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    सूरए माएदा; आयतें 1-2 (कार्यक्रम 161)

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    अब तक हमने क़ुरआने मजीद के सूरए हम्द, सूरए बक़रह, सूरए आले इमरान और सूरए निसा की आयतों की व्याख्या की। सूरए माएदा क़ुरआने मजीद का पांचवां सूरा है जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की आयु के अन्तिम दिनों में उतरा है। इस सूरे की 114वीं आयत में हज़रत ईसा मसीह की दुआ में प्रयोग होने वाले शब्द माएदतम मिनस्समाए के कारण ही इस सूरे का नाम माएदा रखा गया है। माएदा का अर्थ होता है दस्तरख़ान। आइए अब सूरए माएदा की पहली आयत की तिलावत सुनते हैं।

    بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِيَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا أَوْفُوا بِالْعُقُودِ أُحِلَّتْ لَكُمْ بَهِيمَةُ الْأَنْعَامِ إِلَّا مَا يُتْلَى عَلَيْكُمْ غَيْرَ مُحِلِّي الصَّيْدِ وَأَنْتُمْ حُرُمٌ إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ مَا يُرِيدُ

    ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। हे ईमान वालो! अपने वादों और मामलों पर कटिबद्ध रहो, यद्यपि तुम्हारे लिए सभी चौपाए हलाल या वैध कर दिये गए हैं सिवाए उनके जिनका तुम्हारे लिए वर्णन किया जाएगा, परन्तु जब तुम एहराम की स्थिति में हो तो शिकार को वैध न समझ लेना, निःसन्देह ईश्वर जो चाहता है आदेश देता है। (5:1)चूंकि यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की हज यात्रा से पूर्व उतरी है अतः इसमें मुसलमानों को हज के कुछ आदेश बताए गए हैं। इस आयत में हज के विशेष वस्त्र में शिकार को अवैध घोषित करने के आदेश की ओर संकेत किया गया है, परन्तु इस आयत के आरंभ में जो मुख्य व महत्वपूर्ण बात है कि जो वस्तुतः इस सूरे के आरंभ में भी आई है, वह वादों का पालन है और चूंकि यह शब्द बहुवचन के रूप में आया है, इसलिए इसमें सभी प्रकार के वादे और वचन शामिल हैं। चाहे शाब्दिक वादा हो या लिखित समझौता, कमज़ोर व्यक्ति से हो या बलवान से, मित्र से हो या शत्रु से, चाहे ईश्वर के साथ धार्मिक प्रतिज्ञा हो या लोगों के साथ आर्थिक मामला, चाहे पारिवारिक वचन हो या फिर सामाजिक वादा। अन्य धार्मिक आदेशों के अनुसार अनेकेश्वरवादियों और खुल्लम-खुल्ला पाप करने वालों से किये गए समझौतों का पालन भी आवश्यक है, सिवाए इसके कि वे समझौतों का उल्लंघन कर दें कि ऐसी स्थिति में समझौते का पालन आवश्यक नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि मुसलमान को अपने सभी वादों और समझौतों का पालन करना चाहिए। यह ईश्वर पर ईमान की शर्त है।मक्के में और हज के दिनों में न केवल हाजी बल्कि पशु भी ईश्वर की रक्षा और अमान में होते हैं और उनका शिकार अवैध है।आइए अब सूरए माएदा की दूसरी आयत की तिलावत सुनते हैं।

    يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تُحِلُّوا شَعَائِرَ اللَّهِ وَلَا الشَّهْرَ الْحَرَامَ وَلَا الْهَدْيَ وَلَا الْقَلَائِدَ وَلَا آَمِّينَ الْبَيْتَ الْحَرَامَ يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِنْ رَبِّهِمْ وَرِضْوَانًا وَإِذَا حَلَلْتُمْ فَاصْطَادُوا وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآَنُ قَوْمٍ أَنْ صَدُّوكُمْ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ أَنْ تَعْتَدُوا وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَى وَلَا تَعَاوَنُوا عَلَى الْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ

