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    सूरए मरयम, आयतें 87-92, (कार्यक्रम 542)

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    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर ८७ की तिलावत सुनें।

    لَا يَمْلِكُونَ الشَّفَاعَةَ إِلَّا مَنِ اتَّخَذَ عِنْدَ الرَّحْمَنِ عَهْدًا (87)

    उस दिन वे सिफारिश नहीं कर पाएगें सिवाए उन लोगों के जिनकी ईश्वर के निकट प्रतिबद्धता होगी।(19:87)

    पिछली आयतों में बताया गया था कि अनेकेश्वरवादी एक ओर तो अपनी धन-संपत्ति तथा संतानों पर इतराते थे और दूसरी ओर काल्पनिक देवताओं पर इतने अधिक निर्भर थे कि उन्हें आशा रहती थी कि यह देवता हर दशा में उनकी सहायता करें।

    इस आयत में कहा गया है कि प्रलय के दिन यह काल्पनिक देवता अनेकेश्वरवादियों को नर्क की आग से बचाने के लिए उनकी सिफ़ारिश नहीं कर पाएगें बल्कि ईश्वरीय दूतों और उनके उत्तराधिकारियों जैसे ईश्वर के प्रिय बन्दे ही अन्य लोगों की सिफ़ारिश का अधिकार रखते हैं क्योंकि उन्हें ईश्वर द्वारा इस प्रकार की सिफ़ारिश की अनुमति दी गयी है।

    मूल रूप से क़यामत के दिन सिफ़ारिश के कुछ अपने विशेष नियम हैं। न तो हर एक की सिफारिश होगी और न ही हर एक किसी दूसरे की सिफारिश कर पाएगा बल्कि धर्म व ईश्वर पर आस्था रखने वाले लोग जिनकी आस्था व कर्म सही होंगे किंतु उनसे कुछ पाप भी हो गये होंगे, ईश्वर के प्रिय दासों के सहारे क्षमा पा सकते हैं किंतु उन्हें ईश्वर द्वारा क्षमा किया जाना इस बात पर भी निर्भर होगा कि जो लोग उनकी सिफारिश कर रहे हैं उन्हें किस सीमा तक सिफारिश करने की अनुमति है।

    इस आधार पर संसार में, कोई व्यक्ति यह सोच कर कि क़यामत के दिन उसे सिफ़ारिश की सुविधा मिल जाएगी, पाप नहीं कर सकता क्योंकि यह किसी को पता ही नहीं है कि क़यामत के दिन किस की सिफारिश की जाएगी और अगर की जाएगी तो किस सीमा तक।

    इस आयत से हम ने यह सीखा कि सिफ़ारिश का अधिकार ईश्वर के पास है और वह जिसे बेहतर और योग्य समझता है उसे यह अधिकार एक सीमा तक दे देता है।

    ईश्वर के विशेष व प्रिय बन्दे ईश्वर की अनुमति से अन्य लोगों की सिफ़ारिश कर सकते हैं जो निश्चित रूप से दासों पर ईश्वर की असीम कृपा का ही एक प्रदर्शन है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर ८८ और ८९ की तिलावत सुनें।

    وَقَالُوا اتَّخَذَ الرَّحْمَنُ وَلَدًا (88) لَقَدْ جِئْتُمْ شَيْئًا إِدًّا (89)

    अनेकेश्वरवादियों ने कहा कि ईश्वर ने पुत्र ग्रहण किया है (19:88) सचमुच बड़ी बुरी बात कही है।(19:89)

    अनेकेश्वरवादियों का यह भी मानना है कि ईश्वर के पुत्र है जैसाकि अधिकांश अनेकेश्वरवादियों का विचार था कि फ़रिश्ते, ईश्वर की पुत्रियां हैं। विचित्र बात यह है कि इस्लाम से पूर्व के धर्मों में भी यह गलत विचार प्रचलित था और क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार यहूदी, ईश्वरीय दूत, हज़रत उज़ैर को ईश्वर का पुत्र समझते थे और ईसाई भी हज़रत ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र मानते हैं जो अतीत के धर्मों में पथभ्रष्टता का एक प्रमाण है।

