islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए माएदा; आयतें 12-14 (कार्यक्रम 165)

    सूरए माएदा; आयतें 12-14 (कार्यक्रम 165)

    Rate this post

    आइए पहले सूरए माएदा की 12वीं आयत की तिलावत सुनते हैं। وَلَقَدْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ بَنِي إِسْرَائِيلَ وَبَعَثْنَا مِنْهُمُ اثْنَيْ عَشَرَ نَقِيبًا وَقَالَ اللَّهُ إِنِّي مَعَكُمْ لَئِنْ أَقَمْتُمُ الصَّلَاةَ وَآَتَيْتُمُ الزَّكَاةَ وَآَمَنْتُمْ بِرُسُلِي وَعَزَّرْتُمُوهُمْ وَأَقْرَضْتُمُ اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا لَأُكَفِّرَنَّ عَنْكُمْ سَيِّئَاتِكُمْ وَلَأُدْخِلَنَّكُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ فَمَنْ كَفَرَ بَعْدَ ذَلِكَ مِنْكُمْ فَقَدْ ضَلَّ سَوَاءَ السَّبِيلِ (12)निसन्देह, ईश्वर ने बनी इस्राईल से पक्का वादा लिया था और हमने उनमें से बारह लोगों को सरदार तथा अभिभावक के रूप में भेजा। ईश्वर ने उनसे कहा कि निसन्देह, मैं तुम्हारे साथ हूं यदि तुमने नमाज़ क़ाएम की, ज़कात देते रहे, मेरे पैग़म्बरों पर ईमान लाए, उनकी सहायता की और ईश्वर को भला ऋण दिया तो मैं तुम्हारे पापों को छिपा लूंगा और तुम्हें ऐसे बाग़ों में प्रविष्ट करूंगा जिसके पेड़ों के नीचे से नहरें बह रही होंगी। फिर इसके बाद तुममें से जो कोई कुफ़्र अपनाए तो वह वास्तव में सीधे मार्ग से भटक गया है। (5:12)यह आयत और इसके बाद की आयतें उन वचनों की ओर संकेत करते हुए जो ईश्वर ने अपने पैग़म्बरों के माध्यम से पिछली जातियों से लिए हैं, कहती हैं कि ईश्वर ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अतिरिक्त, जो बनी इस्राईल के पैग़म्बर थे, इस जाति के बारह क़बीलों के लिए बारह लोगों को नेता और अभिभावक निर्धारित किया ताकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के माध्यम से उन्हें जो ईश्वरीय आदेश प्राप्त हो, उन्हें अपने क़बीलों तक पहुंचाएं। उन वचनों में से एक यह था कि बनी इस्राईल के शत्रुओं के मुक़ाबले में उन्हें ईश्वरीय समर्थन तभी प्राप्त होगा जब वे धार्मिक आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करेंगे और उन पर कटिबद्ध रहेंगे।ईश्वर की सहायता और समर्थन उसी को प्राप्त होता है जो ईश्वर और पैग़म्बर पर ईमान भी रखता हो और धार्मिक आदेशों का पालन भी करता हो। इस प्रकार के लोग संसार में ही ईश्वरीय कृपा के पात्र बनते हैं और प्रलय में भी स्वर्ग की महान अनुकंपाओं से लाभान्वित होंगे।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के कुछ कथनों के अनुसार उनके उत्तराधिकारियों की संख्या भी बनी इस्राईल के सरदारों की संख्या के बराबर अर्थात बारह है, जिनमें सबसे पहले हज़रत अली अलैहिस्सलाम और अन्तिम इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम हैं।इस आयत से हमने सीखा कि केवल ईमान ही पर्याप्त नहीं है बल्कि भला कर्म भी आवश्यक है। इसी प्रकार पैग़म्बरों पर केवल ईमान लाना ही काफ़ी नहीं है बल्कि उनकी व उनके धर्म की सहायता भी आवश्यक है।ईश्वर के बंदों पर किसी भी प्रकार का उपकार, ईश्वर के साथ लेन-देन के समान है अतः ग़रीबों पर उपकार नहीं जताना चाहिए बल्कि बड़े ही अच्छे व्यवहार द्वारा उनकी आवश्यकता की पूर्ति करनी चाहिए।आइए अब सूरए माएदा की 13वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।