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    सूरए मरयम, आयतें 41-45, (कार्यक्रम 533)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 41 और 42 की तिलावत सुनें।

    وَاذْكُرْ فِي الْكِتَابِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّهُ كَانَ صِدِّيقًا نَبِيًّا (41) إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ يَا أَبَتِ لِمَ تَعْبُدُ مَا لَا يَسْمَعُ وَلَا يُبْصِرُ وَلَا يُغْنِي عَنْكَ شَيْئًا (42)

    और (हे पैग़म्बर!) इस किताब में इब्राहीम का भी उल्लेख कीजिए कि निश्चित रूप से वे अत्यंत सच्चे पैग़म्बर थे।(19:41) जब उन्होंने अपने (मुंह बोले) पिता से कहा कि हे पिता! आप क्यों ऐसे की उपासना करते हैं जो न तो सुन सकता है और न ही देख सकता है और न ही आपको किसी वस्तु से आवश्यकतामुक्त कर सकता है? (19:42)

    पिछली आयतों में हज़रत ज़करिया, हज़रत मरयम तथा हज़रत ईसा अलैहिमुस्सलाम के जीवन की कुछ घटनाओं के वर्णन के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके मुंह बोले पिता या चाचा के बीच होने वाली वार्ता का वर्णन करता है और आरंभ में हज़रत इब्राहीम की विशेताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें सिद्दीक़ बताता है। सिद्दीक़ उस व्यक्ति को कहा जाता है जिसका मन, ज़बान और कर्म एक होता है तथा उसकी कथनी व करनी सच्चाई पर आधारित होती है।

    चूंकि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पिता का निधन उनके बचपन में ही हो गया था और उनकी अभिभावकता का दायित्व उनके चाचा आज़र के कांधों पर था, इसी लिए क़ुरआने मजीद ने आज़र को उनके पिता के रूप में वर्णित किया है। हज़रत इब्राहीम के वास्तविक पिता ईश्वर पर ईमान रखने वाले व्यक्ति थे जबकि आज़र मूर्तिपूजा और अनेकेश्वरवाद में ग्रस्त था। यही कारण है कि हज़रत इब्राहीम ने बड़े कोमल शब्दों में और प्रश्नात्मक शैली में परोक्ष रूप से उन्हें समझाया कि मूर्तिपूजा का कोई लाभ नहीं है क्योंकि मूर्तियां तो मनुष्य के स्तर तक भी नहीं पहुंचतीं और उनमें देखने व सुनने तक की क्षमता नहीं होती, मानव जाति के मामलों के संचालन की शक्ति की तो बात ही अलग है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सुधार और उपदेश का काम समाज के लोगों से पहले अपने निकटवर्ती लोगों से आरंभ करना चाहिए।

    बुराइयों से रोकने में आयु की कोई सीमा नहीं है, परिवार का बच्चा भी अपने बड़ों को बुरे कर्मों से रोक सकता है।

    सामाजिक व शिष्टाचारिक बुराइयों से रोकने से पूर्व आस्था संबंधी बुराइयों से रोकना चाहिए।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 43 की तिलावत सुनें।

    يَا أَبَتِ إِنِّي قَدْ جَاءَنِي مِنَ الْعِلْمِ مَا لَمْ يَأْتِكَ فَاتَّبِعْنِي أَهْدِكَ صِرَاطًا سَوِيًّا (43)

    हे पिता! निश्चित रूप से मेरे पास ऐसा ज्ञान आया है जो आपके पास नहीं आया है तो मेरा अनुसरण कीजिए कि मैं सीधे रास्ते की ओर आपका मार्गदर्शन करूंगा।(19:43)

