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    सूरए मरयम, आयतें 71-74, (कार्यक्रम 539)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 71 और 72 की तिलावत सुनें।

    وَإِنْ مِنْكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا كَانَ عَلَى رَبِّكَ حَتْمًا مَقْضِيًّا (71) ثُمَّ نُنَجِّي الَّذِينَ اتَّقَوْا وَنَذَرُ الظَّالِمِينَ فِيهَا جِثِيًّا (72)

    और तुममें से ऐसा कोई नहीं जो नरक में न जाने वाला हो, यह तुम्हारे पालनहार का निश्चित फ़ैसला है, (19:71) फिर हम ईश्वर का भय रखने वालों को मुक्ति प्रदान कर देंगे और अत्याचारियों को नरक में घुटनों के बल पड़ा हुआ छोड़ देंगे।(19:72)

    पिछली आयतों में प्रलय, उसके पारितोषिक तथा दंड की विशेषताओं का वर्णन किया गया था। इन आयतों में स्वर्ग में जाने वालों के नरक से गुज़रने की शैली की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि सभी लोग चाहे वे अच्छे हों या बुरे, आरंभ में नरक में जाएंगे। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन है कि जब भले लोग नरक में जाएंगे तो आग उनके लिए ठंडी हो जाएगी और उन्हें नहीं जलाएगी जैसा कि नमरूद द्वारा भड़काई गई आग ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को नहीं जलाया था क्योंकि मूल रूप से आग, पवित्र व ईमान वाले लोगों से मेल नहीं खाती अतः वे बड़े वेग से नरक से गुज़र कर ईश्वर के सुरक्षित स्वर्ग में पहुंच जाएंगे।

    इसी प्रकार जिन लोगों ने इस संसार में बुरे कर्म किए होंगे वे नरक के लिए आग पहले ही भेज चुके होंगे अतः वे उसी आग में जलेंगे और उन्हें मुक्ति का कोई मार्ग नहीं मिलेगा। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के कथनों के अनुसार सिरात नामक पुल नरक के ऊपर बना हुआ है और सभी को उस पर से गुज़रना होगा। स्वर्ग में जाने वाले बड़ी तीव्रता से उस पर से गुज़र जाएंगे और नरक की आग में नहीं फंसेंगे जबकि नरक वाले उस पुल पर से नहीं गुज़र पाएंगे और आग में जलेंगे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय के न्यायालय के अतिरिक्त नरक भी स्पष्ट रूप से सबके बारे में बता देगा कि कौन स्वर्ग में जाने की क्षमता रखता है और किसे आग में जलना है।

    नरक से बचने का एकमात्र मार्ग ईश्वर से डरना है। ईश्वर को दृष्टिगत रखे बिना किया जाने वाला हर कार्य किसी न किसी रूप में अत्याचार है, अपने ऊपर अत्याचार, समाज पर अत्याचार या ईश्वरीय धर्म पर अत्याचार।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 73 की तिलावत सुनें।

    وَإِذَا تُتْلَى عَلَيْهِمْ آَيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ قَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلَّذِينَ آَمَنُوا أَيُّ الْفَرِيقَيْنِ خَيْرٌ مَقَامًا وَأَحْسَنُ نَدِيًّا (73)

    और जब कभी उनके समक्ष हमारी स्पष्ट आयतों की तिलावत की जाती है तो काफ़िर, ईमान वालों से कहते हैं कि हममें से कौन सा गुट स्थान की दृष्टि से उत्तम है और किसका ठिकाना अधिक सुंदर है।(19:73)

    यह आयत मक्के के अनेकेश्वरवादियों के श्रेष्ठताप्रेम व विस्तारवाद की भावना की ओर संकेत करती है कि जब उन्होंने देखा कि अम्मार, बेलाल और ख़बाब जैसे लोग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर ईमान ले आए हैं तो उन्होंने बड़े अपमाजनक ढंग से और परिहास भरे स्वर में कहा कि किस प्रकार समाज के दासों को प्रतिष्ठित लोगों के समान समझा जा सकता है। ये लोग सत्ता व प्रतिष्ठा की चरम सीमा पर थे जबकि वे दरिद्रता और समस्याओं में ग्रस्त थे।

    अरबों की अज्ञानता के काल में जब सोने, आभूषण, शक्ति व सत्ता को मान्यता का मानदंड समझा जाता था, धनाड्य लोग स्वयं को श्रेष्ठ तथा दरिद्रों को तुच्छ समझते थे और कहते थे कि उनका समाज में कोई स्थान नहीं है। जबकि सत्य व असत्य का मानदंड धन व शक्ति नहीं बल्कि सही आस्था व उचित तर्क है।

    इस आयत से हमने सीखा कि सत्य व असत्य का मानदंड धन व शक्ति नहीं बल्कि आस्था व तर्क है। यदि काफ़िरों का जीवन अच्छा है तो यह उनकी सत्यता या उन पर ईश्वर की कृपा का चिन्ह नहीं है।

    अहं व घमंड तथा श्रेष्ठताप्रेम, कुफ़्र का मार्ग प्रशस्त करता है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 74 की तिलावत सुनें।

    وَكَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُمْ مِنْ قَرْنٍ هُمْ أَحْسَنُ أَثَاثًا وَرِئْيًا (74)

    और इन (काफ़िरों) से पहले की कितनी जातियां थीं जिन्हें हमने नष्ट कर दिया जबकि वे इनसे अधिक धनाड्य थे और उनकी विदित स्थिति भी इनसे अधिक अच्छी थी।(19:74)

    यह आयत घमंडियों व अहंकारियों को संबोधित करते हुए कहती है कि क्या तुमने इतिहास का अध्ययन नहीं किया है जो ईमान वालों को इस प्रकार तुच्छता की दृष्टि से देखते हो और उन्हें तनिक भी महत्व नहीं देते? यदि धन-संपत्ति, ईश्वर की दृष्टि में अधिक प्रिय होने का मानदंड होता तो ईश्वर उन्हें इस प्रकार क्यों विनष्ट करके उन्हें बुरे अंत में ग्रस्त कर देता?

    धन-संपत्ति व ऐश्वर्य न ही मोक्ष व कल्याण का चिन्ह है और न ही ईश्वरीय कोप को रोक सकता है बल्कि इसके विपरीत अधिकांश अवसरों पर धन-दौलत, सत्ता व पद मनुष्य में घमंड व निश्चेतना उत्पन्न होने का कारण बनता है तथा उसे उद्दंड बना देता है और अंतत उसके सर्वनाश का साधन बन जाता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि इतिहास से पाठ सीखना चाहिए। अत्याचारियों व उद्दंडियों का बुरा परिणाम, सत्य व असत्य की पहचान का उत्तम स्रोत व पाठ सामग्री है।

    जिस वस्तु पर धनवान घमंड करते हैं वह इस संसार की नश्वर चमक-दमक है कि जो न तो इस संसार में उनकी मुक्ति का कारण है न उस संसार में। इसका विदित रूप सुंदर है किंतु वास्तविक चेहरा अत्यंत कुरूप है।