    हे ईमान वालो! ईश्वर की निशानियों, हराम महीनों, क़ुरबानी के जानवरों, जिन जानवरों के गले में (निशानी के रूप में) पट्टे बांध दिये गए हैं, ईश्वर का अनुग्रह और प्रसन्नता प्राप्त करने के उद्देश्य से ईश्वर के घर अर्थात काबे की ओर जाने वालों का अनादर न करो और जब तुम एहराम (की स्थिति) से बाहर आ जाओ तो शिकार कर सकते हो। (हे ईमान वालों) ऐसा न हो कि एक गुट की शत्रुता, केवल इस बात पर कि उसने तुम्हें मक्के में जाने से रोक दिया है, तुम्हें अत्याचार करने पर उकसा दे। (हे ईमान वालो!) भले कर्मों और ईश्वर से भय में एक दूसरे से सहयोग करो और कदापि पाप तथा अत्याचार में दूसरों से सहयोग न करो और ईश्वर से डरते रहो, निःसन्देह, ईश्वर अत्यंत कड़ा दण्ड देने वाला है। (5:2)पिछली आयत में हज के कुछ आदेशों के वर्णन के पश्चात यह आयत कहती है कि जो बात और वस्तु हज से संबंधित है उसका विशेष सम्मान है और उसके सम्मान की रक्षा करनी चाहिए। क़ुरबानी के जानवर, पवित्र स्थल, हज का समय जो युद्ध के लिए वर्णित महीनों में से है, और स्वयं हाजी जो ईश्वर की प्रसन्नता के लिए हज करने आता है, यह सब के सब सम्मानीय हैं और इनका आदर करना चाहिए।आगे चलकर आयत छठी शताब्दी हिजरी की एक ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत करती है जब मुसलमान पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम के साथ हज करने के लिए मदीने से मक्के आए थे परन्तु अनेकेश्वरवादियों ने उन्हें मक्के में प्रवेश नहीं करने दिया। दोनों पक्षों ने युद्ध से बचने के लिए “हुदैबिया” नामक स्थान पर एक संधि पर हस्ताक्षर किये, परन्तु मक्के पर विजय के पश्चात कुछ मुसलमानों ने प्रतिशोध लेने का प्रयास किया। उन्हें इस काम से रोकते हुए आयत कहती है कि प्रतिशोध लेने और अत्याचार करने के बजाए एक दूसरे से सहयोग करके उन्हें भी ईश्वर की ओर बुलाने तथा भले कर्म का निमंत्रण देने का प्रयास करो तथा समाज में भलाई के विकास का मार्ग प्रशस्त करो, न यह कि उनपर अतिक्रमण और अत्याचार के लिए एकजुट हो जाओ और पुरानी शत्रुताओं तथा द्वेषों को फिर से जीवित करो।यद्यपि सहयोग का विषय इस आयत में हज के संबंध में आया है परन्तु यह केवल हज से ही विशेष नहीं है। सहयोग, इस्लाम के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है जिसमें सभी प्रकार के मामले शामिल हैं जैसे समाजिक, पारिवारिक और राजनैतिक। इस सिद्धांत के आधार पर मुस्लिम समुदाय के बीच सहयोग का आधार केवल भले कर्म हैं न कि अत्याचार, पाप और अतिक्रमण। यह अधिकांश समाजों के संस्कारों के विपरीत हैं जिनके अन्तर्गत अपने भाई, मित्र और देशवासी का समर्थन करना चाहिए। चाहे वह अत्याचारी हो या अत्याचारग्रस्त।इस आयत से हमने सीखा कि जिस चीज़ में भी ईश्वरीय रंग आ जाए वह पवित्र व पावन हो जाती है और उसका सम्मान करना चाहिए, चाहे वह क़ुरबानी का जानवर ही क्यों न हो।किसी समय में दूसरों की शत्रुता, किसी दूसरे समय में हमारे अत्याचार और अतिक्रमण का औचित्य नहीं बनती।सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के संबंध में निर्णय लेने का आधार न्याय, भलाई और पवित्रता होना चाहिए न कि जाति, मूल और भाषा का समर्थन।