    मूर्ति पूजा को लाभहीन बताने के पश्चात हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ईश्वरीय पैग़म्बर के रूप में अपना परिचय कराते हैं और अपने चाचा से कहते हैं कि मेरे पास ईश्वर का विशेष संदेश वहि आता है अतः मैं ऐसी बातें जानता हूं जो आप नहीं जानते। मुझे ज्ञात है कि मृत्यु के पश्चात, मनुष्य को क़ब्र में पुनः जीवित किया जाएगा और मृत्यु से लेकर प्रलय तक का समय उसे वहीं बिताना होगा। इसके बाद वह प्रलय में लाया जाएगा जहां उसे ईश्वरीय न्यायालय में अपने कर्मों का हिसाब किताब देना होगा। मैं यह भी जानता हूं कि ईश्वर किन कामों को पसंद करता है और किन कर्मों से अप्रसन्न होता है, अतः आप मेरी बात सुनिए और उसे स्वीकार कीजिए जिससे आप सीधे मार्ग पर आ जाएंगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि अनेकेश्वरवाद का मूल कारण वास्तविकता से अनभिज्ञता है, यही कारण है कि ईश्वरीय पैग़म्बर लोगों को इस बात से अवगत कराने का प्रयास करते थे कि अनेकेश्वरवाद का कोई लाभ नहीं है।

    मनुष्य को ज्ञानी का आज्ञापालन करना चाहिए, चाहे वह आयु में छोटा हो या बड़ा, वास्तविक मानदंड आयु नहीं ज्ञान है।

    ईश्वरीय पैग़म्बर जिस मार्ग पर चलने का लोगों को निमंत्रण देते थे वह हर प्रकार की अतिश्योक्ति और कमी से दूर संतुलन का मार्ग है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 44 और 45 की तिलावत सुनें।

    يَا أَبَتِ لَا تَعْبُدِ الشَّيْطَانَ إِنَّ الشَّيْطَانَ كَانَ لِلرَّحْمَنِ عَصِيًّا (44) يَا أَبَتِ إِنِّي أَخَافُ أَنْ يَمَسَّكَ عَذَابٌ مِنَ الرَّحْمَنِ فَتَكُونَ لِلشَّيْطَانِ وَلِيًّا (45)

    हे पिता! शैतान की उपासना न कीजिए कि निःसंदेह शैतान दयावान ईश्वर के प्रति उद्दंडी है।(19:44) हे पिताः मुझे भय है कि दयावान ईश्वर की ओर से आपको कोई दंड अपनी लपेट में ले ले और आप शैतान के मित्र व सहायक हो जाएं।(19:45)

    मूर्तियों का इन्कार करने के बाद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम, शैतान के ख़तरे की ओर संकेत करते हैं जिसने आरंभ में ही हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के समक्ष नतमस्तक न हो कर ईश्वर के आदेश की अवहेलना की थी और उसके दरबार से निकाला गया था। कितनी बुरी बात है कि मनुष्य ऐसे का दास बने जो एक क्षण के लिए भी उसके समक्ष नतमस्तक होने को तैयार नहीं हुआ था क्योंकि वह स्वयं को मनुष्य से श्रेष्ठ समझता था और उसने घमंड के कारण ईश्वर के आदेश की अवहेलना की थी।

    हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम, मूर्तिपूजा को एक प्रकार से शैतान की उपासना बताते हैं और अपने अभिभावक को इस काम से रोकते हैं क्योंकि ऐसे किसी भी अस्तित्व का आज्ञापालन जो मनुष्य को अपना दास बना ले, उसकी उपासना के समान है और जिन लोगों ने अपनी बुद्धि और विचारों को अलग रख दिया है और बिना किसी तर्क के शैतानी उकसावों में मूर्तियों की पूजा करते हैं, वे वस्तुतः शैतान की उपासना करते हैं।

    ईश्वर अत्यंत कृपाशील और दयावान है किंतु मनुष्य शैतान की परिधि में आकर ईश्वर की दया व कृपा के दायरे से बाहर निकल जाता है और फिर उसकी दया का पात्र नहीं बनता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि बुराइयों से रोकते समय, जो स्वाभाविक रूप से दूसरे पक्ष के लिए सुखद नहीं है, प्रेम व स्नेह की भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिससे वह, हमारी बात स्वीकार करने के लिए तैयार हो सके। इन आयतों में हज़रत इब्राहीम ने चार बार अपने चाचा को पिता कह कर संबोधित किया है।

    कभी मनुष्य ऐसा कार्य करता है जिससे वह दया व कृपा के स्रोत अर्थात ईश्वर को स्वयं से क्रोधित कर लेता है और दंड में ग्रस्त हो जाता है, जबकि ईश्वर की एक विशेषता यह है कि उसकी दया उसके क्रोध के मुक़ाबले में तेज़ी से बढ़ती है।