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    सूरए मरयम, आयतें 61-65, (कार्यक्रम 537)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 61, 62 और 63 की तिलावत सुनें।

    جَنَّاتِ عَدْنٍ الَّتِي وَعَدَ الرَّحْمَنُ عِبَادَهُ بِالْغَيْبِ إِنَّهُ كَانَ وَعْدُهُ مَأْتِيًّا (61) لَا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا إِلَّا سَلَامًا وَلَهُمْ رِزْقُهُمْ فِيهَا بُكْرَةً وَعَشِيًّا (62) تِلْكَ الْجَنَّةُ الَّتِي نُورِثُ مِنْ عِبَادِنَا مَنْ كَانَ تَقِيًّا (63)

    सदैव रहने वाला स्वर्ग जिसका वचन दयावान ईश्वर ने अपने गुप्त ज्ञान के आधार पर अपने दासों को दिया है, निश्चित रूप से उसका वचन पूरा हो कर रहेगा।(19:61) उस स्थान पर वे कोई भी अनुचित बात नहीं सुनेंगे (और उनका कथन) सलाम और शांति के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा। वहां उन्हें हर प्रातः और संध्या को अपनी आजीविका मिलेगी। (19:62) यही वह स्वर्ग है जिसका उत्तराधिकारी हम अपने पवित्र बंदों को बनाएंगे।(19:63)

    ये आयतें स्वर्ग का वर्णन करती हैं और उसकी कुछ विशेषताओं का उल्लेख करती हैं। आयतें कहती हैं कि स्वर्ग, सदैव रहने वाला ठिकाना है और जो कोई उसमें प्रविष्ट हो जाएगा उसमें से बाहर नहीं निकलेगा। यह स्वर्ग ईश्वर का वही वचन है जो उसने अपने गुप्त ज्ञान के आधार पर ईमान वालों को दिया था और आज वे उसे अपनी आंखों से देखेंगे।

    इस संसार में ईमान वालों का एक दुख अनेकेश्वरवादियों और विरोधियों की ओर से अनुचित और बुरी बातें सुनना है किंतु स्वर्ग में प्रेम, शांति और मित्रता के अतिरिक्त कोई अन्य बात सुनाई नहीं पड़ेगी। वहां ईश्वर की ओर से आजीविका भी निरंतर मिलती रहेगी।

    इस भाग की अंतिम आयत दो बिंदुओं की ओर संकेत करती है, प्रथम यह कि स्वर्ग में प्रवेश की मूल शर्त पवित्रता और ईश्वर से भय है और पवित्रता तथा हर प्रकार की बुराई से दूरी के बिना स्वर्ग में प्रवेश करने की कोई संभावना नहीं है। दूसरे यह कि मनुष्य इस संसार में अपने कार्यों द्वारा इस प्रकार के महान पारितोषिक का अधिकारी नहीं बनता अतः कहा जा सकता है कि ईश्वर अपने प्रिय व पवित्र बंदों को जो कुछ प्रदान करता है वह उस विरासत की भांति है जो पिता अपनी संतान के लिए छोड़ जाते हैं और संतान बिना किसी परिश्रम के उस विरासत से लाभान्वित होती है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि स्वर्ग की वास्तविकता हमसे छिपी हुई है और यह ईश्वर के गुप्त ज्ञानों में से है किंतु स्वर्ग ईश्वर के वचनों में से एक है जिस पर हम ईमान रखते हैं और उसकी कृपा से प्रलय में हमें स्वर्ग प्राप्त होगा।

    यदि हम स्वर्ग में जाना चाहते हैं तो हमें प्रयास करना चाहिए कि इस संसार में ऐसी बैठकों में न जाएं जिनमें बुरी और अनुचित बातें की जाती हैं।

    स्वर्ग, ईश्वर से डरने वालों और पवित्र लोगों की विरासत है, चाहे वे सांसारिक विरासतों से वंचित ही क्यों न रहें।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 64 की तिलावत सुनें।

    وَمَا نَتَنَزَّلُ إِلَّا بِأَمْرِ رَبِّكَ لَهُ مَا بَيْنَ أَيْدِينَا وَمَا خَلْفَنَا وَمَا بَيْنَ ذَلِكَ وَمَا كَانَ رَبُّكَ نَسِيًّا (64)

