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    सूरए माएदा; आयतें 48-50 (कार्यक्रम 174)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 48वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَأَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ مُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ الْكِتَابِ وَمُهَيْمِنًا عَلَيْهِ فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ عَمَّا جَاءَكَ مِنَ الْحَقِّ لِكُلٍّ جَعَلْنَا مِنْكُمْ شِرْعَةً وَمِنْهَاجًا وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَكِنْ لِيَبْلُوَكُمْ فِي مَا آَتَاكُمْ فَاسْتَبِقُوا الْخَيْرَاتِ إِلَى اللَّهِ مَرْجِعُكُمْ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ (48)और (हे पैग़म्बर!) हमने आप की ओर यह किताब सत्य के साथ उतारी है जो इससे पहले वाली किताबों की पुष्टि और रक्षा करने वाली है। तो आप, लोगों के बीच उनके अनुसार फ़ैसला कीजिए जो ईश्वर ने उतारा है और ईश्वर की ओर से आए हुए सत्य को छोड़कर उनकी अनुचित इच्छाओं का पालन न कीजिए। हमने तुममें से हर एक के लिए अलग-अलग धर्मविधान और कर्मपथ निर्धारित किया है। और यदि ईश्वर चाहता तो तुम सबको एक ही समुदाय बना देता परन्तु वह अपने दिये हुए (क़ानून) से तुम्हारी परीक्षा लेना चाहता है, तो तुम सब भलाई में एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करो (और जान लो कि) तुम सबको ईश्वर ही की ओर लौटना है और वह तुम्हें उन सभी बातों से अवगत करा देगा जिनमें तुम मतभेद करते रहे हो।(5:48)पिछले कार्यक्रमों में हमने कहा था कि ईश्वर ने पूरे इतिहास में मनुष्यों के मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बर भेजे और उनके लिए धर्म तथा कर्मपथ निर्धारित किया परन्तु ईश्वर के कुछ पैग़म्बरों की शिक्षाओं को छिपाया गया या फिर उनमें फेर-बदल कर दिया गया तथा धर्म की विशुद्ध शिक्षाओं और वास्तविकताओं के स्थान पर अंधविश्वासों और ग़लत विचारों को ले आया गया।अभी आपने जिस आयत की तिलावत सुनी वह क़ुरआने मजीद के उच्च स्थान की ओर संकेत करते हुए कहती है कि क़ुरआन, पिछली आसमानी किताबों की पुष्टि करने के साथ ही उनका रक्षक भी है और पिछले पैग़म्बरों की मूल शिक्षाओं पर बल देते हुए उनकी पूर्ण रक्षा करता है तथा उन्हें संपूर्ण एवं व्यापक बताता है।आगे चलकर इस प्रश्न के उत्तर में कि, क्यों ईश्वर ने सभी लोगों के लिए एक धर्म और एक कर्मपथ नहीं बनाया कि इस प्रकार के मतभेद सामने न आते? आयत कहती है कि ईश्वर सभी लोगों को एक समुदाय और एक धर्म का अनुयायी बना सकता था परन्तु यह बात, धीरे-धीरे मनुष्य को प्राप्त होने वाली परिपूर्णता और उसके प्रशिक्षण के विभिन्न चरणों के क़ानूनों से मेल नहीं खाती क्योंकि मनुष्य की वैचारिक परिपूर्णता की आवश्यकता के अनुसार, अधिक वास्तविकताएं मनुष्य के लिए स्पष्ट होनी चाहिए थीं और बेहतर तथा अधिक परिपूर्ण मार्ग, जीवन के लिए सामने आने चाहिए थे। ठीक उसी प्रकार जैसे एक क़ानून की विभिन्न क्लासों में, छात्रों की वैचारिक प्रगति व उन्नति के साथ ही उन्हें अधिक गंभीर विषय पढ़ाए जाते हैं।अंत में आयत कहती है कि कर्मपथ में यह अंतर, सृष्टि में मनुष्यों के अंतर की भांति, ईश्वरीय परीक्षाओं तथा मानवीय योग्यताओं के उभर कर सामने आने का साधन है, इसे विवादों और लड़ाई-झगड़ों का साधन नहीं बनना चाहिए बल्कि हर किसी को अपनी क्षमता तथा संभावना के अनुसार भले कर्म करने में दूसरों से आगे बढ़ना चाहिए और जानना चाहिए कि ईश्वर, लोगों के कर्मों को देख रहा है और कोई भी बात उससे छिपी हुई नहीं।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद को अपने से पहले वाली आसमानी किताबों पर श्रेष्ठता प्राप्त है। जिस प्रकार कालेज की पुस्तकें स्कूल की पुस्तकों से श्रेष्ठ भी होती हैं और उनकी पुष्टि भी करती हैं।समाज के नेताओं को जिन ख़तरों का सदैव ही सामना रहता है उनमें से एक, लोगों को प्रसन्न तथा उनकी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए ईश्वरीय वास्तविकताओं की अनदेखी है।