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    सूरए मरयम, आयतें 51-55, (कार्यक्रम 535)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 51 की तिलावत सुनें।

    وَاذْكُرْ فِي الْكِتَابِ مُوسَى إِنَّهُ كَانَ مُخْلَصًا وَكَانَ رَسُولًا نَبِيًّا (51)

    और (हे पैग़म्बर!) इस किताब में मूसा का भी उल्लेख कीजिए कि निश्चित रूप से वे चुने हुए (बंदे) और ईश्वर के रसूल व नबी थे।(19:51)

    पिछली आयतों में कुछ पैग़म्बरों के जीवन की घटनाओं की ओर संकेत किया गया, ये आयतें हज़रत मूसा के जीवन के बारे में हैं जो ईश्वर के महान पैग़म्बरों में से एक थे। इस आयत में उनके लिए दो शब्दों का प्रयोग किया गया है, रसूल और नबी। उन्हें रसूल या पैग़म्बर का पद भी प्राप्त था और नबी का पद भी। निश्चित रूप से रसूल का पद नबी के पद से ऊंचा होता है कि जो ईश्वरीय संदेश वहि लाने वाले फ़रिश्ते से सीधे संपर्क में होता है। रसूल पर वहि आने के अतिरिक्त वह समाज तक वहि में वर्णित बातों को पहुंचाने और उन्हें लागू करने का भी उत्तरदायी होता है।

    इसी प्रकार इस आयत में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को मुख़लस अर्थात चुना हुआ बंदा भी कहा गया है। यह शब्द इख़लास से निकला है जिसका अर्थ होता है निष्ठा। निष्ठा के संबंध में लोग दो प्रकार के होते हैं। साधारणतः लोग निष्ठावान हो सकते हैं किंतु उन्हें सदैव शैतान के हथकंडों का शिकार बनने का ख़तरा रहता है। दूसरे प्रकार के लोग, जो जनता के मार्गदर्शन के लिए ईश्वर के चुने हुए बंदे होते हैं, ईश्वर उन्हें शुद्ध व निष्ठावान बना देता है अतः शैतान उनमें घुसपैठ नहीं कर सकता।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने ईमान वालों से सिफ़ारिश की है कि वे वरिष्ठ धार्मिक नेताओं की याद को बाक़ी रखें और उनका सम्मान करें।

    निष्ठा, आध्यात्मिक दर्जों और ईश्वरीय पदों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 52 की तिलावत सुनें।

    وَنَادَيْنَاهُ مِنْ جَانِبِ الطُّورِ الْأَيْمَنِ وَقَرَّبْنَاهُ نَجِيًّا (52)

    और हमने तूर पर्वत के दाहिनी ओर से मूसा को पुकारा और उन्हें वार्ता के लिए अपने से अत्यंत समीप कर लिया।(19:52)

    यह आयत अत्यंत संक्षिप्त शब्दों में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पैग़म्बर बनने के चरणों का उल्लेख करते हुए कहती है कि तूर पर्वत के आंचल में उन्होंने आसमानी आवाज़ सुनी और ईश्वर से वार्ता व प्रार्थना के लिए वे ईश्वरीय सामिप्य के स्थान तक पहुंचे।

    क़ुरआने मजीद की दूसरी आयतों में ईश्वर से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम द्वारा सीधी बात करने की ओर संकेत है जिससे पता चलता है कि ईश्वर के निकट उनका स्थान कितना उच्च है जिसे इस आयत में ईश्वर से सामिप्य कहा गया है।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर से प्रार्थना, उससे मनुष्य के सामिप्य का कारण बनती है। पैग़म्बर भी इसी मार्ग पर चले हैं।

    कुछ स्थान पवित्र होते हैं और उनकी पवित्रता की रक्षा की जानी चाहिए, जैसे कि तूर पर्वत।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 53 की तिलावत सुनें।

    وَوَهَبْنَا لَهُ مِنْ رَحْمَتِنَا أَخَاهُ هَارُونَ نَبِيًّا (53)

    और हमने अपनी दया से मूसा को उनका भाई हारून पैग़म्बर प्रदान किया।(19:53)