    और हम (फ़रिश्ते) केवल आपके पालनहार के आदेश से ही (धरती पर) उतरते हैं। जो कुछ हमारे सामने, पीछे और इन दोनों के बीच में है, सब उसी का है। और आपका पालनहार कदापि किसी बात को भूलने वाला नहीं है।(19:64)

    क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों के अनुसार कुछ समय के लिए पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास ईश्वरीय संदेश आने का क्रम रुक गया जिसके कारण वे बहुत चिंतित हुए और विरोधी उन पर कटाक्ष करने लगे। यहां तक कि ईश्वर ने यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम के पास भेजी और उन्हें सांत्वना दी कि वह उन्हें भूला नहीं है। ईश्वर किसी भी बात को भूलने वाला नहीं है और ईश्वरीय संदेश लाने वाले फ़रिश्ते सहित सभी फ़रिश्ते ईश्वर के ज्ञान, युक्ति व तत्वदर्शिता के आधार पर धरती पर आते हैं। अतीत, वर्तमान और भविष्य हर काल और हर वस्तु ईश्वर की है और कोई भी वस्तु उसके स्वामित्व की परिधि से बाहर नहीं है।

    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद की आयतें ईश्वर के आदेश पर निर्धारित समय और स्थान पर क्रमबद्ध ढंग से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भेजी गई हैं और इसमें पैग़म्बर व फ़रिश्तों की कोई भूमिका नहीं है।

    फ़रिश्ते, ईश्वरीय आदेशों के समक्ष पूर्ण रूप से नतमस्तक हैं और उनका अपना कोई अधिकार नहीं है।

    ईश्वर कदापि किसी बात को नहीं भूलता और समय बीतना या कोई भी अन्य कारक ईश्वर में भूल का कारण नहीं बनता।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 65 की तिलावत सुनें।

    رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا فَاعْبُدْهُ وَاصْطَبِرْ لِعِبَادَتِهِ هَلْ تَعْلَمُ لَهُ سَمِيًّا (65)

    आकाशों, धरती और जो कुछ इन दोनों के बीच है, सब का पालनहार, ईश्वर ही है तो केवल उसी की उपासना करो और उसकी उपासना पर संयम से (जमे) रहो। क्या तुम्हें उसके किसी (समकक्ष और) हमनाम का ज्ञान है? (19:65)

    यह आयत सृष्टि के संचालन में एकेश्वरवाद की ओर संकेत करती है और कहती है कि आकाशों और धरती से लेकर संपूर्ण सृष्टि एक ईश्वर की युक्ति के अधीन है, उसी ने सबकी रचना की है और वही सबका संचालन कर रहा है। इसके बाद आयत कहती है कि जब ऐसा है और अनन्य ईश्वर के अतिरिक्त सृष्टि का कोई रचयिता व पालनहार नहीं है तो केवल उसी की उपासना करो और उसके अतिरिक्त किसी की भी उपासना करने से बचो। स्वाभाविक है कि इस मार्ग में बहुत अधिक रुकावटें और पथभ्रष्ट करने वाले कारक हैं अतः हमें ईश्वर की बंदगी के मार्ग में पूरे संयम के साथ डटे रहना चाहिए और इस मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए क्योंकि ईश्वर जैसा कोई भी सृष्टि में नहीं है।

    इस आयत में ईश्वर की उपासना का अर्थ केवल नमाज़ और ईश्वर का गुणगान नहीं है क्योंकि इस प्रकार की उपासनाओं में बहुत अधिक कठिनाई नहीं होती बल्कि आयत का तात्पर्य यह है कि हमें अपने व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन के हर मामले में ईश्वरीय आदेशों के समक्ष पूर्ण रूप से नतमस्तक रहना चाहिए क्योंकि मनुष्य को सदैव ही विरोधाभासों का सामना रहता है और उसके समक्ष दोराहे आते रहते हैं अतः उसे सत्य के मार्ग पर डटे रहना चाहिए।

    इस आयत से हमने सीखा कि सृष्टि के संचालन में एकेश्वरवाद, उपासना में एकेश्वरवाद का स्रोत है अतः केवल अनन्य ईश्वर की उपासना ही वैध है।

    ईश्वर की उपासना के लिए अपनी आंतरिक इच्छाओं और बाहरी चमक-दमक से संघर्ष की आवश्यकता होती है अतः इस मामले में संयम से काम लेना चाहिए।