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    सूरए मरयम, आयतें 66-70, (कार्यक्रम 538)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 66 और 67 की तिलावत सुनें।

    وَيَقُولُ الْإِنْسَانُ أَئِذَا مَا مِتُّ لَسَوْفَ أُخْرَجُ حَيًّا (66) أَوَلَا يَذْكُرُ الْإِنْسَانُ أَنَّا خَلَقْنَاهُ مِنْ قَبْلُ وَلَمْ يَكُ شَيْئًا (67)

    और मनुष्य कहेगा कि क्या जब मैं मर जाऊंगा तो शीघ्र ही (क़ब्र से) पुनः जीवित हो कर निकलूंगा? (19:66) क्या मनुष्य इस बात को याद नहीं करता कि हमने ही पहले उसकी रचना की है जबकि वह कुछ भी नहीं था? (19:67)

    पिछली आयतों में स्वर्ग और स्वर्ग में रहने वालों की कुछ विशेषताओं का उल्लेख किया गया था। यह आयतें प्रलय और उसके संबंध में कुछ लोगों के संदेहों के बारे में चर्चा करती हैं। प्रलय का इन्कार करने वाले बहुत से लोग, बिना किसी तर्क के इसे असंभव बताते हैं और कहते हैं कि यह बात किस प्रकार संभव है कि जब मनुष्य मरने के पश्चात मिट्टी में परिवर्तित हो जाए तो पुनः जीवित हो कर क़ब्र से बाहर निकल आए?

    इस संबंध में ईश्वर का उत्तर यह है कि मनुष्य किस प्रकार अपने अतीत को भूल गया है? जब वह कुछ भी नहीं था तो ईश्वर ने उसकी रचना की थी तो अब वह उसे किस प्रकार पुनः जीवित नहीं कर सकता? ईश्वर इससे पूर्व भी यह काम कर चुका है और अब भी वह उसे मृत्यु के पश्चात जीवित करने में सक्षम है।

    स्वाभाविक है कि इस प्रकार के प्रश्न, इन लोगों में ईमान के अभाव और ईश्वर की असीम शक्ति व ज्ञान से अनभिज्ञता का चिन्ह हैं। ये लोग उसे मनुष्य की सीमित शक्ति व ज्ञान के मानदंड पर तोल कर इस प्रकार के कार्य को असंभव बताते हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य की पुनर्सृष्टि, उसकी प्राथमिक सृष्टि से अधिक सरल है, चाहे प्रलय का इन्कार करने वालों की दृष्टि में यह कार्य असंभव ही क्यों न प्रतीत हो।

    प्रलय में लोगों को शारीरिक रूप से उपस्थित किया जाएगा और प्रलय का इन्कार करने वालों को अधिक संदेह मनुष्य के शरीर के पुनः जीवित होने के बारे में है, यदि प्रलय में मनुष्यों की आत्मा को उपस्थित किया जाता तो इस प्रकार के संदेह भी कम होते।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 68 की तिलावत सुनें।

    فَوَرَبِّكَ لَنَحْشُرَنَّهُمْ وَالشَّيَاطِينَ ثُمَّ لَنُحْضِرَنَّهُمْ حَوْلَ جَهَنَّمَ جِثِيًّا (68)

    तो आपके पालनहार की सौगंध कि हम उन सभी को शैतानों के साथ उपस्थित करेंगे और फिर हम अवश्य ही उन्हें घुटनों के बल गिरे हुए, नरक के चारों ओर हाज़िर करेंगे।(19:68)

