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    सूरए माएदा; आयतें 18-22 (कार्यक्रम 167)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 18वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَتِ الْيَهُودُ وَالنَّصَارَى نَحْنُ أَبْنَاءُ اللَّهِ وَأَحِبَّاؤُهُ قُلْ فَلِمَ يُعَذِّبُكُمْ بِذُنُوبِكُمْ بَلْ أَنْتُمْ بَشَرٌ مِمَّنْ خَلَقَ يَغْفِرُ لِمَنْ يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَنْ يَشَاءُ وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَإِلَيْهِ الْمَصِيرُ (18)और यहूदियों तथा इसाइयों ने कहा कि हम ईश्वर के पुत्र और उसके मित्र हैं। (हे पैग़म्बर उनसे) कह दो कि फिर ईश्वर तुम्हारे पापों के कारण तुम्हें क्यों दण्डित करता है? तुम भी ईश्वर द्वारा पैदा किये गए अन्य लोगों की भांति ही मनुष्य हो। यह ईश्वर है जो, जिसको चाहता है क्षमा कर देता है और जिसको चाहता है दण्डित कर करता है। और आकाशों और धरती तथा जो कुछ इन दोनों के बीच है सब पर ईश्वर का प्रभुत्व है और सभी को उसी की ओर लौटना है। (5:18)पिछली आयतों में हमने पढ़ा कि ईसाई, हज़रत ईसा मसीह को मनुष्य के स्तर से बढ़ाकर ईश्वर मानते हैं। यह आयत कहती है कि ईसाई न केवल अपने पैग़म्बर को अन्य पैग़म्बरों से उच्च मानते थे बल्कि वे स्वयं को भी अन्य धर्मों के अनुयाइयों से बेहतर और श्रेष्ठ समझते थे। उनका विचार था कि वे ईश्वर के पुत्रों और मित्रों की भांति हैं जिन्हें कोई दण्ड नहीं दिया जाएगा।रोचक बात यह है कि यहूदी भी ऐसी ही ग़लत धारणा रखते हैं और वे केवल स्वयं को मुक्ति और मोक्ष का पात्र समझते हैं। उनकी इस ग़लत धारणा के उत्तर में क़ुरआन कहता है कि जब हज़रत ईसा मसीह भी अन्य लोगों की भांति एक मनुष्य थे और तुम उनके अनुयायी भी दूसरों के समान हो। किसी को किसी पर श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है, सिवाए ईश्वर के भय और भले कर्म के। प्रलय में भी मनुष्य की मुक्ति का एकमात्र साधन भला कर्म होगा न कि उसका संबंध।इस आयत से हमने सीखा कि जातिवाद और विशिष्टता प्रेम, धर्म और ईमान के नाम पर भी सही नहीं है।धार्मिक अहं, वह ख़तरा है जो सदैव ही धर्मों के अनुयाइयों को लगा रहा है। धार्मिकता के कारण स्वयं को अन्य लोगों से श्रेष्ठ समझकर घमण्ड और अहं में नहीं फंसना चाहिए।स्वर्ग और नरक का बंटवारा हमारे हाथ में नहीं है कि हम स्वयं को स्वर्ग वाला और दूसरों को नरक वाला समझें। यह कार्य तो ईश्वर का है जो न्याय और तत्वदर्शिता के आधार पर जिस पापी को चाहेगा दण्डित करेगा और जिसको चाहेगा क्षमा कर देगा।आइए अब सूरए माएदा की 19वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَهْلَ الْكِتَابِ قَدْ جَاءَكُمْ رَسُولُنَا يُبَيِّنُ لَكُمْ عَلَى فَتْرَةٍ مِنَ الرُّسُلِ أَنْ تَقُولُوا مَا جَاءَنَا مِنْ بَشِيرٍ وَلَا نَذِيرٍ فَقَدْ جَاءَكُمْ بَشِيرٌ وَنَذِيرٌ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (19)हे आसमानी किताब वालो! पैग़म्बर उस समय तुम्हारे पास आए जब दूसरे पैग़म्बर नहीं थे, ताकि तुम्हारे लिए (धार्मिक वास्तविकताओं का) वर्णन करें ताकि कहीं ऐसा न हो कि तुम प्रलय के दिन यह कह दो कि हमें कोई शुभ सूचना देने और डराने वाला नहीं आया तो निसन्देह तुम्हारे पास शुभ सूचना देने और डराने वाला आया और ईश्वर हर बात में सक्षम है। (5:19)ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का शुभ जन्म सन ५७० ईसवी में हुआ और सन ६१० में उनकी पैग़म्बरी की घोषणा की गई। इस हिसाब से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के बीच लगभग छः सौ वर्षों का अंतर है। इस बीच कोई भी पैग़म्बर नहीं आया परन्तु धरती, ईश्वरीय प्रतिनिधियों से ख़ाली नहीं रही और सदैव प्रचार करने वाले लोगों को ईश्वरीय धर्म के बारे में बताते रहे।यह आयत यहूदियों और ईसाइयों को संबोधित करते हुए कहती है कि ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को तुम्हारी ओर भेजा और चूंकि तुम्हारे पास पहले भी पैग़म्बर आ चुके थे अतः तुम्हें दूसरों से पहले उन पर ईमान लाना चाहिए था और उनके धर्म को स्वीकार करना चाहिए था।