    क़ुरआने मजीद कड़ाई के साथ इस विचारधारा का खंडन करता है और कहता है कि यह बहुत गलत और बुरा आरोप है जो वे ईश्वर पर लगाते हैं और बहुत बुरी बात है जो वे कहते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि किसी को भी ईश्वर का पुत्र बना देना वास्तव में ईश्वर के बारे में बहुत बुरी बात और उस पर लगाया जाने वाला बुरा आरोप है भले ही वह व्यक्ति जिसे ईश्वर का पुत्र कहा जा रहा हो, ईश्वर का सम्मानीय दूत ही क्यों न हो। क्योंकि रचयिता व रचना के मध्य संबंध, पिता व पुत्र का संबंध नहीं है।

    ईश्वर के लिए किसी भी प्रकार के पुत्र की बात मानना वास्तव में ईश्वर का किसी को भागीदार बनाना या अनेकेश्वरवाद में विश्वास रखना तथा एकेश्वरवाद के मार्ग से विचलित होना है।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर ९० से ९२ तक की तिलावत सुनें।

    تَكَادُ السَّمَاوَاتُ يَتَفَطَّرْنَ مِنْهُ وَتَنْشَقُّ الْأَرْضُ وَتَخِرُّ الْجِبَالُ هَدًّا (90) أَنْ دَعَوْا لِلرَّحْمَنِ وَلَدًا (91) وَمَا يَنْبَغِي لِلرَّحْمَنِ أَنْ يَتَّخِذَ وَلَدًا (92)

    बहुत संभव है कि इस बुरी बात से आकाश बिखर जाएं, धरती फट जाए और पर्वत ढेर हो जाएं (19:90) इस लिए कि उन्होंने ईश्वर के लिए पुत्र में विश्वास रखा (19:91) और ईश्वर को यह शोभा नहीं देता कि वह अपने लिए पुत्र ग्रहण करे।(19:92)

    चूंकि सृष्टि का आधार एकेश्वरवाद पर रखा गया है और ईश्वर के पुत्र होने का दावा, ऐसी ग़लत बात है जो किसी भी प्रकार से एकेश्वरवाद से मेल नहीं खाती इस लिए इस आयत में कहा गया है कि मानो धरती व आकाश इस प्रकार की विचारधारा के कारण फटने और गिरने के निकट पहुंच जाते हैं।

    दूसरे शब्दों में किसी को ईश्वर का भागीदार या सहयोगी बनाना इतना भारी पाप है कि धरती व आकाश भी उसका बोझ उठाने की क्षमता नहीं रखते किंतु तुम अनेकेश्वरवादी लोग इस प्रकार की ग़लत विचारधारा और सोच रखते हो और इस प्रकार की बुरी बात अपनी ज़बान पर लाते हो जबकि मूल रूप से ईश्वर के लिए पुत्र रखना बड़ाई की बात नहीं है बल्कि इससे तो ईश्वर में कमी और उसके स्थान के नीचे होने का आभास होता है क्योंकि इस प्रकार से महान ईश्वर की रचनाओं में से किसी एक को उसकी संतान समझा जाता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि कुछ पाप ऐसे भी होते हैं जिन्हें करने पर सृष्टि की पूरी व्यवस्था ही बिगड़ सकती है किंतु ईश्वर ऐसा होने नहीं देता जैसाकि कुछ अन्य आयतों के अनुसार यदि क़ुरआन पर्वत पर उतारा जाता तो वह ईश्वर के भय से कणों में टूटकर बिखर जाता।

    अनेकेश्वरवाद, सृष्टि में सब से अधिक भयानक पथभ्रष्टता है इसी लिए प्राणहीन प्रकृति भी उस पर प्रतिक्रिया प्रकट करती है।

    पुत्र ग्रहण करने के लिए पत्नी ग्रहण करना भी आवश्यक है किंतु कोई भी ईश्वर की भांति नहीं है जो उसका जीवनसाथी बन सके और उसके लिए बच्चे को जन्म दे।