islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए मरयम, आयतें 6-11, (कार्यक्रम 527)

    सूरए मरयम, आयतें 6-11, (कार्यक्रम 527)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 6 और 7 की तिलावत सुनें।

    يَرِثُنِي وَيَرِثُ مِنْ آَلِ يَعْقُوبَ وَاجْعَلْهُ رَبِّ رَضِيًّا (6) يَا زَكَرِيَّا إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَامٍ اسْمُهُ يَحْيَى لَمْ نَجْعَلْ لَهُ مِنْ قَبْلُ سَمِيًّا (7)

    (प्रभुवर! मुझे ऐसा उत्तराधिकारी प्रदान कर!) जो मेरा और याक़ूब के वंश का वारिस हो और उसे अपनी प्रसन्नता का पात्र बना, (19:6) (इसके उत्तर में ईश्वर ने कहा) हे ज़करिया, हम तुम्हें एक पुत्र की शुभ सूचना देते हैं जिसका नाम यहया है और इससे पूर्व हमने किसी का यह नाम नहीं रखा।(19:7)

    जैसा कि इससे पहले बताया गया था कि हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम को इस बात की चिंता थी कि उनकी मृत्यु के पश्चात, कहीं उनकी जाति के लोगों में से कोई उनका उत्तराधिकारी होने का दावा न कर दे और इस प्रकार ईश्वरीय प्रतिनिधित्व का पद अयोग्य व्यक्ति के हाथ में चला जाए। इसी लिए उन्होंने ईश्वर से एक योग्य व सक्षम पुत्र की प्रार्थना की।

    ये आयतें हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम के वंश की विरासत या धरोहर की ओर भी संकेत करती हैं क्योंकि हज़रत ज़करिया की पत्नी हज़रत सुलैमान के वंश से थीं कि जो हज़रत याक़ूब के पुत्र यहूदा के पुत्रों में से एक थे और उन्हें अपने पिता की ओर से बहुत धन संपत्ति मिली थी। अतः यह बात बड़ी स्वाभाविक थी कि हज़रत ज़करिया अपने उत्तराधिकारी के बारे में सोचते क्योंकि उनके पास मौजूद पैग़म्बरों की धरोहर यदि अयोग्य व अपवित्र लोगों के हाथ लग जाती तो इससे समाज में बहुत सी बुराइयां फैल सकती थीं।

    इसी आधार पर उन्होंने ईश्वर से अपनी प्रार्थना जारी रखते हुए कहा कि उनका उत्तराधिकारी योग्य, प्रिय और ईश्वर की प्रसन्नता का पात्र हो। कुछ व्याख्याकारों का कहना है कि इस आयत में प्रयोग होने वाले विरासत के शब्द का तात्पर्य, धन संपत्ति की धरोहर नहीं बल्कि पैग़म्बरी का पद है किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि ये दोनों ही बातें संभव हैं। अर्थात हज़रत ज़करिया ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें एक पुत्र प्रदान करे जो उनके बाद उनके माल का भी वारिस हो और उनके पश्चात ईश्वर की ओर से पैग़म्बर भी बनाया जाए।

    ईश्वर ने हज़रत ज़करिया की प्रार्थना को स्वीकार किया और उन्हें एक ऐसे पुत्र की शुभ सूचना दी जो विभिन्न आयामों से अद्वितीय हो तथा उसमें कुछ ऐसी विशेषताएं हों जो उससे पहले किसी में न थीं। ईश्वर ने उस पुत्र का नाम स्वयं निर्धारित किया और उसे बचपन में ही पैग़म्बरी का पद प्रदान कर दिया। हज़रत यहया अलैहिस्सलाम बचपन से ही बहुत बुद्धिमान थे। उन्होंने अपने जीवन की विशेष परिस्थितियों के कारण, जिनके चलते उन्हें सदैव यात्रा में रहना पड़ता था, विवाह नहीं किया तथा सांसारिक आनंदों से आंखें मूंदे रहे। जैसा कि उनके बाद हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम ने भी इन्हीं कारणों से विवाह नहीं किया।

    इन आयतों से हमने सीखा कि संतान की इच्छा एक स्वाभाविक इच्छा है और ईश्वर से संतान की प्रार्थना, पैग़म्बरी के पद से विरोधाभास नहीं रखती।

    बच्चों का नाम रखने में बहुत अधिक सावधानी से काम लेना चाहिए क्योंकि नाम, संस्कृति, आस्था और रुचियों का चिन्ह होता है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 8 और 9 की तिलावत सुनें।

