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    सूरए मरयम, आयतें 75-80, (कार्यक्रम 540)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 75 की तिलावत सुनें।

    قُلْ مَنْ كَانَ فِي الضَّلَالَةِ فَلْيَمْدُدْ لَهُ الرَّحْمَنُ مَدًّا حَتَّى إِذَا رَأَوْا مَا يُوعَدُونَ إِمَّا الْعَذَابَ وَإِمَّا السَّاعَةَ فَسَيَعْلَمُونَ مَنْ هُوَ شَرٌّ مَكَانًا وَأَضْعَفُ جُنْدًا (75)

    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि जो कोई पथभ्रष्टता में है, उसे दयावान (ईश्वर) कुछ समय की मोहलत देगा यहां तक कि वह दंड के वचन को अपनी आंखों से देख ले, या तो (इस संसार में) दंड के रूप में या फिर प्रलय (में दंड) के रूप में। तो शीघ्र ही उन्हें ज्ञात हो जाएगा कि स्थान की दृष्टि से सबसे बुरा और (सहायक) लश्कर की दृष्टि से सबसे कमज़ोर कौन है।(19:75)

    पिछली आयतों में बताया गया था कि मक्के के धनाड्य व तथाकथित प्रतिष्ठित लोग बड़े घमंड से कहा करते थे कि हमारा स्थान उच्च है या इन दरिद्र ईमान वालों का? यह आयत उनके उत्तर में कहती है कि यह ईश्वर की परंपरा है कि वह संसार में प्रगति व विकास की संभावनाएं, अच्छे-बुरे सभी लोगों को प्रदान करता है किंतु ईश्वर की ओर से दिए जाने वाले इस अवसर व मोहलत को तुम अपने लिए विशिष्टता मान कर इस पर घमंड न करो और यह मत सोचो कि तुम्हें सदैव ये अनुकंपाएं प्राप्त रहेंगी बल्कि जो कोई कुफ़्र व अत्याचार में ग्रस्त होगा, उसे लोक या परलोक में उसके दंड भोगना ही होगा। तब स्पष्ट हो जाएगा कि स्थान की दृष्टि से कौन अधिक उच्च है, तुम या वे दरिद्र ईमान वाले।

    स्वाभाविक है कि ईश्वर सभी पथभ्रष्ट लोगों को अवसर देता है कि शायद वे तौबा करके सही मार्ग पर लौट आएं किंतु प्रायः पथभ्रष्ट लोग इस अवसर से अनुचित लाभ उठाते हैं और अपने ग़लत व्यवहार से अपने लिए अधिक कड़ा दंड तैयार कर लेते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की परंपरा यह है कि वह सभी को समान अवसर उपलब्ध कराता है ताकि हर व्यक्ति अपने अधिकार के साथ अपना मार्ग चुने और उसके परिणाम को भी स्वीकार करे।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 76 की तिलावत सुनें।

    وَيَزِيدُ اللَّهُ الَّذِينَ اهْتَدَوْا هُدًى وَالْبَاقِيَاتُ الصَّالِحَاتُ خَيْرٌ عِنْدَ رَبِّكَ ثَوَابًا وَخَيْرٌ مَرَدًّا (76)

    और जिन लोगों को मार्गदर्शन प्राप्त हो चुका है, ईश्वर उनके मार्गदर्शन में वृद्धि करता है और बाक़ी रखने वाले भले कर्म तो आपके पालनहार के पास अधिक भले हैं, पुण्य की दृष्टि से भी और प्रलय के प्रतिफल की दृष्टि से भी।(19:76)

    पिछली आयत में कहा गया कि पथभ्रष्ट लोग अपने कार्यों से अधिक पथभ्रष्टता में ग्रस्त होते जाते हैं और परलोक में उनके दंड में वृद्धि होती जाती है। यह आयत कहती है कि जो लोग ईश्वरीय मार्गदर्शन के पथ पर आगे बढ़ते हैं ईश्वर उन पर कृपा करता है तथा उन्हें जीवन के मार्ग में पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखता है या दूसरे शब्दों में उनके मार्गदर्शन में वृद्धि करता रहता है। एक सीढ़ी की भांति की जब मनुष्य उस पर एक क़दम रखता है तो अगले क़दम का मार्ग प्रशस्त हो जाता है और मनुष्य धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता जाता है।

