islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए मरयम, आयतें 93-98, (कार्यक्रम 543)

    सूरए मरयम, आयतें 93-98, (कार्यक्रम 543)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए मरयम की आयत नंबर 93 की तिलावत सुनें।

    إِنْ كُلُّ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ إِلَّا آَتِي الرَّحْمَنِ عَبْدًا (93)

    आकाशों और धरती में ऐसा कोई भी नहीं है जो दयावान (ईश्वर) के समक्ष दास के रूप में आने वाला न हो।(19:93)

    इससे पहले बताया गया था कि अनेकेश्वरवादी, फ़रिश्तों और अपने कुछ देवताओं को ईश्वर की संतान समझते थे और क़ुरआने मजीद ने उनकी इस अनुचित एवं निराधार आस्था को कड़ाई से रद्द किया। ये आयतें कहती हैं कि न केवल तुम धरती के मनुष्य बल्कि आकाश के फ़रिश्तों सहित सबके सब उसके बंदे और दास हो और इसी रूप में प्रलय में उसके समक्ष उपस्थित होगे। सृष्टि की सभी रचनाओं से ईश्वर का संबंध, पिता व संतान का या कोई भी अन्य संबंध नहीं अपितु स्वामी और दास का संबंध है।

    इसके अतिरिक्त आकाशों और धरती में इतने अधिक आज्ञापालक दासों की उपस्थिति के बावजूद ईश्वर को तुम्हारी उपासना और बंदगी की आवश्यकता नहीं है बल्कि तुमको ही अपने स्वामी की आवश्यकता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि फ़रिश्तों और मनुष्यों सहित पूरी सृष्टि पर ईश्वर का स्वामित्व है और कोई भी अपने जीवन व मृत्यु तक का स्वामी नहीं है।

    संपूर्ण सृष्टि, ईश्वर के अधिकार में और उसके आदेश के अधीन है तथा उसी की ओर वापस लौटेगी। ऐसा नहीं है कि सृष्टि का अंत अज्ञात व अस्पष्ट हो।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 94 और 95 की तिलावत सुनें।

    لَقَدْ أَحْصَاهُمْ وَعَدَّهُمْ عَدًّا (94) وَكُلُّهُمْ آَتِيهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَرْدًا (95)

    ईश्वर उन सभी की संख्या जानता है और उसने उन्हें भली भांति एक एक करके गिना है।(19:94) और प्रलय के दिन वे सब उसके समक्ष अकेले ही उपस्थित होंगे।(19:95)

    ये आयतें सृष्टि की सभी वस्तुओं के बारे में ईश्वर के संपूर्ण ज्ञान और उनमें से प्रत्येक की विशेषताओं से उसके अवगत होने की सूचना देती हैं और बताती हैं कि सृष्टि की कोई भी बात उससे छिपी हुई नहीं है।

    प्रलय में भी हर व्यक्ति अकेले ही ईश्वर के न्यायालय में उपस्थित होगा और अपने कर्मों का उत्तर देगा। किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि वह प्रलय में उपस्थित असंख्य लोगों की भीड़ में छिप कर ईश्वर के शासन क्षेत्र से निकल भागेगा। इसके अतिरिक्त प्रलय में हर व्यक्ति अकेले और ख़ाली हाथ ही पहुंचेगा तथा कोई भी व्यक्ति या कोई भी वस्तु उसके साथ नहीं होगी। उसके साथ न तो उसकी संतान और जीवन साथी होगा और न ही धन व सत्ता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर सृष्टि में उपस्थित हर वस्तु के बारे में संपूर्ण जानकारी रखता है।

    प्रलय में मनुष्य पूर्ण रूप से अकेला होगा। वहां हर व्यक्ति दूसरों के बारे में नहीं बल्कि केवल अपने कर्मों की चिंता करेगा।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 96 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَيَجْعَلُ لَهُمُ الرَّحْمَنُ وُدًّا (96)

    निश्चित रूप से जो लोग (ईश्वर पर) ईमान लाए और अच्छे कर्म करते रहे, शीघ्र ही दयावान (ईश्वर अन्य लोगों के हृदय में) उनके प्रति एक प्रकार का प्रेम डाल देगा।(19:96)

