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    सूरए माएदा; आयतें 32-35 (कार्यक्रम 170)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 32वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।مِنْ أَجْلِ ذَلِكَ كَتَبْنَا عَلَى بَنِي إِسْرَائِيلَ أَنَّهُ مَنْ قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا وَلَقَدْ جَاءَتْهُمْ رُسُلُنَا بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ إِنَّ كَثِيرًا مِنْهُمْ بَعْدَ ذَلِكَ فِي الْأَرْضِ لَمُسْرِفُونَ (32)इसी कारण हमने बनी इस्राईल के लिए लिख दिया कि जो कोई किसी व्यक्ति की, किसी व्यक्ति के बदले में या धरती पर बुराई फैलाने के अतिरिक्त (किसी अन्य कारणवश) हत्या कर दे तो मानो उसने समस्त मानव जाति की हत्या कर दी, और जिसने किसी व्यक्ति को जीवित किया (और उसे मृत्यु से बचाया) तो मानो उसने सभी मनुष्यों को जीवित कर दिया, और निसन्देह, हमारे पैग़म्बर बनी इस्राईल के पास स्पष्ट निशानियां लेकर आए परन्तु उनमें से अधिकांश लोग (सत्य को जानने के बाद भी) धरती में अतिक्रमण करने वाले ही रहे। (5:32)पिछले कार्यक्रम में हमने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के दो पुत्रों की घटना का वर्णन किया था। हमने बताया था कि क़ाबील ने ईर्ष्या के कारण अपने भाई हाबील की हत्या कर दी और एक कौवे को देखकर हाबील के शव को मिट्टी मे दफ़्न कर दिया और अपने काम पर पछताने लगा।इस आयत में ईश्वर कहता है कि इस घटना के पश्चात हमने यह निर्धारित कर दिया कि किसी एक व्यक्ति की हत्या, सभी मनुष्यों की हत्या के समान है और इसी प्रकार किसी एक व्यक्ति को मौत से बचाना भी पूरे मानव समाज को मौत के मुंह से बचाने के समान है।क़ुरआने मजीद इस आयत में एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक वास्तविकता की ओर संकेत करते हुए कहता है कि मानव समाज एक शरीर की भांति है और समाज के सदस्य उस शरीर के अंग हैं। इस समाज में एक सदस्य को पहुंचने वाली हर क्षति का प्रभाव, अन्य सदस्यों में स्पष्ट होता है। इसी प्रकार जो कोई किसी निर्दोष के ख़ून से अपने हाथ रंगता है वह वास्तव में अन्य निर्दोष लोगों की हत्या के लिए भी तैयार रहता है। वह हत्यारा होता है और निर्दोष लोगों या दोषियों के बीच कोई अंतर नहीं समझता।यहां पर रोचक बात यह है कि पवित्र क़ुरआन, मनुष्य के जीवन को इतना महत्त्व देता है और एक व्यक्ति की हत्या को पूरे समाज की हत्या के समान बताने के बावजूद दो स्थानों पर मनुष्य की हत्या को वैध बताता है। पहला स्थान हत्यारे के बारे में है कि उसके अपराध के बदले में उसे क़ेसास किया जाना चाहिए अर्थात हत्यारे को मृत्यु दण्ड दिया जाना चाहिए। दूसरा स्थान उस व्यक्ति के बारे में है जो समाज में बुराई फैलाता है, यद्यपि ऐसा व्यक्ति किसी की हत्या नहीं करता किंतु समाज की व्यवस्था को बिगाड़ देता है। इस प्रकार के लोगों का भी सफ़ाया कर देना चाहिए।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके परिजनों के कथनों में लोगों को जीवित करने और उनकी हत्या करने का उदाहरण, उनके मार्गदर्शन और पथभ्रष्टता में बताया गया है। जो कोई भी दूसरों की पथभ्रष्टता का कारण बनता है मानो वह एक समाज को पथभ्रष्ट करता है और जो कोई किसी एक व्यक्ति का मार्गदर्शन करता है मानो वह एक पूरे समाज को मुक्ति दिलाता है।इस आयत के अंत में क़ानून तोड़ने की बनी इस्राईल की आदत की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि यद्यपि हमने बनी इस्राईल के लिए अनेक पैग़म्बर भेजे और उनके कानों तक वास्तविकता पहुंचा दी किंतु इसके बावजूद वे ईश्वरीय सीमाओं को लांघते रहे और पाप करते रहे।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्यों का भविष्य एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। मानव इतिहास एक ज़ंजीर की भांति है कि यदि उसकी एक कड़ी को तोड़ दिया जाए तो बाक़ी कड़ियां भी बर्बाद हो जाती हैं।कर्म का मूल्य उसकी भावना और उद्देश्य से संबंधित है। अतिक्रमण के उद्देश्य से एक व्यक्ति की हत्या पूरे एक समाज को मारने के समान है किंतु एक हत्यारे को मृत्युदण्ड देना, समाज के जीवन का कारण है।जिनका कार्य लोगों की जान बचाना है, उन्हें डाक्टरों की भांति अपने काम का मूल्य समझना चाहिए। किसी भी रोगी को मौत से बचाना पूरे समाज को मौत से बचाने के समान है।