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    सूरए माएदा; आयतें 36-40 (कार्यक्रम 171)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 36वीं और 37वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْ أَنَّ لَهُمْ مَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا وَمِثْلَهُ مَعَهُ لِيَفْتَدُوا بِهِ مِنْ عَذَابِ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَا تُقُبِّلَ مِنْهُمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (36) يُرِيدُونَ أَنْ يَخْرُجُوا مِنَ النَّارِ وَمَا هُمْ بِخَارِجِينَ مِنْهَا وَلَهُمْ عَذَابٌ مُقِيمٌ (37)निसन्देह जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया, यदि उनके पास वह सब कुछ हो जो धरती पर है और उतना ही उसके साथ और भी हो कि वे उसे देकर प्रलय के दिन के दण्ड से बच जाएं तब भी उनसे स्वीकार नहीं किया जाएगा और उनके लिए दुखदायी दण्ड है। (5:36) वे लोग चाहते हैं कि (नरक की) आग से निकल जाएं परन्तु वे उससे बाहर निकलने वाले नहीं हैं और उनके लिए स्थाई दण्ड है।(5:37)पिछली आयतों में ईमान वालों को भलाई, प्रयासरत रहने, ईश्वर से भय और उसके मार्ग में जेहाद का निमंत्रण देने के पश्चात इन आयतों में ईश्वर कहता है कि हे ईमान वालो, काफ़िरों की धन-संपत्ति और सुख-वैभव सब कुछ इस नश्वर संसार तक ही सीमित हैं। यह प्रलय में इनके कुछ भी काम नहीं आएंगे। न केवल यह कि धरती की पूरी संपत्ति बल्कि यदि उससे दोगुनी संपत्ति भी लोगों के पास हो फिर भी वह उनके नरक से बचने का कारण नहीं बन सकती।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के न्याय के दरबार में, नरक से बचने के लिए कोई भी बदला स्वीकार्य नहीं है।मनुष्य के कल्याण का कारक, आंतरिक तत्व है न कि बाहरी। ईमान और कर्म, कल्याण के कारक हैं न कि धन।जो संसार में अपने कुफ़्र और द्वेष पर डटा रहा, प्रलय में उसका दण्ड भी स्थाई ही होगा।आइए अब सूरए माएदा की 38वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَالسَّارِقُ وَالسَّارِقَةُ فَاقْطَعُوا أَيْدِيَهُمَا جَزَاءً بِمَا كَسَبَا نَكَالًا مِنَ اللَّهِ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (38)चोरी करने वाले पुरुष और महिला के हाथ उनके कर्म के बदले काट दो कि यह ईश्वर की ओर से दण्ड है और ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और तत्वदर्शी है। (5:38)पिछले कार्यक्रम में खुल्लम-खुल्ला शस्त्र के बल पर लोगों की जान व माल के लिए ख़तरा बनने वाले व्यक्ति के बारे में मूल आदेश का वर्णन किया गया था। यह आयत विशेष परिस्थितियों में चोर के लिए आदेश बयान करती है जो प्रायः चोरी-छिपे लोगों की धन या संपत्ति चुराता है।चूंकि अधिक्तर चोरियां हाथों से होती हैं और जो हाथ लोगों के माल में चोरी करे, उसका कोई मूल्य नहीं है, अतः इस आयत में ईश्वर कहता है कि जो कोई चोरी करे, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री उसके हाथ काट दिये जाएं कि जो स्वयं उसके कर्म का बदला है न कि ईश्वर का अत्याचार। तत्वदर्शी ईश्वर ने समाज में शांति और सुरक्षा के लिए इस प्रकार के दण्ड रखे हैं।