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    सूरए माएदा; आयतें 44-47 (कार्यक्रम 173)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 44वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।إِنَّا أَنْزَلْنَا التَّوْرَاةَ فِيهَا هُدًى وَنُورٌ يَحْكُمُ بِهَا النَّبِيُّونَ الَّذِينَ أَسْلَمُوا لِلَّذِينَ هَادُوا وَالرَّبَّانِيُّونَ وَالْأَحْبَارُ بِمَا اسْتُحْفِظُوا مِنْ كِتَابِ اللَّهِ وَكَانُوا عَلَيْهِ شُهَدَاءَ فَلَا تَخْشَوُا النَّاسَ وَاخْشَوْنِ وَلَا تَشْتَرُوا بِآَيَاتِي ثَمَنًا قَلِيلًا وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ (44)निसन्देह, हमने ही तौरैत को उतारा है कि जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश है। इसके द्वारा ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहने वाले पैग़म्बर, यहूदियों के लिए फ़ैसले करते थे और ईश्वरीय ज्ञानी तथा विद्वान उस चीज़ से फ़ैसला करते थे, जिसका ईश्वरीय किताब में उन्हें रक्षक बनाया गया है और जिसके यह गवाह भी हैं तो (हे धर्मगुरुओ!) लोगों से न डरो (बल्कि) केवल मुझसे डरते रहो और कदापि मेरी आयतों को सस्ते दामों न बेच देना और जान लो कि जो लोग ईश्वर द्वारा उतारी गई (किताब) के आधार पर फ़ैसला न करें तो वे सब काफ़िर होंगे। (5:44)जैसा कि आप को ज्ञान होगा हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि यहूदियों का एक गुट, तौरैत के आदेश से बचने के लिए, पैग़म्बरे इस्लाम के निकट आया ताकि शायद वे, उसके द्वारा किये गए पाप के बारे में कोई सरल आदेश दे दें परन्तु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने तौरेत के आधार पर ही उनका फ़ैसला किया।यह आयत और इसके बाद वाली आयत इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि न केवल हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद के पैग़म्बरों ने तौरैत के आधार पर फ़ैसले किये हैं बल्कि यहूदी विद्वानों को भी, जिन पर ईश्वरीय किताब और आदेशों की रक्षा का दायित्व है, ऐसा ही करना चाहिए और लोगों के विरोध के डर से या अपने निजी हितों की पूर्ति के लिए ईश्वरीय आदेशों को छिपाना या उनमें फेरबदल करना नहीं चाहिए क्योंकि यह एक प्रकार का कुफ़्र है।यह आयत आसमानी आदेशों की रक्षा और अनुचित आंतरिक इच्छाओं से मुक़ाबले के संबंध में चाहे वह अपनी ओर से हो या अन्य लोगों की ओर से, धर्मगुरुओं के महान दायित्व का उल्लेख करती है और उन्हें पथभ्रष्टता तथा ग़लत धारणाओं से मुक़ाबले का निमंत्रण देती है। इस आयत से हमने सीखा कि धर्मगुरुओं को शासकों के क्रियाकलापों पर पूरी दृष्टि रखनी चाहिए तथा इस मार्ग में किसी धमकी से डरना नहीं चाहिए और किसी भी लोभ पर ध्यान नहीं देना चाहिए।आसमानी क़ानूनों के होते हुए, मानवीय क़ानूनों की ओर उन्मुख होना, असली मार्ग से विचलित होने के समान है।आइए अब सूरए माएदा की ४५वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَكَتَبْنَا عَلَيْهِمْ فِيهَا أَنَّ النَّفْسَ بِالنَّفْسِ وَالْعَيْنَ بِالْعَيْنِ وَالْأَنْفَ بِالْأَنْفِ وَالْأُذُنَ بِالْأُذُنِ وَالسِّنَّ بِالسِّنِّ وَالْجُرُوحَ قِصَاصٌ فَمَنْ تَصَدَّقَ بِهِ فَهُوَ كَفَّارَةٌ لَهُ وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ(45)और हमने तौरेत में यहूदियों के लिए लिख दिया कि (क़ेसास में) जान का बदला जान, आंख का बदला आंख, नाक का बदला नाक, कान का बदला कान, दांत का बदला दांत है और धावों का भी बदला लिया जाएगा। तो जो कोई क्षमा कर दे तो यह उसके पापों का कफ़्फ़ारा या क्षतिपूर्ति होगी और जो लोग ईश्वर द्वारा भेजे गए आदेश के विरुद्ध फ़ैसला करें तो वही लोग अत्याचारी हैं। (5:45)एक अन्य विषय जिसके बारे में यहूदी विद्धान, जनता को सही बात नहीं बताया करते थे या उसे सही ढंग से लागू नहीं करते थे, क़ेसास अर्थात किसी की हत्या करने या किसी को घायल करने के बदले का विषय था। इस संबंध में वे भेदभाव करते थे। कुछ क़बीलों पर तो यह क़ानून लागू करते थे और कुछ अन्य क़बीलों पर लागू नहीं करते थे। पवित्र क़ुरआन क़ेसास के आदेश का उल्लंघन करके जो, इस्लाम में भी वर्णित है, कहता है कि यह आदेश तौरेत में भी वर्णित है और हर छोटे-बड़े घाव का क़ेसास है। इस आदेश में किसी को भी दूसरे पर वरीयता प्राप्त नहीं है तथा जो कोई इस आदेश के अतिरिक्त कोई अन्य आदेश माने तो उसने स्वयं और समाज पर अत्याचार किया है।