    सच्चे ईमान के कारण जो वस्तु सामने आती है वह भला कर्म है और मनुष्य की नीयत और भावना जितनी शुद्ध होती है उसके भले कर्म उतने ही टिकाऊ एवं अमर होते हैं। स्पष्ट है कि अच्छे कर्म हर धन व संपत्ति से उत्तम हैं बल्कि भले कर्मों की उनसे तुलना ही नहीं की जा सकती क्योंकि सांसारिक धन-दौलत नश्वर है जबकि भले कर्म बाक़ी भी रहने वाले हैं और उनके कारण प्रलय में पारितोषिक एवं प्रतिफल भी मिलेगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय मार्गदर्शन के चरण व दर्जे हैं और भले कर्म अधिक मार्गदर्शन की भूमि प्रशस्त करते हैं।

    भला अंत, अधिक धन या अच्छी सवारी से नहीं बल्कि भले कर्मों से प्राप्त होता है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 77 से 80 तक की तिलावत सुनें।

    أَفَرَأَيْتَ الَّذِي كَفَرَ بِآَيَاتِنَا وَقَالَ لَأُوتَيَنَّ مَالًا وَوَلَدًا (77) أَطَّلَعَ الْغَيْبَ أَمِ اتَّخَذَ عِنْدَ الرَّحْمَنِ عَهْدًا (78) كَلَّا سَنَكْتُبُ مَا يَقُولُ وَنَمُدُّ لَهُ مِنَ الْعَذَابِ مَدًّا (79) وَنَرِثُهُ مَا يَقُولُ وَيَأْتِينَا فَرْدًا (80)

    (हे पैग़म्बर!) क्या आपने उस व्यक्ति को देखा है जिसने हमारी आयतों का इन्कार किया, यह कहा कि (प्रलय में भी) मुझे बहुत अधिक धन व संतान प्रदान की जाएगी? (19:77) क्या वह (ईश्वर के) गुप्त ज्ञान से सूचित हो गया है? या उसने दयावान (ईश्वर) से कोई वचन व प्रतिज्ञा ले ली है? (19:78) ऐसा कदापि नहीं है और जो कुछ वह कह रहा है उसे शीघ्र ही हम (उसके कर्मपत्र में) लिख लेंगे और उसके दंड में भी निरंतर वृद्धि करते रहेंगे।(19:79) और (धन व संतान के बारे में) वह जो कुछ भी कह रहा है उसके वारिस भी हम ही होंगे और वह अकेला ही हमारे पास आएगा।(19:80)

    पिछली आयतों में मार्गदर्शित व पथभ्रष्ट लोगों की तुलना की गई थी, ये आयतें काफ़िरों और मायामोह में ग्रस्त लोगों के विचारों व कल्पनाओं की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि वे इस प्रकार बात व व्यवहार करते हैं मानो संसार के शासक हों और धन व संतान के बारे में वे जो कुछ भी चाहें, ईश्वर को उन्हें प्रदान करना ही चाहिए। वे इन्हीं बातों पर घमंड करते हैं और इन्हें ईमान वालों पर अपनी श्रेष्ठता का कारण समझते हैं।

    क़ुरआने मजीद उनके उत्तर में कहता है कि बेहतर भविष्य के बारे में उनकी ये बातें और आस्थाएं, एक प्रकार की भविष्यवाणी और ईश्वर के गुप्त ज्ञान की सूचना है। उन्हें किस प्रकार इस ज्ञान की सूचना हो सकती है और क्या उन्होंने ईश्वर से इस संबंध में कोई प्रतिज्ञा ले रखी है? जबकि वास्तविकता यह है कि जो कुछ उन्हें मिलने वाला है वह ईश्वर का कड़ा दंड है जो उनके लोक-परलोक को अपनी चपेट में ले लेगा। इस संसार में उन्होंने जो धन-संपत्ति एकत्रित की है उसे वे अपने वारिसों के लिए छोड़ जाएंगे और इस संसार से ख़ाली हाथ ईश्वर की ओर जाएंगे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि काफ़िरों की दृष्टि में कुफ़्र प्रगति और ईमान विकास में रुकावट का कारण है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है और ईश्वर ने इस परंपरा का आधार नहीं रखा है।

    हमारे हर कथन और व्यवहार को लिखा जाता है और एक दिन हमें अपने सभी कर्मों का उत्तर देना होगा।