    पिछली आयतों में बताया गया था कि ईश्वर ने कहा है कि अनेकेश्वरवादियों के देवता तक उनसे विरक्त हो जाएंगे और प्रलय में उनकी सहायता के स्थान पर उनके मुक़ाबले में खड़े हो जाएंगे। यह आयत कहती है कि ईश्वर की उपासना और दासता तथा उसके आदेशों का पालन करते हुए अच्छे कर्म करने से न केवल मनुष्य, ईश्वर का प्रिय बनता है और उसे ईश्वर का समर्थन प्राप्त होता है बल्कि ईश्वर की इच्छा से सदकर्म करने वालों का प्रेम अन्य लोगों के हृदय में भी घर कर जाता है।

    यहां तक कि शत्रु भी अपने दिल में अच्छे लोगों को पसंद करते हैं चाहे अपने हितों की रक्षा के लिए व्यवहारिक रूप से वे उनसे शत्रुता करते हैं। इतिहास में इस बात के असंख्य उदाहरण हैं। अनेक हदीसों में कहा गया है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम उन लोगों में से एक हैं जिनके बारे में ईश्वर ने यह आयत भेजी है। इतिहास में वर्णित है कि उनके शत्रु भी उनके न्याय व सदकर्मों की गवाही देते थे। उनकी प्रशंसा में उनके अनेक शत्रुओं के कथन वर्णित हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईमान व भला कर्म लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करता है क्योंकि पवित्रता, सच्चाई, साहस, बलिदान व क्षमा को सभी पसंद करते हैं। बुरे लोग भी इन विशेषताओं और इनसे सुशोभित लोगों की प्रशंसा करते हैं।

    आइये अब सूरए मरयम की आयत नंबर 97 और 98 की तिलावत सुनें।

    فَإِنَّمَا يَسَّرْنَاهُ بِلِسَانِكَ لِتُبَشِّرَ بِهِ الْمُتَّقِينَ وَتُنْذِرَ بِهِ قَوْمًا لُدًّا (97) وَكَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُمْ مِنْ قَرْنٍ هَلْ تُحِسُّ مِنْهُمْ مِنْ أَحَدٍ أَوْ تَسْمَعُ لَهُمْ رِكْزًا (98)

    तो (हे पैग़म्बर!) निश्चित रूप से हमने इस (क़ुरआन) को आपकी ज़बान के माध्यम से सरल बना दिया है ताकि आप इसके द्वारा ईश्वर से डरने वालों को शुभ सूचना दें तथा झगड़ालू लोगों को (ईश्वरीय दंड से) डरा सकें।(19:97) और हमने इनसे पहले वाले कितने ही वंशों को तबाह कर दिया। क्या आप उनमें से किसी को देख रहे हैं या उनकी हल्की सी आवाज़ भी सुन रहे हैं? (19:98)

    ये आयतें जो सूरए मरयम की अंतिम आयतें हैं, मनुष्य के मार्गदर्शन और उसके कल्याण में क़ुरआने मजीद के स्थान की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि ईश्वर ने अत्यंत उच्च व जटिल विषयों का सरल भाषा में वर्णन किया है ताकि सभी लोग उनसे लाभान्वित हो सकें और पवित्र व सदकर्मी लोगों का प्रोत्साहन हो तथा दुष्ट व अपवित्र लोग जान लें कि ईश्वरीय दंड निश्चित है। साथ ही वे पिछली जातियों के अंत से पाठ सीख सकें।

    वे यह न सोचें कि वे ईश्वर को अपने समक्ष विवश कर सकते हैं और अपनी शत्रुता से सत्य को मिटा सकते हैं। यदि वे अपने ही इतिहास पर दृष्टि डालें तो वे ऐसी अनेक जातियों को देख सकते हैं जिनका नाम और निशान तक बाक़ी नहीं बचा है और उनकी आहट तक सुनाई नहीं देती।

    इन आयतों से हमने सीखा कि लोगों के मार्गदर्शन तथा उपदेश का मार्ग यह है कि उन्हें सरल भाषा में धार्मिक शिक्षाओं से अवगत कराया जाए।

    हर गुट के साथ उसी की भाषा में बात करनी चाहिए, ईमान वालों के साथ प्रोत्साहन और शुभ सूचना की शैली में और शत्रुओं के साथ डराने और धमकी देने की भाषा में।