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    सूरए माएदा; आयतें 41-43 (कार्यक्रम 172)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 41वीं और 42वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ لَا يَحْزُنْكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ مِنَ الَّذِينَ قَالُوا آَمَنَّا بِأَفْوَاهِهِمْ وَلَمْ تُؤْمِنْ قُلُوبُهُمْ وَمِنَ الَّذِينَ هَادُوا سَمَّاعُونَ لِلْكَذِبِ سَمَّاعُونَ لِقَوْمٍ آَخَرِينَ لَمْ يَأْتُوكَ يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ مِنْ بَعْدِ مَوَاضِعِهِ يَقُولُونَ إِنْ أُوتِيتُمْ هَذَا فَخُذُوهُ وَإِنْ لَمْ تُؤْتَوْهُ فَاحْذَرُوا وَمَنْ يُرِدِ اللَّهُ فِتْنَتَهُ فَلَنْ تَمْلِكَ لَهُ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا أُولَئِكَ الَّذِينَ لَمْ يُرِدِ اللَّهُ أَنْ يُطَهِّرَ قُلُوبَهُمْ لَهُمْ فِي الدُّنْيَا خِزْيٌ وَلَهُمْ فِي الْآَخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ (41) سَمَّاعُونَ لِلْكَذِبِ أَكَّالُونَ لِلسُّحْتِ فَإِنْ جَاءُوكَ فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ أَوْ أَعْرِضْ عَنْهُمْ وَإِنْ تُعْرِضْ عَنْهُمْ فَلَنْ يَضُرُّوكَ شَيْئًا وَإِنْ حَكَمْتَ فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ بِالْقِسْطِ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ (42)हे पैग़म्बर! कुफ़्र की ओर तेज़ी से बढ़ने वाले तुम्हें दुखी न करें जिन्होंने ज़बान से कहा कि हम ईमान लाए परन्तु उनके दिल ईमान नहीं लाए और इसी प्रकार यहूदी, जो झूठी बातें सुनने के आदी हैं और दूसरी जाति वाले जो आपके पास उपस्थित नहीं हुए, उन्हें सुनाने के लिए (ये यहूदी) आपकी बातें सुनते हैं। वे आसमानी क़ानूनों में फेर-बदल करते हैं और उनसे कहते हैं यदि (पैग़म्बर की ओर से) यही दिया जाए तो ले लेना और यदि यह न दिया जाए तो मत लेना। (हे पैग़म्बर! जान लीजिए कि) ईश्वर जिसको दण्डित करना चाहे उसके बारे में आपका कोई अधिकार नहीं है, ये ऐसे लोग हैं जिनके दिलों को पवित्र करने का ईश्वर ने इरादा ही नहीं किया है। इनके लिए संसार में भी अपमान है और परलोक में भी कड़ा दण्ड है। (5:41) यह झूठ सुनने वाले और हराम खाने वाले हैं तो यदि यह फ़ैसले के लिए आपके पास मुक़द्दमा लेकर आएं तो आपको अधिकार है कि या तो उनके बीच फ़ैसला कर दें या उनसे मुंह मोड़ लें। और यदि आप उनसे मुंह मोड़ लें तो वे आपको क्षति नहीं पहुंचा सकेंगे और यदि फ़ैसला करें तो फिर न्याय के साथ करें कि निसन्देह, ईश्वर न्याय करने वालों को पसंद करता है। (5:42)इस्लामी इतिहास के अनुसार ये आयतें मदीना नगर में यहूदियों के एक गुट के बारे में उतरी हैं। इसकी घटना कुछ इस प्रकार है। एक धनी यहूदी ने व्यभिचार किया। चूंकि यहूदी धर्म के अनुसार ऐसे व्यक्ति को संगसार करना चाहिए अर्थात पत्थरों से मार-मार कर उसकी हत्या कर देनी चाहिए अतः इससे बचने के लिए उस गुट ने कहा कि हम कुछ लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भेजकर इस घृणित कार्य के संबंध में ईश्वरीय आदेश पूछते हैं। इस्लाम में व्यभिचार का दण्ड शायद कुछ सरल हो परन्तु पैग़म्बरे इस्लाम ने भी संगसार करने का आदेश दिया जिसे उन लोगों ने अस्वीकार कर दिया।उसी समय यह आयत उतरी जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहा गया है कि यहूदी यदि ईश्वर का आदेश नहीं मानते हैं तो आप दुखी मत हों क्योंकि पूरे इतिहास में उनकी पद्धति पैग़म्बरों को झुठलाने और उनकी शिक्षाओं में फेर-बदल पर आधारित रही है। यह लोग सत्य स्वीकार करने के लिए आपके पास नहीं आए हैं कि आप उनके ईमान न लाने से दुखी हों बल्कि ये लोग तो अपनी और अपने मित्रों की इच्छापूर्ति के लिए आपके पास आए हैं परन्तु चूंकि आपने उनकी इच्छा के विरुद्ध बात कही है अतः ये आपको छोड़ कर चले गए हैं।