    स्वाभाविक सी बात है कि प्रलय का इन्कार करने वाले ईश्वर का भी इन्कार करते हैं और सैद्धांतिक रूप से यह बात स्वीकार नहीं की जा सकती कि कोई ईश्वर को तो स्वीकार करे किंतु प्रलय को स्वीकार न करे। अतः प्रलय का इन्कार करने वाले लोग ऐसे अधर्मी होते हैं जो सीधे ईश्वरीय मार्ग से विचलित होकर पथभ्रष्टता में ग्रस्त हो चुके हैं। इन लोगों से इनके कुफ़्र और प्रलय के इन्कार के कारण प्रलय में हिसाब लिया जाएगा और यदि उनके द्वारा प्रलय और ईश्वर का इन्कार जान बूझ कर तथा द्वेष व हठधर्म के कारण हुआ तो उन्हें नरक में डाल दिया जाएगा किंतु यदि उनका यह कार्य अज्ञानता के कारण हुआ तो वे ईश्वर की क्षमा का पात्र बनेंगे।

    यह आयत कहती है कि प्रलय में काफ़िरों को शैतानों के साथ उपस्थित किया जाएगा चाहे वे जिन्नों में से हों अथवा मनुष्यों में से। उनके साथ इस संसार में परस्पर सहयोग व समरसता के आधार पर व्यवहार किया जाएगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय के संबंध में ईश्वर की चेतावनियों और प्रलय की परिस्थितियों को गंभीरता से लेना चाहिए और अपने आपको इतने बड़े न्यायालय में उपस्थित होने के लिए तैयार करना चाहिए।

    जो लोग इस संसार में घमंड व अहं के कारण धर्म की वास्तविकताओं का परिहास करते हैं, वे प्रलय में नरक को देखने के बाद खड़े होने में भी सक्षम नहीं रहेंगे तथा अपमान के चरम पर पहुंच कर घुटने टेक देंगे।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 69 और 70 की तिलावत सुनें।

    ثُمَّ لَنَنْزِعَنَّ مِنْ كُلِّ شِيعَةٍ أَيُّهُمْ أَشَدُّ عَلَى الرَّحْمَنِ عِتِيًّا (69) ثُمَّ لَنَحْنُ أَعْلَمُ بِالَّذِينَ هُمْ أَوْلَى بِهَا صِلِيًّا (70)

    उसके पश्चात हम हर उस गुट को जो दयावान ईश्वर के प्रति अधिक उद्दंड रहा होगा, अलग कर देंगे (19:69) फिर निश्चित रूप से हम इस बात से अधिक अवगत हैं कि कौन लोग नरक में जलने के अधिक योग्य हैं। (19:70)

    प्रलय के न्यायालय में काफ़िरों के उपस्थित होने के संबंध में पिछली आयतों के क्रम को जारी रखते हुए इन आयतों में कहा गया है कि ऐसा नहीं है कि नरक में रहने वाले सभी लोगों का स्थान और दर्जा एक ही होगा, बल्कि ईश्वरीय न्याय की मांग है कि जिसने जितने पाप और अपराध किए हैं उसी के अनुपात में उसे दंड दिया जाए। अतः प्रलय में पापियों को एक दूसरे से अलग करके उनका वर्गीकरण किया जाएगा और जिन्होंने अधिक उद्दंडता दिखाई थी उन्हें अधिक कड़ा दंड दिया जाएगा।

    शायद कहा जा सकता है कि पापियों के तीन गुट हैं। एक गुट उन लोगों का है जो स्वयं पाप करते हैं, दूसरा गुट उन लोगों का है जो दूसरों को पाप का निमंत्रण देते हैं और पाप के साधन उन्हें उपलब्ध कराते हैं और तीसरा गुट उन लोगों का है जो दूसरों द्वारा पाप किए जाने पर राज़ी रहते हैं। स्वाभाविक है कि इनमें से हर गुट का दंड अलग है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर दया व प्रेम का स्रोत है किंतु मनुष्य उसकी दया प्राप्त करने के स्थान पर उद्दंडता करता है और स्वयं को ईश्वरीय कोप का पात्र बना लेता है।

    नरक की विभिन्न मंज़िलें और श्रेणियां हैं तथा हलके और भारी पाप के अनुसार दंड भी विभिन्न प्रकार का होगा। ईश्वर का असीम ज्ञान इस बात को निर्धारित करेगा कि कौन किस मंज़िल में रहे।