فَبِمَا نَقْضِهِمْ مِيثَاقَهُمْ لَعَنَّاهُمْ وَجَعَلْنَا قُلُوبَهُمْ قَاسِيَةً يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ عَنْ مَوَاضِعِهِ وَنَسُوا حَظًّا مِمَّا ذُكِّرُوا بِهِ وَلَا تَزَالُ تَطَّلِعُ عَلَى خَائِنَةٍ مِنْهُمْ إِلَّا قَلِيلًا مِنْهُمْ فَاعْفُ عَنْهُمْ وَاصْفَحْ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ (13)फिर उनके द्वारा वचन तोड़ने के कारण हमने उन्हें अपनी दया से दूर करके उन पर लानत अर्थात धिक्कार की और उनके हृदयों को कठोर बना दिया। वे ईश्वरीय शब्दों को उनके स्थान से हटा देते हैं और उन्होंने हमारी नसीहतों का अधिकांश भाग भुला दिया है। और तुम उनके षड्यंत्रों और विश्वासघात से निरंतर अवगत होते रहोगे सिवाए कुछ लोगों के (जो विश्वासघाती और कठोर दिल नहीं हैं) तो हे पैग़म्बर! उन्हें क्षमा कर दो और उनकी ग़लतियों को माफ़ कर दो कि निसन्देह, ईश्वर भले कर्म करने वालों को पसंद करता है। (5:13)पिछली आयत में ईश्वरीय वचनों का उल्लेख करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि यहूदियों ने इन वचनों को तोड़ा और वे ईश्वरीय दया से दूर हो गए तथा परिणाम स्वरूप उनके हृदय सत्य स्वीकार करने से इन्कार करने लगे और धीरे-धीरे वे कठोर होते चले गए क्योंकि उन्होंने न केवल यह कि वचन तोड़ा बल्कि अपने ग़लत कार्यों का औचित्य दर्शाने के लिए ईश्वर की किताब में भी फेर-बदल कर दिया। यहां तक कि उसके कुछ भागों को काट कर उन्हें भुला दिया।अंत में यह आयत कहती है कि न केवल हज़रत मूसा के काल में यहूदी ऐसे थे बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल में भी मदीना नगर के यहूदी भी सदैव ही ईमान वालों के विरुद्ध षड्यंत्र रचने और विश्वासघात करने का प्रयास करते रहते थे। उन्होंने अपनी यह पद्धति नहीं छोड़ी। इस आयत से हमने सीखा कि पवित्र तथा साफ़ हृदयों में ही ईश्वरीय कथन को स्वीकार करने की योग्यता पाई जाती है, दूषित हृदय न केवल सत्य को स्वीकार नहीं करते बल्कि ईश्वरीय कथनों में फेर-बदल का प्रयास करते रहते हैं।ऐतिहासिक दृष्टि से बनी इस्राईल का समुदाय वचन तोड़ने वाला और विश्वासघाती समुदाय है।दूसरों के प्रति सबसे अच्छी भलाई, उनकी ग़लतियों को क्षमा करना है। आइए अब सूरए माएदा की 14वीं आयत सुनते हैं।وَمِنَ الَّذِينَ قَالُوا إِنَّا نَصَارَى أَخَذْنَا مِيثَاقَهُمْ فَنَسُوا حَظًّا مِمَّا ذُكِّرُوا بِهِ فَأَغْرَيْنَا بَيْنَهُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَاءَ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ وَسَوْفَ يُنَبِّئُهُمُ اللَّهُ بِمَا كَانُوا يَصْنَعُونَ (14)और इसी प्रकार हमने उनसे भी वचन लिया जिन्होंने स्वयं को (हज़रत ईसा का अनुयायी बताया) परन्तु उन्होंने भी (बनी इस्राईल की भांति वचन तोड़ दिया और उन्हीं की भांति ईश्वरीय किताब के) कुछ भागों को भुला दिया जिसका उन्हें स्मरण कराया गया था तो हमने भी प्रलय तक के लिए उनके बीच शत्रुता और द्वेष उत्पन्न कर दिया और ईश्वर शीघ्र ही उन्हें, उससे अवगत करवा देगा जो वे करते रहे हैं। (5:14)पिछली आयतों में यहूदियों द्वारा ईश्वरीय वचनों के उल्लंघन की ओर संकेत करने के पश्चात, ईश्वर इस आयत में ईसाइयों द्वारा ईश्वरीय वचन तोड़े जाने की ओर संकेत करते हुए कहता है कि हमने उन लोगों से भी जो, स्वयं हज़रत ईसा मसीह का अनुयायी और समर्थक बताते थे, वचन लिया कि वे ईश्वरीय धर्म की सहायता पर कटिबद्ध रहेंगे परन्तु उन्होंने भी वचन तोड़ दिया और बनी इस्राईल के ही मार्ग पर चल पड़े तथा उन्होंने पवित्र ईश्वरीय किताब में परिवर्तन किया और कुछ भागों को काट दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनके बीच एक प्रकार का द्वेष और शत्रुता उत्पन्न हो गई जो प्रलय तक जारी रहेगी।ईसाई धर्म में परिवर्तन और हेर-फेर का सबसे स्पष्ट उदाहरण, तीन ईश्वरों पर आस्था रखना है जिसने एकेश्वरवाद का स्थान ले लिया है।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान का दावा करने वाले तो बहुत हैं पर धर्म के वास्तविक अनुयायी बहुत की कम हैं।धार्मिक समाजों में मतभेद और विवाद का कारण, ईश्वर को भुला देना है। समाज की एकता वास्तविक एकेश्वरवाद पर निर्भर है।अन्य धर्मों के अनुयाइयों द्वारा वचन तोड़ने के परिणामों से पाठ सीखना चाहिए और धार्मिक आदेशों के पालन के प्रति सदा कटिबद्ध रहना चाहिए।