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    सूरए मरयम, आयतें 81-86, (कार्यक्रम 541)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर ८१ और ८२ की तिलावत सुनें।

    وَاتَّخَذُوا مِنْ دُونِ اللَّهِ آَلِهَةً لِيَكُونُوا لَهُمْ عِزًّا (81) كَلَّا سَيَكْفُرُونَ بِعِبَادَتِهِمْ وَيَكُونُونَ عَلَيْهِمْ ضِدًّا (82)

    उन लोगों ने एक ईश्वर के स्थान पर दूसरे देवताओं का चयन किया ताकि वह देवता उन के लिए सम्मान का कारण बनें (19:81) कदापि नहीं शीघ्र ही वे उनकी उपासना का इन्कार करेंगे और उनके शत्रु बन जाएगें। (19:82)

    पिछली आयतों में बताया गया कि कुछ लोग संसार के मोह माया में ग्रस्त हो जाते हैं और धन व संतान को सम्मान व शक्ति का कारण समझते हैं इस आयत में कहा गया है कि ईश्वर का इन्कार करने वाले सम्मान की खोज ईश्वर को छोड़ कर करते हैं जबकि उनके काल्पनिक देवता भी प्रलय के दिन उनसे विरक्तता प्रकट करेंगे और अपने उपासकों की सिफारिश, उन्हें सम्मान देने या सहायता करने के स्थान पर उनके विरुद्ध ही खड़े हो जाएगें।

    क़ुरआने मजीद की कुछ दूसरी आयतों में भी इसी विषय की ओर संकेत किया गया है कि यहां तक कि पत्थर और लकड़ी की प्रतिमाएं भी प्रलय के दिन ईश्वर के आदेश से बोलने लगेंगी और अपने उपासकों और अनेकेश्वरवादियों से विरक्तता की घोषणा करेंगी।

    इमामे जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम का कथन है कि इस आयत में देवताओं से आशय वह बड़े लोग और सरदार हैं जिनका अनुसरण करके लोग सम्मान पाना चाहते हैं क्योंकि इस आयत में उपासना से आशय सजदा करना या झुकना नहीं बल्कि अनुसरण व आज्ञापालन है और जो भी किसी रचना के आज्ञापालन द्वारा रचयिता की अवज्ञा करता है तो इस प्रकार का आज्ञापालन वास्तव में उसकी उपासना करने की भांति होता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि सम्मान व प्रेम मनुष्य की प्रवृत्ति का भाग है किंतु बहुत से लोग सम्मान प्राप्त करने के स्थान के बारे में ग़लती कर बैठते हैं और सम्मान के मूल स्रोत अर्थात ईश्वर की ओर नहीं जाते।

    मनुष्य ईश्वर को छोड़ कर जिन लोगों से आशा लगाते हैं वही लोग अथवा वस्तुएं क़यामत के दिन उनके विरुद्ध खड़ी होंगी और ईश्वर को छोड़ कर अन्य पर भरोसे के कारण वह भी अपने उपासकों से क्रुद्ध होंगी।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर ८३ और ८४ की तिलावत सुनें।

    أَلَمْ تَرَ أَنَّا أَرْسَلْنَا الشَّيَاطِينَ عَلَى الْكَافِرِينَ تَؤُزُّهُمْ أَزًّا (83) فَلَا تَعْجَلْ عَلَيْهِمْ إِنَّمَا نَعُدُّ لَهُمْ عَدًّا (84)

    क्या तुमने नहीं देखा कि हमने शैतानों को काफ़िरों के पास भेजा ताकि वह उन्हें भड़काएं (19:83) तो उनके बारे में उतावलापन मत करो हम ने उनका हिसाब कर रखा है।(19:84)

    जैसाकि हमने बताया कि ईश्वर को न मानने वालों को अन्य वस्तुओं की पूजा और बड़े बड़े लोगों के आज्ञापालन से कुछ हाथ आने वाला नहीं है और क़यामत के दिन स्वंय वे और उनके लिए जो पूज्य थे सब ईश्वर की शरण में ही जाएंगे तो फिर हमें क्या जल्दी है कि ईश्वर शीघ्र ही उनका काम ख़त्म कर दे ? उनके सारे कर्म लिखे जा रहे हैं यहां तक कि उनकी सांसें भी गिनी जा रही हैं।