आइए अब सूरए माएदा की 33वीं और 34वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الْأَرْضِ فَسَادًا أَنْ يُقَتَّلُوا أَوْ يُصَلَّبُوا أَوْ تُقَطَّعَ أَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُمْ مِنْ خِلَافٍ أَوْ يُنْفَوْا مِنَ الْأَرْضِ ذَلِكَ لَهُمْ خِزْيٌ فِي الدُّنْيَا وَلَهُمْ فِي الْآَخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ (33) إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِنْ قَبْلِ أَنْ تَقْدِرُوا عَلَيْهِمْ فَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ(34)निसन्देह जो लोग ईश्वर और उसके पैग़म्बर से युद्ध करते हैं और धरती में बिगाड़ पैदा करने का प्रयास करते हैं, उनका दण्ड यह है कि उनकी हत्या कर दी जाए या उन्हें सूली पर चढ़ा दिया जाए या उनके हाथ पांव विपरीत दिशाओं से काट दिये जाएं (अर्थात दायां पांव और बायां हाथ या इसका उल्टा) या फिर उन्हें देश निकाला दे दिया जाए। यह अपमानजनक दण्ड तो उनको संसार में मिलेगा और प्रलय में भी उनके लिए बहुत ही कड़ा दण्ड है। (5:33) सिवाए उन लोगों के जो तुम्हारे नियंत्रण में आने से पहले ही तौबा कर लें। तो जान लो कि ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (5:34)पिछली आयत में मनुष्यों की जान के महत्त्व और सम्मान के वर्णन के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि किसी ने यदि इस सम्मान की रक्षा नहीं की तो फिर स्वयं उसकी जान भी सम्मानीय नहीं है और उसे कड़ा दण्ड दिया जाएगा ताकि दूसरे उससे पाठ सीखें।इन आयतों में चार प्रकार के दण्डों का उल्लेख किया गया है। हत्या करना, सूली देना, हांथ-पांव काटना और देश निकाला देना। स्पष्ट है कि यह चारों दण्ड एक समान नहीं हैं और इस्लामी शासक अपराध के स्तर के अनुरूप ही इनमें से किसी एक दण्ड का चयन करता है।रोचक बात यह है कि ईश्वर ने इस आयत में लोगों को जान से मारने की धमकी को ईश्वर तथा पैग़म्बर से युद्ध के समान बताया है। वास्तव में यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है। अर्थात अपराधी को यह जान लेना चाहिए कि ईश्वर और उसका पैग़म्बर उसके सामने हैं, उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि उसने किसी कमज़ोर और दुर्बल व्यक्ति को पकड़ लिया है अतः उस पर जो भी अत्याचार चाहे कर सकता है। अंत में आयत कहती है कि इन सांसारिक दण्डों से, प्रलय का दण्ड समाप्त नहीं होता, और एक बड़ा दण्ड उसकी प्रतीक्षा में है। सिवाए इसके कि इस प्रकार के लोग तौबा करें तो ईश्वर जो कुछ उससे संबंधित है उसे क्षमा कर देगा परन्तु लोगों के अधिकारों को अदा करना ही होगा क्योंकि लोगों के अधिकारों को ईश्वर तब तक क्षमा नहीं करता जब तक स्वयं अत्याचार ग्रस्त व्यक्ति क्षमा न कर दे।इन आयतों से हमने सीखा कि समाज में सुधार के लिए उपदेश भी आवश्यक हैं और न्याय का कड़ा व्यवहार भी।जो लोग समाज की शांति को समाप्त करते हैं तो समाज में उनकी किसी भी प्रकार की उपस्थिति को समाप्त कर देना चाहिए।इस्लाम के दण्डात्मक आदेशों को लागू करने के लिए, इस्लामी सरकार का गठन और इस सरकार की सत्ता आवश्यक है। आइए अब सूरए माएदा की 35वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ وَجَاهِدُوا فِي سَبِيلِهِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ (35)हे ईमान वालो! ईश्वर से डरो और (उससे सामिप्य के लिए) साधन जुटाओ तथा उसके मार्ग में जेहाद करते रहो कि शायद तुम्हें मोक्ष प्राप्त हो जाए। (5:35)पिछली आयतों में हत्या, अपराध, धमकी और दूसरों की शांति छीनने जैसे कुछ पापों के कड़े दण्डों के वर्णन के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि इस संसार में मुक्ति और मोक्ष के दो ही मार्ग हैं। एक ईश्वर का भय और दूसरे उसके सामिप्य के लिए साधन। मन की आंतरिक इच्छाओं पर नियंत्रण, अपराध तथा पाप की भूमि समतल होने को रोक देता है, और इसी के साथ उन साधनों का प्रयोग जो ईश्वर ने मनुष्य के लिए निर्धारित किये हैं, मनुष्य को ईश्वर के समीप कर देता है। जैसे क़ुरआने मजीद, पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा और उनके परिजनों तथा पवित्र लोगों के चरित्रों का अनुसरण। यह सब बातें ईश्वर से मनुष्य के निकट होने का कारण बन सकती हैं, जिस प्रकार से कि ईश्वर से भय पापों से मनुष्य की दूरी का कारण बनता है।इस आयत से हमने सीखा कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए बुराइयों से दूर भी रहना चाहिए और पवित्रताओं तथा पवित्र लोगों के समीप ही रहना चाहिए। ईश्वर का भय और उसके सामिप्य के साधन, मोक्ष व कल्याण के मार्ग हैं। यदि अन्य शर्तें उपलब्ध हों तो मनुष्य गंतव्य तक पहुंच जाएगा।