अलबत्ता दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, प्रत्येक दशा में प्रशंसनीय है। इसी कारण क़ुरआने मजीद कहता है कि जो कोई दूसरों के अपराधों को क्षमा करेगा तो उसने दूसरों के अपराधों को जिस मात्रा में क्षमा किया होगा, ईश्वर उतना ही उसके पापों को क्षमा कर देगा।सदक़ा या दान, केवल आर्थिक नहीं होता बल्कि दूसरों की ग़लतियों और अपराधों को क्षमा करना भी एक प्रकार का सदक़ा और दान है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय क़ानून के समक्ष सभी मनुष्य एक समान हैं चाहे वह दरिद्र हो या धनवान, श्वेत हो या अश्वेत, ज्ञानी हो या अनपढ़।क़ेसास का क़ानून इस्लाम से विशेष नहीं है। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के काल से ही लोगों के बीच यह क़ानून था और अब भी है। इस्लाम ने अपराधियों को दण्ड देने में कड़ाई और कठोरता को प्रेम तथा दया के साथ रखा है।केवल आर्थिक जुर्माना या क़ैद, अपराध को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। जान का क़ेसास, समाज की शांति व सुरक्षा को सुनिश्चित बनाता है। आइए अब सूरए माएदा की 46वीं तथा 47वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَقَفَّيْنَا عَلَى آَثَارِهِمْ بِعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ مُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ التَّوْرَاةِ وَآَتَيْنَاهُ الْإِنْجِيلَ فِيهِ هُدًى وَنُورٌ وَمُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ التَّوْرَاةِ وَهُدًى وَمَوْعِظَةً لِلْمُتَّقِينَ (46) وَلْيَحْكُمْ أَهْلُ الْإِنْجِيلِ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فِيهِ وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ (47)और हमने उन पैग़म्बरों के पदचिन्हों पर मरयम के पुत्र ईसा को चलाया जो तौरेत की पुष्टि करने वाले थे। और हमने उन्हें इंजील दी जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश था और जो तौरेत की पुष्टि करने वाली पुस्तक तथा ईश्वर से डरने वालों के लिए उपदेश और मार्गदर्शन का साधन थी। (5:46) इंजील वालों को चाहिए कि ईश्वर ने जो आदेश उतारा है उसके अनुसार फ़ैसला करें और जो लोग ईश्वर द्वारा उतारे गए आदेश के अनुसार फ़ैसला न करें तो वही लोग अवज्ञाकारी हैं। (5:47)पिछली आयतों में यहूदियों को तौरेत के आदेशों के पालन की सिफ़ारिश करने के पश्चात इन आयतों में ईश्वर ईसाइयों से कहता है कि इंजील भी ईश्वर की किताब और मार्गदर्शन का साधन है तथा जो आदेश तौरेत में आए हैं उनकी पुष्टि करती है। जिस प्रकार से कि हज़रत ईसा मसीह भी, तौरेत में पाई जाने वाली निशानियों के अनुसार ईश्वर की ओर से आए हैं, तो तुम भी जो कुछ इंजील में आया है उस पर प्रतिबद्ध रहो और ईश्वर के आदेशों का उल्लंघन न करो कि ऐसी स्थिति में तुम अवज्ञाकारियों में हो जाओगे।अलबत्ता स्पष्ट है कि क़ुरआन का तात्पर्य उस तौरैत और इंजील से है जिसमें फेर-बदल नहीं हुआ है और जिसके पालन से, अन्तिम पैग़म्बर अर्थात हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम तथा उनकी किताब क़ुरआन को स्वीकार करने की प्रेरणा मिलती है वरना तो तौरेत और इंजील जिनमें फेर-बदल हुआ है, पालन करने योग्य नहीं हैं और यदि उनके अनुसार कर्म किये जाएं तो वे स्वीकार्य नहीं हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि सभी आसमानी किताबें मनुष्य को पवित्रता का निमंत्रण देती हैं क्योंकि केवल पवित्र लोग ही उपदेश स्वीकार करते हैं। सभी आसमानी किताबें और ईश्वरीय पैग़म्बर एक दिशा और एक मार्ग में हैं तथा एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं। उनके बीच कोई विरोधाभास नहीं है।आसमानी किताबें केवल पढ़ने के लिए नहीं बल्कि व्यक्तिगत, परिवार और समाज के स्तर पर अमल करने के लिए होती हैं।