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    सूरए मरयम, आयतें 56-60, (कार्यक्रम 536)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 56 और 57 की तिलावत सुनें।

    وَاذْكُرْ فِي الْكِتَابِ إِدْرِيسَ إِنَّهُ كَانَ صِدِّيقًا نَبِيًّا (56) وَرَفَعْنَاهُ مَكَانًا عَلِيًّا (57)

    और (हे पैग़म्बर!) इस किताब में इदरीस का भी उल्लेख कीजिए कि निश्चित रूप से वे अत्यधिक सच्चे और पैग़म्बर थे।(19:56) और हमने उन्हें एक उच्च स्थान तक पहुंचा दिया।(19:57)

    आपको अवश्य याद होगा कि पिछली आयतों में हज़रत इब्राहीम, मूसा व इस्माईल अलैहिमुस्सलाम जैसे पैग़म्बरों का नाम ईश्वर द्वारा उनकी प्रशंसा के साथ वर्णित हुआ था। ये आयतें हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम का उल्लेख करती हैं जो हज़रत नूह से पूर्व महान ईश्वरीय पैग़म्बरों में से एक थे। तौरैत में उनका नाम अख़नूख़ के रूप में वर्णित है।

    इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने लोगों को कपड़े सीना सिखाया। इसी प्रकार वे खगोलशास्त्र, ज्योतिष विज्ञान एवं गणित में भी दक्ष थे तथा क़लम से लिखा करते थे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सच्चाई व सदकर्म, ईश्वरीय पैग़म्बरों की प्रमुख विशेषताओं में से है जिन्हें उनके अनुयाईयों को अपना आदर्श बनाना चाहिए।

    सच्चाई और सदकर्म, लोगों तथा ईश्वर की दृष्टि में मनुष्य के प्रिय होने का कारण बनता है और इन गुणों के कारण मनुष्य अधिक उच्च स्थान प्राप्त करता है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 58 की तिलावत सुनें।

    أُولَئِكَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ مِنَ النَّبِيِّينَ مِنْ ذُرِّيَّةِ آَدَمَ وَمِمَّنْ حَمَلْنَا مَعَ نُوحٍ وَمِنْ ذُرِّيَّةِ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْرَائِيلَ وَمِمَّنْ هَدَيْنَا وَاجْتَبَيْنَا إِذَا تُتْلَى عَلَيْهِمْ آَيَاتُ الرَّحْمَنِ خَرُّوا سُجَّدًا وَبُكِيًّا (58)

    ये सब वे पैग़म्बर हैं जिन पर ईश्वर ने कृपा की, आदम की संतान में से और उनकी संतान में से जिन्हें हमने नूह के साथ (नौका में) सवार किया और इब्राहीम व इस्राईल के वंश में से और उनमें से जिनका हमने मार्गदर्शन किया तथा चुन लिया। जब इनके सामने कृपाशील (ईश्वर) की आयतों की तिलावत की जाती है तो ये सजदा करते हुए और रोते हुए (ईश्वर के समक्ष) नतमस्तक हो जाते हैं।(19:58)

    सभी मुसलमान प्रति दिन अनिवार्य नमाज़ों में कम से कम दस बार ईश्वर से कहते हैं कि प्रभुवर! सीधे मार्ग की ओर हमारा मार्गदर्शन कर और उस पर हमें बाक़ी रख, उन लोगों के मार्ग पर जिन पर तूने कृपा की है। यह आयत हमसे कहती है कि जिन लोगों को ईश्वर ने अपनी विशेष कृपा प्रदान की है कि वे पैग़म्बर हैं और उन्हीं का मार्ग, सीधा मार्ग है।

    पिछली आयतों में ईश्वर के पहले पैग़म्बर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के काल से लेकर अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तक के दस पैग़म्बरों के नामों का वर्णन किया गया है। हज़रत इदरीस, हज़रत आदम की संतान में से थे, हज़रत इब्राहीम हज़रत नूह के पोते थे, हज़रत इस्हाक़, इस्माईल व याक़ूब, हज़रत इब्राहीम के वंश से थे तथा हज़रत मूसा, हारून, ज़करिया, यहया व ईसा, हज़रत इस्राईल अर्थात हज़रत याक़ूब के वंश से थे।

