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    सूरए माएदा; आयतें 15-17 (कार्यक्रम 166)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 15वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَهْلَ الْكِتَابِ قَدْ جَاءَكُمْ رَسُولُنَا يُبَيِّنُ لَكُمْ كَثِيرًا مِمَّا كُنْتُمْ تُخْفُونَ مِنَ الْكِتَابِ وَيَعْفُو عَنْ كَثِيرٍ قَدْ جَاءَكُمْ مِنَ اللَّهِ نُورٌ وَكِتَابٌ مُبِينٌ (15)हे आसमानी किताब वालो! निसंन्देह, हमारा पैग़म्बर तुम्हारी ओर आया ताकि आसमानी किताब की उन अनेक वास्तविकताओं का तुम्हारे लिए उल्लेख करे जिन्हें तुम छिपाते थे और वह अनेक बातों को क्षमा भी कर देता है। निसन्देह ईश्वर की ओर से तुम्हारे लिए नूर अर्थात प्रकाश और स्पष्ट करने वाली किताब आ चुकी है। (5:15)पिछले कार्यक्रम में उन आयतों की व्याख्या की गई थी जिनमें यहूदियों और ईसाइयों के विद्वानों को संबोधित करते हुए कहा गया था कि तुम पवित्र ईश्वरीय किताब में क्यों हेर-फेर करते हो? या उसकी बातों को छिपाते हो? क्या तुम ईश्वरीय वचन को भूल गए हो?यह आयत भी उन्हीं को संबोधित करते हुए कहती है कि तुम जो स्वयं आसमानी किताब वाले हो और ईश्वरीय निशानियों को पहचानते हो, क्यों नहीं पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान लाते कि उनका अस्तित्व प्रकाश की भांति और उनकी किताब वास्तविकताओं को स्पष्ट करने वाली है, वही वास्तविकताएं जिन्हें तुमने पिछली आसमानी किताबों से छिपा रखा है और स्पष्ट नहीं होने देते।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम सार्वभौमिक और सर्वकालीन धर्म है और पिछले सभी धर्मों के अनुयाइयों को अपनी अनंत किताब क़ुरआन की ओर आमंत्रित करता है।ईश्वरीय शिक्षाएं प्रकाश हैं और संसार उसके बिना अंधकारमय है। आइए अब सूरए माएदा की 16वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَهْدِي بِهِ اللَّهُ مَنِ اتَّبَعَ رِضْوَانَهُ سُبُلَ السَّلَامِ وَيُخْرِجُهُمْ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ بِإِذْنِهِ وَيَهْدِيهِمْ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (16)ईश्वर इस (प्रकाश और स्पष्ट करने वाली किताब) के माध्यम से, उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने का प्रयास करने वालों को शांतिपूर्ण एवं सुरक्षित मार्गों की ओर ले जाता है और अपनी कृपा से उन्हें अंधकार से प्रकाश में लाता है और सीधे रास्ते की ओर उनका मार्गदर्शन करता है। (5:16)पिछली आयत में क़ुरआने मजीद को वास्तविकताएं स्पष्ट करने वाली किताब बताने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि मार्गदर्शन स्वीकार करने की कुछ शर्तें हैं। इन शर्तों में सबसे महत्तवपूर्ण सत्य की खोज करना और उसे मानना है। क़ुरआने मजीद का मार्गदर्शन वही स्वीकार करेगा जो सांसारिक धन-दौलत और पद की प्राप्ति तथा आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रयासरत न हो बल्कि केवल सत्य का अनुसरण और ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करना चाहता हो।यह शर्त यदि व्यवहारिक हो जाए तो फिर ईश्वर उसे पाप और पथभ्रष्टता के अंधकारों से निकालकर ईमान और शिष्ट कर्मों के प्रकाशमयी रास्ते की ओर उसका मार्गदर्शन करेगा। स्वभाविक है कि यह मार्गदर्शन हर ख़तरे में मनुष्य और उसके परिवार की आत्मा व विचारों की रक्षा करता है और प्रलय में भी मनुष्य को ईश्वर के शांतिपूर्ण स्वर्ग में सुरक्षित ले जाएगा।