    قَالَ رَبِّ أَنَّى يَكُونُ لِي غُلَامٌ وَكَانَتِ امْرَأَتِي عَاقِرًا وَقَدْ بَلَغْتُ مِنَ الْكِبَرِ عِتِيًّا (8) قَالَ كَذَلِكَ قَالَ رَبُّكَ هُوَ عَلَيَّ هَيِّنٌ وَقَدْ خَلَقْتُكَ مِنْ قَبْلُ وَلَمْ تَكُ شَيْئًا (9)

    (ज़करिया ने) कहा कि प्रभुवर किस प्रकार मेरा एक पुत्र हो सकता है जबकि मेरी पत्नी बांझ है और मैं बुढ़ापे के कारण अक्षम हो चुका हूं? (19:8) (फ़रिश्ते ने) कहा ऐसा ही है, तुम्हारे पालनहार ने कहा है कि यह कार्य मेरे लिए अत्यंत सरल है और इससे पूर्व मैं तुम्हारी रचना कर चुका हूं जबकि तुम कुछ भी नहीं थे। (19:9)

    यद्यपि हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम ने स्वयं ईश्वर से पुत्र के लिए प्रार्थना की थी किंतु उन्हें ज्ञात नहीं था कि उनकी प्रार्थना किस प्रकार पूरी होगी। क्या वे और उनकी पत्नी युवा बन जाएंगे और फिर उनके संतान होगी अथवा इसी वृद्धावस्था में ईश्वर उन्हें संतान प्रदान करेगा। यह प्रश्न और आश्चर्य, पैग़म्बरी के पद से विरोधाभास नहीं रखता क्योंकि पैग़म्बरों का ज्ञान भी सीमित है और उन्हें गुप्त बातों का ज्ञान भी उतना ही होता है जितना ईश्वर चाहता है।

    स्वाभाविक है कि सर्वसक्षम ईश्वर जो सृष्टि का रचयिता भी है और जिसने प्रकृति के क़ानून भी बनाए हैं, प्राकृतिक सिद्धांतों को परिवर्तित या सीमित भी कर सकता है क्योंकि वह पूरी सृष्टि का मालिक है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि बांझ महिलाओं व पुरुषों को ईश्वर की दया व कृपा की ओर से निराश नहीं रहना चाहिए क्योंकि अनेक उदाहरण हैं कि इस प्रकार के लोगों के यहां भी संतान हुई है।

    अपने जन्म और रचना के बारे में चिंतन-मनन से ईश्वर की शक्ति के बारे में हर प्रकार का संदेह समाप्त हो जाता है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 10 और 11 की तिलावत सुनें।

    قَالَ رَبِّ اجْعَلْ لِي آَيَةً قَالَ آَيَتُكَ أَلَّا تُكَلِّمَ النَّاسَ ثَلَاثَ لَيَالٍ سَوِيًّا (10) فَخَرَجَ عَلَى قَوْمِهِ مِنَ الْمِحْرَابِ فَأَوْحَى إِلَيْهِمْ أَنْ سَبِّحُوا بُكْرَةً وَعَشِيًّا (11)

    (ज़करिया ने) कहा, प्रभुवर! मेरे लिए कोई चिन्ह निर्धारित कर दे। ईश्वर ने कहा कि तुम्हारा चिन्ह यह है कि तुम निरंतर तीन (दिन) रात बात नहीं कर सकोगे।(19:10) तो वे अपनी मेहराब अर्थात उपासना स्थल से बाहर निकल कर अपनी जाति के लोगों की ओर गए और उन्हें संकेत किया कि वे हर भोर व संध्या को ईश्वर का गुणगान करें।(19:11)

    क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों के अनुसार हज़रत ज़करिया ने इस बात की ओर से निश्चिंत होने के लिए कि उन्होंने जो आवाज़ सुनी थी वह शैतान का उकसावा नहीं बल्कि ईश्वरीय वाणी थी, ईश्वर से निवेदन किया कि वह उनके लिए कोई चिन्ह निर्धारित करे। ईश्वर की ओर से आवाज़ आई कि चिन्ह यह है कि वे तीन दिनों तक ईश्वर के गुणगान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बोल पाएंगे।

    ईश्वर की ओर से यह चिन्ह मिलने के बाद हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम अपने उपासना स्थल से बाहर निकले और लोगों को हर सुबह व शाम ईश्वर के गुणगान और उपासना का निमंत्रण दिया और चूंकि वे बोल नहीं सकते थे इस लिए उन्होंने संकेतों के माध्यम से यह बात कही।

    इन आयतों से हमने सीखा कि हमारे शरीर का हर अंग ईश्वर के इरादे के अधीन है और यदि वह न चाहे तो संपूर्ण स्वास्थ्य के बावजूद अंग, अपना काम नहीं कर सकते।

    ईश्वर का गुणगान और उपासना, मौसमी व अस्थायी नहीं बल्कि हर दिन सुबह व शाम निरंतर व सर्वकालिक होनी चाहिए।