    जैसा कि क़ुरआने मजीद की कुछ अन्य आयतों में भी कहा गया है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से प्रार्थना की थी कि वह उनके भाई हारून को उनका मंत्री बना दे ताकि वे ईश्वरीय दायित्वों के निर्वाह में उनकी सहायता करें। ईश्वर ने उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और हज़रत हारून को जो कि स्वयं भी पैग़म्बर थे, हज़रत मूसा का साथी और सहायक बना दिया।

    इससे पता चलता है कि पैग़म्बर, ईश्वरीय दायित्वों के निर्वाह के लिए अपना नाम सामने लाए बिना हर प्रकार के सहयोग हेतु तैयार रहते थे।

    इस आयत से हमने सीखा कि दो भाइयों का एक दूसरे का सहयोगी होना एक अनुकंपा है, शर्त यह है कि उन दोनों की आस्था एक ही हो।

    कभी आवश्यक होता है कि एक ही पद और पदवी वाले दो व्यक्तियों में से एक, दूसरे का अनुसरण करे क्योंकि समाज को एक शासक और अधिकारी की आवश्यकता होती है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 54 और 55 की तिलावत सुनें।

    وَاذْكُرْ فِي الْكِتَابِ إِسْمَاعِيلَ إِنَّهُ كَانَ صَادِقَ الْوَعْدِ وَكَانَ رَسُولًا نَبِيًّا (54) وَكَانَ يَأْمُرُ أَهْلَهُ بِالصَّلَاةِ وَالزَّكَاةِ وَكَانَ عِنْدَ رَبِّهِ مَرْضِيًّا (55)

    और (हे पैग़म्बर!) इस किताब में इस्माईल का भी उल्लेख कीजिए कि निश्चित रूप से वे वचन के पक्के और रसूल व नबी थे।(19:54) और वे सदैव अपने परिजनों को नमाज़ और ज़कात का आदेशे देते थे और अपने पालनहार की दृष्टि में प्रिय व्यक्ति थे।(19:55)

    पिछली आयतों में हज़रत इब्राहीम व हज़रत मूसा अलैहिमस्सलाम की कुछ विशेषताओं का उल्लेख करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों में हज़रत इस्माईल की कुछ विशेषताओं की ओर संकेत करता है। यद्यपि सभी पैग़म्बर अपने वचनों पर कटिबद्ध रहते थे किंतु यह विशेषता हज़रत इस्माईल में कुछ अधिक उभर कर सामने आई थी। मूल रूप से वचन पर कटिबद्ध रहना एक ईश्वरीय गुण है और वचन तोड़ना, मिथ्याचारी लोगों का चिन्ह है।

    पैग़म्बरों का कथन और व्यवहार में सच्चा होना और प्रतिज्ञा का पालन करना उन विशेषताओं में से है जिनका इन्कार उनके विरोधी और काफ़िर तक नहीं करते थे। परिवार पर ध्यान और पारिवारिक प्रशिक्षण, समाज सुधार पर प्राथमिकता रखता है अतः पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से भी कहा गया कि वे आम लोगों को ईश्वरीय धर्म का निमंत्रण देने से पूर्व अपने परिजनों और नातेदारों के बीच धर्म का प्रचार करें।

    स्वाभाविक है कि पैग़म्बरों के सभी कार्यों का मानदंड, लोगों की नहीं बल्कि ईश्वर की प्रसन्नता था और इसी कारण उन्होंने कभी भी अधिक अनुयाई प्राप्त करने के लिए ईश्वर के आदेशों का पालन नहीं छोड़ा बल्कि उन आदेशों पर पूर्ण रूप से डटे रहे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि दूसरों की प्रशंसा का मानदंड, उनकी आध्यात्मिक व आत्मिक परिपूर्णताएं होनी चाहिए न कि साधारण और नश्वर बातें।

    पैग़म्बर, सामाजिक मामलों के साथ ही पारिवारिक मामलों के भी उत्तरदायी होते हैं और नमाज़ व ज़कात पर ध्यान उनकी शिक्षाओं में सर्वोपरि है।