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    सूरए मरयम, आयतें 46-50, (कार्यक्रम 534)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 46 और 47 की तिलावत सुनें।

    قَالَ أَرَاغِبٌ أَنْتَ عَنْ آَلِهَتِي يَا إِبْرَاهِيمُ لَئِنْ لَمْ تَنْتَهِ لَأَرْجُمَنَّكَ وَاهْجُرْنِي مَلِيًّا (46) قَالَ سَلَامٌ عَلَيْكَ سَأَسْتَغْفِرُ لَكَ رَبِّي إِنَّهُ كَانَ بِي حَفِيًّا (47)

    उसने कहा, हे इब्राहीम! क्या तुम मेरे देवताओं से विरक्त हो? यदि तुमने इस (पद्धति) को न छोड़ा तो मैं तुम पर पत्थरों की वर्षा कर दूंगा और तुम लम्बे समय के लिए मुझ से दूर हो जाओ।(19:46) इब्राहीम ने कहा सलाम हो तुम पर, मैं शीघ्र ही अपने पालनहार से तुम्हारे लिए क्षमा चाहूंगा कि निश्चित रूप से वह सदैव मेरे प्रति दयावान रहा है।(19:47)

    पिछली आयतों में बताया गया था कि कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का अभिभावक अनेकेश्वरवादी था। उन्होंने उसका मार्गदर्शन करना चाहा और उसे मूर्तिपूजा व अनेकेश्वरवाद के परिणाम की ओर से सचेत किया। ये आयतें कहती हैं कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के अभिभावक ने उनकी बातों और तर्कों पर ध्यान देने के स्थान पर उनके साथ अधिक कड़ा व्यवहार करने का निर्णय किया और कहा कि न केवल यह कि मैं तुम्हारे धर्म को स्वीकार नहीं करूंगा बल्कि या तो तुम मुझ से दूर हो जाओ अन्यथा मैं स्वयं तुम्हें पत्थर मार मार कर अपने मार्ग से हटा दूंगा।

    किंतु हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उसकी तर्कहीन शैली का उत्तर देने के स्थान पर प्रेम और स्नेह का व्यवहार जारी रखा और कहा कि मैं तुमसे विवाद और झड़प नहीं चाहता बल्कि मैंने शांति और स्नेह के साथ तुम्हें ईश्वर की उपासन का निमंत्रण दिया है, अब यदि तुम मेरी बात स्वीकार नहीं करते हो तो न केवल यह कि मैं तुम्हारे विरुद्ध कुछ नहीं करूंगा बल्कि ईश्वर से भी प्रार्थना करूंगा वह तुम्हें क्षमा कर दे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि जिसके पास तर्कसंगत बात नहीं होती वह हिंसा का मार्ग अपनाता है। पैग़म्बरों की बातें तर्क पर आधारित होती हैं और वे किसी को भी ईश्वरीय धर्म को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं करते। वे केवल लोगों की भलाई के लिए ही उन्हें सत्य को स्वीकार करने का निमंत्रण देते हैं।

    ईश्वर के प्रिय बंदे शत्रु की धमकियों के मुक़ाबले में संयम से काम लेते हैं और ईश्वर की कृपा के प्रति आशावान रहते हैं।

    हमें प्रयास करना चाहिए कि दूसरों के क्रोध की आग को भड़काएं नहीं बल्कि अपनी कोमल व स्नहेपूर्ण बातों से उसे ठंडा करें।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 48 की तिलावत सुनें।

    وَأَعْتَزِلُكُمْ وَمَا تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَأَدْعُو رَبِّي عَسَى أَلَّا أَكُونَ بِدُعَاءِ رَبِّي شَقِيًّا (48)

    मैं तुमसे व जिन्हें तुम ईश्वर के अतिरिक्त पुकारते हो, दूर हूं और केवल अपने पालनहार को पुकारता हूं। मुझे आशा है कि अपने पालनहार को पुकारने में मैं निरुत्तर नहीं रहूंगा।(19:48)

    हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के अभिभावक ने उनके सामने दो मार्ग रखे थे, एक यह कि वे उसे छोड़ कर चले जाएं, दूसरा यह कि मरने के लिए तैयार हो जाएं। यह आयत कहती है कि हज़रत इब्राहीम ने कहा कि यदि तुम यही चाहते हो तो मैं तुम्हारे पास से चला जाता हूं। मुझे अपने पालनहार पर पूरा विश्वास है कि वह मुझे अपनी दया व कृपा से वंचित नहीं रखेगा।

    यह आयत उन युवाओं के लिए मार्गदर्शन है जो पथभ्रष्ट परिवारों में जीवन बिताते हैं और अपने धर्म की रक्षा नहीं कर सकते। उन्हें हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के मार्ग पर चलना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो परिवार से अलग भी हो जाना चाहिए।

    इस आयत से हमने सीखा कि संबंध विच्छेद, बुराइयों से रोकने का पहला नहीं बल्कि अंतिम चरण है। ऐसी स्थिति में जब हम बुरे वातावरण को बदल नहीं सकते, कम से कम हमें उस स्थान को छोड़ देना चाहिए।

    पैग़म्बर तक अपने भविष्य के बारें में ईश्वर की कृपा की ओर से आशावान रहते थे और सदैव ही भय व आशा के बीच जीवन बिताते थे। उन्हें ईश्वर का भय भी रहता था और उसकी दया की आशा भी।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 49 और 50 की तिलावत सुनें।

    فَلَمَّا اعْتَزَلَهُمْ وَمَا يَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَكُلًّا جَعَلْنَا نَبِيًّا (49) وَوَهَبْنَا لَهُمْ مِنْ رَحْمَتِنَا وَجَعَلْنَا لَهُمْ لِسَانَ صِدْقٍ عَلِيًّا (50)

    तो जब इब्राहीम अनेकेश्वरवादियों और जो कुछ वे पूजते थे उनसे अलग हो गए तो हमने उन्हें इस्हाक़ व याक़ूब प्रदान किए और उन सभी को पैग़म्बर बनाया।(19:49) और हमने उन्हें अपनी दया में से प्रदान किया तथा उन्हें भला व ऊंचा नाम प्रदान किया।(19:50)

    अनेकेश्वरवाद एवं मूर्तिपूजा के वातावरण से हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के अलग हो जाने के बाद ईश्वर ने भी उन्हें अपनी विशेष दया का पात्र बनाया और उन्हें हज़रत इस्हाक़ और उनके पुत्र याक़ूब जैसे पुत्र प्रदान किए जिन्होंने उन्हीं की भांति, ईश्वर की ओर लोगों का मार्गदर्शन किया और पैग़म्बरी का पद प्राप्त किया।

    यद्यपि हज़रत इब्राहीम अपने काल में बिल्कुल अकेले थे किंतु वे भयभीत नहीं हुए और कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद की पूरी शक्ति के समक्ष निर्भीकता से डटे रहे। यह ईश्वरीय धर्म के सभी अनुयाइयों के लिए एक बड़ा पाठ है कि उन्हें किसी भी स्थिति में अपने धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पिता और पूर्वजों के भले कर्मों के सद्परिणाम उनके वंश में सामने आते हैं और भली संतान, अच्छे कर्म करने वालों पर ईश्वर की कृपाओं में से एक है।

    यदि हम ईश्वर के अतिरिक्त अन्य लोगों और वस्तुओं पर भरोसा न करें तो ईश्वरीय कृपाओं व अनुकंपाओं की वर्षा होने लगती है और उनकी संतानें भी इसका पात्र बनती हैं।

    लोगों के बीच अच्छा नाम, ईश्वर की एक कृपा है जिसे ईश्वर पवित्र लोगों और भले कर्म करने वालों को प्रदान करता है।