अलबत्ता इस बात का ध्यान रहना चाहिए कि हर चोर के हाथ नहीं काटे जा सकते बल्कि हाथ काटे जाने की शर्त यह है कि चोरी किया गया माल कम से कम एक दश्मलव दो पांच ग्राम सोने के बराबर हो, चोर ने भूख से विवश होकर चोरी न की हो और इसी प्रकार के कुछ अन्य आदेश जो धार्मिक पुस्तकों में वर्णित हैं। इसी प्रकार हाथ काटने का अर्थ, हाथ की उंगलियों का काटा जाना है न कि कलाई से पूरा हाथ। आश्चर्य की बात यह है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी इस इस्लामी आदेश को अमानवीय और उग्र आदेश मानते हैं जबकि कुछ विश्वासघाती लोगों के हाथ काटना पूरे समाज की सुरक्षा के लिए पूर्णतः मानवीय बात है और अनुभवों ने यह दर्शा दिया है कि जिन समाजों ने इन ईश्वरीय आदेशों को अपनाया है उनमें चोरी के आंकड़े बहुत कम हैं जबकि पश्चिमी समाजों में चोरी के आंकड़ें बहुत अधिक हैं।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम के दण्डात्मक क़ानूनों में अपराधियों को सज़ा दिये जाने के अतिरिक्त अन्य लोगों के सीख लेने की बात भी दृष्टिगत है अतः लोगों के सामने अपराधियों को सज़ा दी जाती है ताकि इससे दूसरे लोग पाठ ले सकें।व्यक्तिगत स्वामित्व और सामाजिक सुरक्षा को इस्लाम इतना महत्तव देता है कि जो कोई भी इन दोनों को क्षति पहुंचाए उसके साथ अत्यंत कड़ा व्यवहार करता है।इस्लाम, व्यक्तिगत धर्म नहीं है बल्कि उसके पास सामाजिक समस्याओं के समाधान के कार्यक्रम हैं। इसी प्रकार इस्लाम, केवल प्रलय और परलोक का धर्म नहीं है बल्कि लोगों के संसार के लिए भी वह कार्यक्रम रखता है।आइए अब सूरए माएदा की 39वीं और 40वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।فَمَنْ تَابَ مِنْ بَعْدِ ظُلْمِهِ وَأَصْلَحَ فَإِنَّ اللَّهَ يَتُوبُ عَلَيْهِ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (39) أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يُعَذِّبُ مَنْ يَشَاءُ وَيَغْفِرُ لِمَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (40)तो जो कोई (दूसरों पर किये) अपने अत्याचार से तौबा कर ले (और अपने पापों का प्रायश्चित) तथा सुधार कर ले तो निसन्देह, ईश्वर उसकी तौबा स्वीकार कर लेता है कि निसंदेह, ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (5:39) क्या तुम नहीं जानते कि आकाशों और धरती का शासन ईश्वर के लिए ही है? वह (अपनी तत्वदर्शिता और न्याय के आधार पर) जिसे चाहता है दण्डित करता है और जिसे चाहता है क्षमा कर देता है और ईश्वर हर वस्तु पर अधिकार रखने वाला है।(5:40)पिछली आयत में चोरी के दण्ड का वर्णन किया गया था परन्तु ईश्वर की दया के द्वार सदा ही खुले रहते हैं और ईश्वर की दया उसके क्रोध से आगे है अतः यह आयत कहती है कि यदि कोई अपने इस काम से तौबा करले और अपराध की क्षतिपूर्ति कर ले तो उसे ईश्वर क्षमा कर देता है। स्पष्ट सी बात है कि वास्तविक तौबा, न्यायालय में अपराध सिद्ध होने से पहले की जाने वाली तौबा है वरना हर चोर जब स्वयं को कड़े दण्ड के सामने पाता है तो तौबा का दावा करता है। अतः अपराध सिद्ध होने से पूर्व यदि चोर, ईश्वर के समक्ष तौबा कर ले और चुराई हुई सभी वस्तुएं उसके मालिक को लौटा दे या किसी को नुक़सान पहुंचाया हो तो उसकी क्षतिपूर्ति करके उसे राज़ी कर ले तो ईश्वर भी उसे क्षमा कर देता है और उसका दण्ड माफ़ किया जाता है।इन आयतों से हमने सीखा कि तौबा केवल एक आंतरिक पश्चाताप नहीं है बल्कि यह पापों और अपराधों की क्षतिपूर्ति के साथ किया जाने वाला प्रायश्चित है।तौबा करके मनुष्य यदि सीधे मार्ग पर वापस आ जाए तो ईश्वर भी अपनी कृपा व दया को लौटा देता है।दण्ड और क्षमा दोनों ही ईश्वर के हाथ में हैं तथा बंदों के बारे में ईश्वर के हाथ बंधे हुए नहीं हैं परन्तु वह न्याय के आधार पर अपराधी को दण्ड देता है और तौबा करने वाले को क्षमा करता है।