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    सूरए माएदा; आयतें 4-6 (कार्यक्रम 163)

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    आइए पहले सूरए माएदा की चौथी आयत की तिलावत सुनते हैं।

    يَسْأَلُونَكَ مَاذَا أُحِلَّ لَهُمْ قُلْ أُحِلَّ لَكُمُ الطَّيِّبَاتُ وَمَا عَلَّمْتُمْ مِنَ الْجَوَارِحِ مُكَلِّبِينَ تُعَلِّمُونَهُنَّ مِمَّا عَلَّمَكُمُ اللَّهُ فَكُلُوا مِمَّا أَمْسَكْنَ عَلَيْكُمْ وَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهِ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ

    (हे पैग़म्बर!) यह आपसे पूछते हैं कि इनके लिए क्या हलाल अर्थात वैध किया गया है? कह दीजिए कि तुम्हारे लिए सारी हलाल चीज़ें वैध की गई हैं और जो कुछ तुम्हें ईश्वर ने सिखाया है उसके आधार पर तुम शिकारी कुत्तों को शिकार का प्रशिक्षण देते हो तो वे जो शिकार तुम्हारे लिए पकड़ें उन्हें खा लो और उस (शिकार) पर अल्लाह का नाम लो और ईश्वर से डरते रहो, निःसन्देह, ईश्वर बहुत ही जल्दी हिसाब करने वाला है। (5:4)आपको अवश्य ही याद होगा कि सूरए माएदा की पिछली आयत में खाने-पीने की हराम अर्थात वर्जित वस्तुओं का उल्लेख किया गया था। यह आयत कहती है कि पिछली आयत में हमने जिन जानवरों का उल्लेख किया उसके अतिरिक्त हर जानवर का मांस तुम्हारे लिए वैध है चाहे तुम स्वयं उन्हें पकड़कर ज़िबह करो या तुम्हारे शिकारी कुत्ते उनका शिकार करके तुम्हारे पास ले आएं।रोचक बात यह है कि इस आयत में ईश्वर शिकारी कुत्तों जैसे जानवरों के प्रशिक्षण के विषय की ओर संकेत करते हुए कहता है कि शिकार का यह तरीक़ा जो तुम जानवरों को सिखाते हो, वास्तव में ईश्वर ने तुम्हें सिखाया है, तुम इसे अपने आप नहीं सीख गए। यह ईश्वर ही है जिसने कुत्तों को तुम्हारे नियंत्रण में दिया ताकि जो कुछ तुम कहो वे करें और तुम्हारी सेवा में रहें।इस आयत से हमने सीखा कि खाने-पीने की वस्तुओं में मूल सिद्धांत और नियम यह है कि जो कुछ पाक और पवित्र हो वह हलाल अर्थात वैध है सिवाए इसके कि स्पष्ट रूप से उसके वर्जित होने का उल्लेख किया गया हो।खाने-पीने में ईश्वर के भय का ध्यान रखना चाहिए और हराम वस्तुओं से दूर रहना चाहिए क्योंकि ईश्वर हराम खाने वालों को बहुत जल्दी दण्ड देता है।आइए अब सूरए माएदा की 5वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।

    الْيَوْمَ أُحِلَّ لَكُمُ الطَّيِّبَاتُ وَطَعَامُ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ حِلٌّ لَكُمْ وَطَعَامُكُمْ حِلٌّ لَهُمْ وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ الْمُؤْمِنَاتِ وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِكُمْ إِذَا آَتَيْتُمُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ مُحْصِنِينَ غَيْرَ مُسَافِحِينَ وَلَا مُتَّخِذِي أَخْدَانٍ وَمَنْ يَكْفُرْ بِالْإِيمَانِ فَقَدْ حَبِطَ عَمَلُهُ وَهُوَ فِي الْآَخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ

    आज तुम्हारे लिए सारी पवित्र व पाक वस्तुएं हलाल कर दी गई हैं। इसी प्रकार आसमानी किताब वालों का भोजन भी तुम्हारे लिए हलाल है जिस प्रकार से कि तुम्हारा भोजन उनके लिए वैध है। इसी प्रकार ईमान वालों की पवित्र महिलाएं और उनकी पवित्र महिलाएं जिन्हें तुमसे पूर्व किताब दी गई है, तुम्हारे लिए हलाल हैं, शर्त यह है कि तुम उन्हें उनका मेहर दे दो और स्वयं तुम भी पवित्र रहो, न कि व्यभिचारी रहो और न अवैध रूप से गुप्त संबंध स्थापित करो। और आज जो कोई भी ईमान लाने से इन्कार करे तो निःसन्देह उसके सारे कर्म अकारत हो गए और प्रलय में वह घाटा उठाने वालों में से होगा। (5:5)इस आयत में आसमानी किताब रखने वालों के संबंध में दो विषयों का विर्णन है। पहला उनका भोजन खाने के संबंध में और दूसरा उनकी महिलाओं के साथ निकाह के बारे में। आसमानी पुस्तक वालों का भोजन खाने के संबंध में, उन आदेशों और शर्तों के दृष्टिगत जो पिछली आयतों में वर्णित हुए, यह बात स्पष्ट है कि उनके द्वारा बनाए गए मांसाहारी भोजन खाना ठीक नहीं है परन्तु उनके अन्य खानों को प्रयोग किया जा सकता है।विवाह के बारे में भी जैसा कि आयत में कहा गया है, केवल उनकी महिलाएं अपने यहां विवाह करके लाई जा सकती हैं, अपनी महिलाएं उन्हें नहीं दी जा सकतीं। शायद इस कारण कि अपने नर्म स्वभाव के चलते अधिकतर महिलाएं अपने पतियों से प्रभावित रहती हैं और इस बात की प्रबल संभावना पाई जाती है कि मुस्लिम पति के साथ जीवन व्यतीत करके और इस्लाम के बारे में जानकारी प्राप्त करके वह उस पर ईमान ले आएं।यह आयत इसी प्रकार से मुसलमानों को विवाह के लिए भी प्रोत्साहित करती है। आयत में यहां तक कहा गया है कि तुम्हें यदि कोई ईसाई लड़की पसंद है तो उससे गुप्त मित्रता या अवैध संबंधों के बजाए तुम उससे विवाह कर लो कि ईश्वर इस मार्ग को बेहतर समझता है। ऐसा न हो कि उसे प्राप्त करने के लिए तुम अपना धर्म और ईमान छोड़ दो।इस आयत से हमने सीखा कि महिलाओं की पवित्रता चाहे वे जिस धर्म की हों मूल्यवान है जैसा कि पुरुषों के लिए भी पवित्रता और अवैध संबंधों से बचना आवश्यक है।क़ुरआन की दृष्टि में जीवन साथी के चयन के दो मापदण्ड हैं। एक ईमान और दूसरे पवित्रता।आइए अब सूरए माएदा की छठी आयत की तिलावत सुनते हैं।

    يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِذَا قُمْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ فَاغْسِلُوا وُجُوهَكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ إِلَى الْمَرَافِقِ وَامْسَحُوا بِرُءُوسِكُمْ وَأَرْجُلَكُمْ إِلَى الْكَعْبَيْنِ وَإِنْ كُنْتُمْ جُنُبًا فَاطَّهَّرُوا وَإِنْ كُنْتُمْ مَرْضَى أَوْ عَلَى سَفَرٍ أَوْ جَاءَ أَحَدٌ مِنْكُمْ مِنَ الْغَائِطِ أَوْ لَامَسْتُمُ النِّسَاءَ فَلَمْ تَجِدُوا مَاءً فَتَيَمَّمُوا صَعِيدًا طَيِّبًا فَامْسَحُوا بِوُجُوهِكُمْ وَأَيْدِيكُمْ مِنْهُ مَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيَجْعَلَ عَلَيْكُمْ مِنْ حَرَجٍ وَلَكِنْ يُرِيدُ لِيُطَهِّرَكُمْ وَلِيُتِمَّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

    हे ईमान वालो! जब भी नमाज़ के लिए उठो तो अपने चेहरों को और हाथों को कोहनियों तक धोओ और अपने सिर के कुछ भाग और गट्टे तक पैरों का मसह करो और तुम यदि अपवित्र हो तो ग़ुस्ल अर्थात स्नान करो। और यदि तुम बीमार हो या यात्रा में हो या तुममें से किसी ने शौच किया हो या पत्नी के निकट गया हो और (वुज़ू या ग़ुस्ल के लिए) पानी न पाओ तो पवित्र मिट्टी पर तयम्मुम कर लो, इस प्रकार से कि अपने चेहरे और हाथों का उस मिट्टी से मसह कर लो। (हे ईमान वालो!) ईश्वर तुम्हें कठिनाई में डालना नहीं चाहता बल्कि वह तुम्हें पवित्र और तुम पर अपनी अनुकंपाएं पूरी करना चाहता है कि शायद इस प्रकार से तुम उसके कृतज्ञ बंदे बन जाओ। (5:6)पिछली आयतों में खाने-पीने की वैध व वर्जित वस्तुओं के वर्णन के पश्चात यह आयत कहती है कि तुम्हें उस ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए और नमाज़ पढ़नी चाहिए जिसने तुम्हें इतनी अधिक अनुकंपाएं दी हैं और तुम्हारी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति की है परन्तु ईश्वर के समक्ष उपस्थित होने की शर्त, शरीर और आत्मा की पवित्रता है। नमाज़ से पूर्व वुज़ू करो अर्थात अपने चेहरे और हाथों को धो कर तथा सिर व पैरों का मसह करके शरीर को पाक करो और तुम यदि अपवित्र हो तो ग़ुस्ल अर्थात विशेष प्रकार का स्नान करो।यह आयत आगे चलकर कहती है कि यद्यपि साधारण स्थिति में तुम्हें वुज़ू या ग़ुस्ल करना चाहिए परन्तु ईश्वर तुम्हें बंद गली में नहीं छोड़ता और जब कभी रोग अथवा यात्रा के कारण तुम्हें पानी न मिले या तुम्हारे लिए पानी हानिकारक हो तो पानी के स्थान पर पवित्र मिट्टी से तयम्मुम कर लिया करो और ईश्वर के भय के साथ नमाज़ पढ़ो। जान लो कि तुम मिट्टी से ही बाहर आए हो और मिटटी में ही लौट कर जाओगे।इस आयत से हमने सीखा कि शरीर तथा आत्मा की अपवित्रता, ईश्वर से सामिप्य के मार्ग में बाधा है। पवित्रता ईश्वर की बंदगी में शामिल होने की शर्त है।इस्लाम धर्म में कोई बंद गली नहीं है। धर्म के आदेशों से छूट हो सकती है किंतु उन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता।धर्म के आदेश प्रकृति से जुड़े हुए है। उदाहरण स्वरूप वुज़ू, ग़ुस्ल और तयम्मुम पानी और मिटटी से, नमाज़ का समय सूर्योदय तथा सूर्यास्त से और क़िब्ले की दिशा सूर्य एवं सितारों से जुड़ी हुई है।