    इन सबकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनके द्वारा अनन्य ईश्वर की उपासना तथा स्वयं को उसका दास समझना था। ये सब अनन्य ईश्वर की महानता के समक्ष रोते हुए धरती पर नतमस्तक हो जाते थे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि वंश का पवित्र होना एक ऐसी अनुकंपा है जिस पर ईश्वर अपने पैग़म्बरों के चयन में ध्यान देता है और उसने उन्हें पवित्र मनुष्यों के वंशों से चुना है।

    केवल पवित्र वंश का होना पर्याप्त नहीं है बल्कि मनुष्य को ईश्वर का पवित्र बंदा भी होना चाहिए तथा उसके समक्ष हर स्थिति में नतमस्तक भी रहना चाहिए ताकि उसके भीतर ईश्वर की विशेष अनुकंपाएं प्राप्त करने की संभावना उत्पन्न हो सके।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 59 और 60 की तिलावत सुनें।

    فَخَلَفَ مِنْ بَعْدِهِمْ خَلْفٌ أَضَاعُوا الصَّلَاةَ وَاتَّبَعُوا الشَّهَوَاتِ فَسَوْفَ يَلْقَوْنَ غَيًّا (59) إِلَّا مَنْ تَابَ وَآَمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَأُولَئِكَ يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ وَلَا يُظْلَمُونَ شَيْئًا (60)

    तो उनके बाद उनके स्थान पर ऐसे लोग आ गए जिन्होंने नमाज़ को व्यर्थ किया और अपनी आंतरिक इच्छाओं का पालन किया तो शीघ्र ही वे अपनी पथभ्रष्टता का प्रतिफल देखेंगे (19:59) सिवाय उनके जिन्होंने तौबा की, ईमान ले आए और भले कर्म किए तो यही लोग स्वर्ग में प्रविष्ट होंगे और उन पर तनिक भी अत्याचार नहीं किया जाएगा।(19:60)

    पिछली आयत में ईश्वर की बंदगी और दासता को पैग़म्बरों और ईश्वर के प्रिय बंदों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बताया गया था। ये आयतें कहती हैं कि ईश्वर के प्रिय बंदों द्वारा इतनी कठिनाइयां सहन किए जाने के बावजूद उनके बाद आने वाली जातियों व पीढ़ियों ने नमाज़ को, जो ईश्वर की बंदगी व उपासना का प्रतीक है, व्यर्थ कर दिया और अपनी आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति के चक्कर में पड़ गए। वे लोग पथभ्रष्ट हो गए तथा बुरा परिणाम उनकी प्रतीक्षा में है। इस परिणाम से केवल वे लोग सुरक्षित हैं जो सही मार्ग पर पलट आए और उन्होंने भले कर्म करके अपने अतीत को सुधार लिया।

    खेद के साथ कहना पड़ता है कि आज मानव समाज की एक बड़ी समस्या यह है कि अधिकांश लोग अपने रचयिता के समक्ष सिर नहीं झुकाते और जो लोग नमाज़ पढ़ते हैं उनमें से भी अधिकांश नमाज़ के संस्कारों का सही पालन नहीं करते और उसे व्यर्थ कर देते हैं। इस ग़लत व्यवहार का परिणाम मनुष्य पर उसकी आंतरिक इच्छाओं के नियंत्रण के रूप में सामने आता है जिससे विभिन्न प्रकार की पारिवारिक व सामाजिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि इस बात की संभावना रहती है कि आने वाली पीढ़ियां, अपने पूर्वजों की उपलब्धियों को व्यर्थ कर दें और अयोग्य हो जाएं।

    नमाज़, धर्म का चेहरा है और उसे व्यर्थ करना, धर्म और इस्लाम को बर्बाद करने के समान है।

    नमाज़, मनुष्य और उसकी आंतरिक इच्छाओं के बीच बांध का काम करती है और यदि यह बांध टूट जाए तो मनुष्य अपनी आंतरिक इच्छाओं का पालन करने लगता है।

    वास्तविक तौबा, बाहरी दिखावा नहीं बल्कि एक आंतरिक परिवर्तन है। वास्तविक तौबा मनुष्य को पथभ्रष्टता से निकाल कर वास्तविक कल्याण के मार्ग पर ले आती है और नरक में जाने वाले व्यक्ति को स्वर्ग में पहुंचा देती है।