    सांसे या आयु का हिसाब रखने का अर्थ वास्तव में उन कर्मों का हिसाब रखना है जो आयुपत्र में लिखा जाता है और जिस प्रकार से गर्भाशय में रहने से बच्चे की शरीर की रचना पूरी होती है, उसी प्रकार इस संसार में मनुष्य के रहने का कारण भी यह है कि उसकी आत्मा की रचना पूरी हो और ईश्वर ने जो कुछ उसके लिए लिखा है उस चरण तक वह पहुंच जाए।

    इस आधार पर यह उचित नहीं है कि मनुष्य किसी अन्य के लिए ईश्वर से मृत्यु की मांग करे भले ही वह अन्य व्यक्ति पापी व नास्तिक हो या धर्म पर आस्था रखने वाला हो। चूंकि बुरे कर्म करने वाला और नास्तिक प्रायः इस संसार में पाप ही करता है इस लिए जितने भी दिन वह इस संसार में रहता है वह वास्तव में उसके पापों की गिनती की अवधि होती है ताकि उसको अपने किये का दंड मिल सके। दूसरी ओर योग्य व सुकर्मी व्यक्ति की इस संसार में आयु उसकी अच्छाईयों को गिने जाने की अवधि है ताकि उसे उसके अच्छे कर्मों का फल दिया जा सके।

    इस आयत से हम यह सीखते हैं कि जो लोग ईश्वर का इन्कार करते हें उनका एक दंड यह है कि उन पर दुष्ट लोगों व शैतान का नियंत्रण हो जाता है।

    शैतान मनुष्य को भड़काता है किंतु विवश नहीं करता यद्यपि उसका भड़काना अत्याधिक शक्तिशाली होता है।

    ईश्वर की शैली व परंपरा है कि वह लोगों को मोहलत दे और वह बुरे लोगों को उनकी बुराई के कारण मारने में जल्दी नहीं करता।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर ८५ से ८६ तक की तिलावत सुनें।

    يَوْمَ نَحْشُرُ الْمُتَّقِينَ إِلَى الرَّحْمَنِ وَفْدًا (85) وَنَسُوقُ الْمُجْرِمِينَ إِلَى جَهَنَّمَ وِرْدًا (86)

    जिस दिन भले कर्म वाले लोगों को हम ईश्वर के पास एकत्रित करेंगे (19:85) और अपराधियों को इस दशा में कि वह प्यासे होंगे नर्क की ओर खदेड़ देंगे।(19:86)

    इस आयत में लोगों को दो गुटों भले और अपराधियों में बांटा गया है और दोनों गुटों के अंजाम को संक्षेप में इस प्रकार से बताया गया है।

    भले लोग तो ईश्वर के अतिथि हैं इसी लिए उन्हें स्वर्ग में भेज दिया जाएगा किंतु अपराधियों की स्थिति दूसरी है। जिस प्रकार से प्यासे ऊंट जलाशय की ओर ले जाए जाते हैं, अपराधियों की उसी प्रकार से नर्क की ओर हांका जाएगा किंतु वहां पानी नहीं होगा केवल आग ही आग होगी।

    कुरआन में ईश्वर के पास का जो शब्द प्रयोग किया गया है वह वास्तव में नर्क की ओर हांके जाने के मुक़ाबले में है । इस प्रकार से यह समझा जा सकता है कि इस का उद्देश्य भले लोगों को स्वर्ग में भेजना है। भले लोगों को स्वर्ग में भेजने के लिए ईश्वर के पास के शब्द का इस लिए भी प्रयोग किया गया है क्योंकि स्वर्ग भी ईश्वर से निकटता के अर्थ में है और स्वर्ग में जाने का अर्थ ईश्वर के निकट होना है।

    इस आयत में अपराधियों को नर्क में ले जाने की दशा का वर्णन किया गया है ताकि यह बताया जा सके कि उनके नर्कवासी होने का कारण उनका पाप और अपराध है जैसा कि आयत में ईश्वर के पास जाने को भले लोगों से विशेष किया गया है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उनके स्वर्ग में जाने का कारण संसार में ईश्वर से भय और अच्छे कर्म हैं ।

    इस आयत से हम सीखते हैं कि क़यामत या प्रलय, भले और बुरे लोगों के सामने आने का दिन है। भले लोग ईश्वर के अतिथि हैं किंतु अपराधी व पापी तुच्छता व अपमान के साथ नर्क में डाल दिये जाएंगे।

    स्वर्ग में जाने से अधिक महत्वपूर्ण ईश्वरीय कृपा का पात्र बनना है जो वास्तव में स्वर्ग में रहने वालों से विशेष है।

    स्वर्ग की चाभी ईश्वर से डरना है और यह भय व डर जीवन के सभी क्षणों में महसूस किया जाना चाहिए।