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों के आगमन ने मनुष्य के लिए बहानों का मार्ग बंद कर दिया है और वह नहीं कह सकता कि मैं नहीं जानता था या मैं नहीं समझता था।पैग़म्बरों का दायित्व अच्छे कर्मों के प्रति पारितोषिक की शुभ सूचना देना और बुराइयों तथा पापों के प्रति कड़े दण्ड की ओर से लोगों को डराना है। आइए अब सूरए माएदा की 20वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ قَالَ مُوسَى لِقَوْمِهِ يَا قَوْمِ اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ جَعَلَ فِيكُمْ أَنْبِيَاءَ وَجَعَلَكُمْ مُلُوكًا وَآَتَاكُمْ مَا لَمْ يُؤْتِ أَحَدًا مِنَ الْعَالَمِينَ (20)और (याद करो) उस समय को जब मूसा ने अपनी जाति से कहा था कि हे मेरी जाति (वालो!) अपने ऊपर ईश्वर की अनुकंपाओं को याद करो कि उसने तुम्हारे बीच पैग़म्बर भेजे और तुम्हें (धरती का) शासक बनाया और उसने तुम्हें (शासन और) ऐसी वस्तुएं प्रदान कीं जो उसने संसार में किसी को भी नहीं दी थीं। (5:20)इस आयत में और इसके बाद आने वाली आयतों में ईश्वर, बनी इस्राईल के साथ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की बातों का वर्णन करता है जिनका आरंभ उन विशेष अनुकंपाओं की याद है जो ईश्वर ने बनी इस्राईल को दी थीं। इन अनुकंपाओं में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम जैसे पैग़म्बरों का बनी इस्राईल में आगमन है जिन्हें शासन प्राप्त हुआ और वे बनी इस्राईल के सम्मान, शक्ति और वैभव का कारण बने परन्तु बनी इस्राईल ने इन अनुकंपाओं की उपेक्षा की और परिणाम स्वरूप उन पर फ़िरऔन जैसा अत्याचारी शासक, शासन करने लगा तथा वे लोग उसके दास बन गए।हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उस उज्जवल अतीत की याद दिलाकर बनी इस्राईल को प्रयास करने के लिए प्रेरित करते थे ताकि वे अपनी पुरानी सत्ता को प्राप्त कर लें और सुस्ती तथा आलस्य से बाहर आ जाएं।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरी, सत्ता और स्वतंत्रता की अनुकंपा ईश्वर की महानतम अनुकंपाओं में से है और हमें इसका महत्त्व समझना चाहिए और कृतज्ञ रहना चाहिए।इतिहास से पाठ सीखना चाहिए। ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभान्वित होने और सत्ता प्राप्त करने के बावजूद बनी इस्राईल अपमान, लज्जा और दरिद्रता में घिर गए।आइए अब सूरए माएदा की 21वीं और 22वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا قَوْمِ ادْخُلُوا الْأَرْضَ الْمُقَدَّسَةَ الَّتِي كَتَبَ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَرْتَدُّوا عَلَى أَدْبَارِكُمْ فَتَنْقَلِبُوا خَاسِرِينَ (21) قَالُوا يَا مُوسَى إِنَّ فِيهَا قَوْمًا جَبَّارِينَ وَإِنَّا لَنْ نَدْخُلَهَا حَتَّى يَخْرُجُوا مِنْهَا فَإِنْ يَخْرُجُوا مِنْهَا فَإِنَّا دَاخِلُونَ (22)(हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा) हे मेरी जाति (वालो!) पवित्र धरती में प्रवेश करो जिसे ईश्वर ने तुम्हारे लिए निर्धारित किया है और पीछे न हटो कि तुम घाटा उठाने वालों में से हो जाओगे। (5:21) बनी इस्राईल ने उत्तर में कहा, हे मूसा! उस धरती पर अत्याचारी गुट है हम उस (धरती) में कदापि प्रवेश नहीं करेंगे सिवाए इसके कि वह गुट उस धरती से निकल जाए। तो यदि वह निकल गया तो हम निसन्देह, प्रविष्ट हो जाएंगे।(5:22)हज़रत मूसा अलैहिस्लाम ने बनी इस्राईल से कहा कि वह जेहाद और प्रयास द्वारा तत्कालीन सीरिया और बैतुलमुक़द्दस में प्रवेश करें और वहां के अत्याचारी शासकों के सामने डट जाएं परन्तु वे लोग जो वर्षों तक फ़िरऔन के शासन में जीवन व्यतीत कर चुके थे, इतने डरपोक हो गए थे कि कहने लगे कि हम यह काम नहीं कर सकते। हममें संघर्ष की शक्ति नहीं है। वे लोग यदि स्वयं ही उस धरती से निकल जाएं और उसे हमारे हवाले कर दें तो हम उसमें प्रवेश करेंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों को पवित्र धार्मिक स्थानों को अत्याचारियों के चुंगल से छुड़ाना चाहिए।शत्रु के साथ मुक़ाबले में पराजय का कारण अपने दुर्बल होने का आभास है और पैग़म्बरों ने इस आभास को समाप्त करने के लिए संघर्ष किया है।