इस आयत से हमने सीखा कि शांति एवं सुरक्षा तक पहुंचना ईश्वरीय मार्ग के अनुसरण पर निर्भर है और क़ुरआन इस मार्ग पर पहुंचने तथा अंतिम गंतव्य तक जाने का माध्यम है।मनुष्य केवल आसमानी धर्मों की छत्रछाया में ही एक दूसरे के साथ शांतिपूर्ण ढंग और प्रेम के साथ रह सकता है।मनुष्य को ईश्वर तक पहुंचाने वाले कार्य विभिन्न हैं। भला कर्म हर काल में सभी लोगों के लिए अलग-अलग हो सकता है परन्तु लक्ष्य यदि ईश्वर की प्रसन्नता की प्राप्ति हो तो सब एक ही मार्ग पर जाकर मिलते हैं और वह सेराते मुस्तक़ीम का सीधा मार्ग है।आइए अब सूरए माएदा की 17वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।لَقَدْ كَفَرَ الَّذِينَ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ هُوَ الْمَسِيحُ ابْنُ مَرْيَمَ قُلْ فَمَنْ يَمْلِكُ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا إِنْ أَرَادَ أَنْ يُهْلِكَ الْمَسِيحَ ابْنَ مَرْيَمَ وَأُمَّهُ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا يخْلُقُ مَا يَشَاءُ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (17)निसन्देह वे लोग काफ़िर हो गए जिन्होंने कहा कि मरयम के पुत्र (ईसा) मसीह ही ईश्वर हैं। (हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि यदि ईश्वर, मरयम के पुत्र मसीह, उनकी माता और जो कोई धरती पर है उसकी मृत्यु का इरादा कर ले तो कौन उन्हें ईश्वरीय इरादे से बचाने वाला है? और (जान लो कि) आकाशों, धरती और जो कुछ इन दोनों के बीच है सब पर ईश्वर ही का शासन है। वह जिसे चाहता है पैदा करता है और ईश्वर हर बात की क्षमता रखने वाला है। (5:17)पिछली आयत में सभी आसमानी किताब वालों को इस्लाम का निमंत्रण देने के पश्चात यह आयत कहती है कि ईसाई, ईसा मसीह अलैहिस्सलाम को ईश्वर क्यों मानते हैं और क्यों उन्हें ईश्वर का समकक्ष ठहराते हैं? क्या ईसा मसीह ने हज़रत मरयम की कोख से जन्म नहीं लिया? तो फिर वे किस प्रकार ईश्वर हो सकते हैं? क्या उनकी माता हज़रत मरयम ने अन्य लोगों की भांति जन्म नहीं लिया? तो फिर किस प्रकार उन्हें भी एक ईश्वर माना जाता है? क्या ईश्वर हज़रत ईसा मसीह और उनकी माता हज़रत मरयम को मृत्यु देने में सकक्षम नहीं है? तो फिर यह दोनों कैसे ईश्वर हैं जिन्हें मृत्यु आ सकती है?यदि गंभीरता के साथ इस प्रकार की आस्था की समीक्षा की जाए तो यह पता चलेगा कि यह एक प्रकार से ईश्वर का इन्कार है क्योंकि ईश्वर के स्तर पर किसी भी मनुष्य को ले आना वास्तव में ईश्वर के स्थान को एक मनुष्य की सीमा तक नीचे लाने के समान है।यह आयत अंत में कहती है कि ईश्वर होने के लिए संपूर्ण व असीमित ज्ञान, शक्ति और सत्ता का होना आवश्यक है। हज़रत ईसा मसीह और उनकी माता में यह बातें नहीं थीं। रचयिता केवल ईश्वर ही है जो हर वस्तु का स्वामी है तथा हर प्रकार की बात में सक्षम है। ईश्वर होने के योग्य केवल वही है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम का एक लक्ष्य पिछले आसमानी धर्मों में पाई जाने वाली अनुचित एवं ग़लत आस्थाओं से मुक़ाबला करना है।ईश्वरीय पैग़म्बर हर हाल में मनुष्य ही है, उसका स्थान चाहे कितना ही उच्च क्यों न हो। पैग़म्बर के बारे में अतिश्योक्ति, धर्मों की एकेश्वरवादी आत्मा से मेल नहीं खाती।ईसा मसीह यदि ईश्वर हैं तो उनके शत्रु और विरोधी उन्हें सूली पर चढ़ाने में कैसे सफल हो गए? क्या बंदे ईश्वर पर आक्रमण कर सकते हैं?