होनी चाहिए जो सृष्टि का रचयिता व पालनहार है और दूसरों की उपासना नहीं की जा सकती चाहे वे ईश्वर के पैग़म्बर ही क्यों न हों।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 37 और 38 की तिलावत सुनें।

    فَاخْتَلَفَ الْأَحْزَابُ مِنْ بَيْنِهِمِْ فَوَيْلٌ لِلَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ مَشْهَدِ يَوْمٍ عَظِيمٍ (37) أَسْمِعْ بِهِمْ وَأَبْصِرْ يَوْمَ يَأْتُونَنَا لَكِنِ الظَّالِمُونَ الْيَوْمَ فِي ضَلَالٍ مُبِينٍ (38)

    तो उनके कुछ गुटों ने आपस में मतभेद किया तो एक बड़े दिन जब उन्हें उपस्थित होना होगा, बड़ा बुरा अंत होगा उन लोगों का जिन्होंने ईश्वर का इन्कार किया।(19:37) कितने बड़े सुनने वाले और कितने बड़े देखने वाले होंगे जिस दिन वे हमारे सामने आएंगे किंतु आज के दिन अत्याचारी खुली हुई पथभ्रष्टता में हैं।(19:38)

    ये आयतें हज़रत ईसा मसीह के बारे में ईसाइयों के विभिन्न गुटों व समुदायों के बीच मतभेद का वर्णन करते हुए कहती हैं कि इन लोगों के बीच गहरा मतभेद उत्पन्न हो गया और इनमें से प्रत्येक ने उनके बारे में एक अलग बात कही किंतु प्रलय में, जब हठधर्म के पर्दे हट जाएंगे तो उनकी आंखें और कान सत्य को देखें और सुनेंगे और फिर वे सत्य को स्वीकार कर लेंगे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्मों की एक बड़ी मुसीबत, धार्मिक मतभेद हैं जो पैग़म्बरों की शिक्षाओं पर बहुत बड़ा अत्याचार है।

    हमें प्रयास करना चाहिए कि प्रलय के न्यायालय में उपस्थित होने से पूर्व इसी संसार में खुली आंखों व कानों से सत्य के मार्ग का चयन करें और उस मार्ग पर अडिग रहें।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 39 और 40 की तिलावत सुनें।

    وَأَنْذِرْهُمْ يَوْمَ الْحَسْرَةِ إِذْ قُضِيَ الْأَمْرُ وَهُمْ فِي غَفْلَةٍ وَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ (39) إِنَّا نَحْنُ نَرِثُ الْأَرْضَ وَمَنْ عَلَيْهَا وَإِلَيْنَا يُرْجَعُونَ (40)

    और (हे पैग़म्बर) उन्हें पछतावे के दिन से डराइये कि जिस दिन सभी वस्तुएं समाप्त हो जाएंगी जबकि वे निश्चेतना में होंगे और ईमान नहीं लाएंगे।(19:39) धरती और जो कुछ उसमें है उसके केवल हम ही उत्तराधिकारी होंगे और वे हमारी ही ओर लौटाए जाएंगे।(19:40)

    सूरए मरयम के इस भाग के अंत में कि जो हज़रत ईसा मसीह तथा उनके बारे में पाए जाने वाली ग़लत आस्थाओं के बारे में था, ये आयतें पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती हैं कि वे आसमानी धर्म के अनुयाइयों को सचेत कर दें कि प्रलय का दिन पछतावे का दिन होगा क्योंकि उस दिन वापसी का कोई मार्ग नहीं है और उस दिन ईश्वर का फ़ैसला भी आ चुका होगा अतः उचित है कि आज ही निश्चेतना से निकल आएं और ईश्वर पर ईमान ले आएं तथा यह जान लें कि वे इस संसार से जाने वाले हैं, केवल ईश्वर का अस्तित्व बाक़ी रहने वाला है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि इस संसार में हमारी निश्चेतना, प्रलय में हमारे पछतावे का कारण बनेगी।

    इस संसार का धन-दौलत, संपत्ति और सत्ता नश्वर है अतः इन वस्तुओं को हमारी निश्चेतना का कारण नहीं बनना चाहिए।