परन्तु उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे ईश्वरीय दण्ड से बच गए। ईश्वर लोक-परलोक दोनों में उन्हें कड़ा दण्ड देगा और उन्हें अपमानित करेगा क्योंकि उनके हृदय पवित्र नहीं हैं और उनके अंतर्मन में गंदगी भरी हुई है।इन आयतों से हमने सीखा कि केवल ज़बान से दावा करने का नाम ईमान नहीं है बल्कि यह दिल से स्वीकार करने का नाम है।ईश्वर के आदेशों के प्रति हमें समर्पित रहना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि ईश्वर हमारी इच्छाओं का पालन करेगा।शत्रु अपने कुफ़्र और मिथ्या पर तेज़ी से अग्रसर है तो हम अपने सत्य में क्यों ढिलाई करें?सूद और हराम खाना यहूदियों की प्रवृत्ति है।इस्लाम में फ़ैसला करने का आधार, न्याय लागू करना है। इसमें मित्र, शत्रु, दरिद्र और धनवान सब एक समान हैं अतः फ़ैसले को व्यक्तिगत इच्छाओं और बाहरी धमकियों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।आइए अब सूरए माएदा की 43वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَكَيْفَ يُحَكِّمُونَكَ وَعِنْدَهُمُ التَّوْرَاةُ فِيهَا حُكْمُ اللَّهِ ثُمَّ يَتَوَلَّوْنَ مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ وَمَا أُولَئِكَ بِالْمُؤْمِنِينَ (43)और किस प्रकार यहूदी आपसे फ़ैसला कराते हैं जबकि इनके पास तौरेत है जिसमें ईश्वर का आदेश वर्णित है। फिर यह इसके बाद ही मुंह फेर लेते हैं और यह कदापि ईमान लाने वाले नहीं हैं। (5:43)जैसा कि हमने कार्यक्रम के आरंभ में कहा था कि यहूदियों का एक गुट तौरेत के आदेश से बचने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास आया परन्तु उन्होंने इस्लाम का आदेश भी स्वीकार नहीं किया अतः पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने इब्ने सूरिया नामक एक यहूदी विद्वान के पास कुछ लोगों को भेजा। इब्ने सूरिया को सभी यहूदी मानते थे। आपने उससे पू्छा, ईश्वर की सौगंध खाकर कहो कि व्यभिचारी के लिए संगसार का आदेश तौरेत में आया है या नहीं? उसने कहा कि आया है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा कि तो फिर तुम लोग इस आदेश को क्यों नहीं मानते? उसने उत्तर में कहा, इस आदेश को हम आम लोगों पर लागू करते थे परन्तु प्रतिष्ठित लोगों पर यह क़ानून लागू नहीं किया जाता था। यहां तक कि यह पाप समाज के धन-संपन्न लोगों में पहुंच गया और आम लोगों ने हम पर दबाव डालना आरंभ कर दिया। अतः हमने स्वयं अपनी ओर से एक सरल क़ानून बना लिया कि सभी व्यभिचारियों को एक समान ४० कोड़े मारे जाएंगे और उन्हें गली कूचों में फिराया जाएगा।उस समय पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा हे, ईश्वर तू साक्षी रहना कि मैंने यहूदी धर्म में भुला दिये गए आदेश को फिर से जीवित कर दिया है।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआन की दृष्टि में, पूरी तौरेत में फेर-बदल नहीं हुआ है बल्कि कुछ ईश्वरीय आदेश उसमें मौजूद हैं।ईश्वरीय आदेशों और नियमों का उल्लंघन, ईमान के अभाव या कमज़ोरी की निशानी है, क्योंकि वास्तविक ईमान की पहचान ईश्वर के आदेशों के प्रति समर्पित रहना है। ईश्वरीय धर्म वालों के साथ मुसलमान इस सीमा तक मिल-जुल कर रहते थे कि कभी-कभी वे लोग अपने फ़ैसले कराने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास आ जाया करते थे।