ईश्वरीय परीक्षा का एक साधन, धर्मों के बीच विभिन्नता और अंतर है ताकि यह पता चल सके कि कौन सत्य को खोज कर उसे स्वीकार करना चाहता है और कौन सांप्रदायिकता तथा हठधर्म से काम लेता है।आइए अब सूरए माएदा की 49वीं और 50वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَأَنِ احْكُمْ بَيْنَهُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ وَاحْذَرْهُمْ أَنْ يَفْتِنُوكَ عَنْ بَعْضِ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ إِلَيْكَ فَإِنْ تَوَلَّوْا فَاعْلَمْ أَنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَنْ يُصِيبَهُمْ بِبَعْضِ ذُنُوبِهِمْ وَإِنَّ كَثِيرًا مِنَ النَّاسِ لَفَاسِقُونَ (49) أَفَحُكْمَ الْجَاهِلِيَّةِ يَبْغُونَ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ اللَّهِ حُكْمًا لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ (50)और (हे पैग़म्बर) आसमानी किताब वालों के बीच उस चीज़ के आधार पर फ़ैसला कीजिए जो ईश्वर ने उतारी है और उनकी इच्छाओं का पालन न कीजिए और इस बात से बचते रहिए कि ईश्वर ने जो कुछ आप पर उतारा है उनमें से कुछ में वे आपको बहका दें। तो यदि आपके फ़ैसले से वे मुंह मोड़ लें तो जान लीजिए कि ईश्वर उन्हें उनके कुछ पापों के कारण दण्डित करना चाहता है और निसन्देह, बहुत सारे लोग अवज्ञाकारी है। (5:49) क्या यह लोग जाहिलियत अर्थात अज्ञानता के काल का फ़ैसला चाहते हैं जबकि ईमान और विश्वास रखने वालों के लिए ईश्वर के फ़ैसले से बेहतर किसका फ़ैसला हो सकता है? (5:50)जैसा कि इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि यहूदियों का एक गुट पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास आया। उस गुट ने आपसे कहा कि हम यहूदी धर्मगुरू और विद्वान हैं। हम यदि आप पर ईमान ले आएं तो अन्य यहूदी भी आप पर ईमान ले आएंगे परन्तु हमारे ईमान लाने की शर्त यह है कि मतभेदों में आप हमारे ही पक्ष में फ़ैसला करेंगे। इस आयत ने पैग़म्बरे इस्लाम को यहूदियों के षड्यंत्र से अवगत करा दिया और इस प्रकार के मामले से रोक दिया।आगे चलकर आयत, मनुष्य के जीवन में पाप के ख़तरे की ओर संकेत करते हुए कहती है कि पाप करने का अंजाम यह है कि इससे मनुष्य का हृदय इतना कठोर हो जाता है कि वह सत्य को समझता है किंतु उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता बल्कि इससे भी बढ़कर वह सत्य को अपने हितों की भेंट चढ़ा देता है और उसी बात को स्वीकार करता है जो उसके हित में होती है।यह आयत इसी प्रकार से एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात की ओर संकेत करते हुए कहती है कि तुम यदि जीवन के क़ानून को जानना चाहते हो तो क़ानून बनाने के लिए ईश्वर से बेहतर कौन हो सकता है? वह सृष्टि तथा मनुष्य के सभी रहस्यों से अवगत है। वह कभी कोई भूल या ग़लती नहीं करता, किसी भी शक्ति से नहीं डरता और तुम्हारी संपत्ति का उसे कोई लोभ नहीं है। तो फिर ईश्वर के आदेशों को तुम क्यों स्वीकार नहीं करते और हितों, लाभों और अंधविश्वास के आधार पर बनाए गए क़ानूनों को स्वीकार करते हो?इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य जब भी सत्य के मार्ग से हट जाए तो वह अज्ञानता के मार्ग पर चलने लगता है, चाहे विदित रूप से वह ज्ञानी और शिक्षित ही क्यों न हो। क्योंकि वास्तविक ज्ञान की निशानी सत्य को समझकर उसे स्वीकार करना है।वास्तविक ईमान की निशानी, आसमानी क़ानूनों को स्वीकार करना है, जो लोग मनुष्य द्वारा बनाए गए क़ानूनों से आशा रखते हैं, उन्हें अपने ईमान पर शक करना चाहिए।शत्रु के सांस्कृतिक प्रभाव की ओर से सचेत रहना चाहिए। वह विभिन्न षड्यंत्रों द्वारा ईमान वालों तथा इस्लामी समाज के नेताओं को धोखा देना चाहता है ताकि सांठ-गांठ और लचक द्वारा युवाओं को अपनी ओर आकृष्ट कर सके।काफ़िरों द्वारा इस्लाम से मुंह मोड़ने का कारण, अवज्ञा और पाप है अन्यथा इस्लाम में कोई कमी या त्रुटि नहीं है।