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    सूरए माएदा; आयतें 51-54 (कार्यक्रम 175)

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    आइए पहले सूरए माएदा की 51वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَى أَوْلِيَاءَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ (51)हे ईमान वालो! यहूदियों और ईसाइयों को अपना मित्र और अभिभावक न बनाओ। वे आपस में एक दूसरे के मित्र हैं, और तुममें से जो कोई उन्हें अपना मित्र और अभिभावक बनाएगा तो वह उन्हीं में से होगा। निसन्देह, ईश्वर अत्याचार करने वाली जाति का मार्गदर्शन नहीं करता। (5:51)क़ुरआने मजीद के आरंभ से लेकर अब तक हमने ऐसी अनेक आयतें सुनी हैं जो इस्लामी समाज के सामाजिक और राजनैतिक मामलों से संबंधित हैं और यह बात दर्शाती है कि लोगों के जीवन की व्यवस्था और उनकी लोक-परलोक की मुक्ति के संबंध में क़ुरआन में कितनी व्यापकता पाई जाती है।इस आयत में ईश्वर मानवजीवन के एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहता है कि ईमान वालों को काफ़िरों को अपना अभिभावक और सहारा नहीं बनाना चाहिए क्योंकि ईमान वाले चाहे उनसे जितना भी प्रेम जताएं, वे उन्हें पसंद नहीं करते। वे केवल अपने जैसे लोगों को ही पसंद करते हैं।आगे चलकर आयत कहती है कि काफ़िरों को अभिभावक्ता स्वीकार करना चाहे वह जिस मात्रा में हो, मनुष्य को उन्हीं की पंक्ति में ले आता है और कुफ़्र तथा अवज्ञा के बीज उसके मन में बो देता है जो स्वयं उसके और समाज के ऊपर सबसे बड़ा अत्याचार है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी देशों की विदेश नीति में हर वह संबंध वर्जित है जो मुसलमानों पर काफ़िरों के वर्चस्व का कारण बने।काफ़िरों का स्वामित्व करना, मनुष्य को ईश्वरीय स्वामित्व से दूर और ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित कर देता है।आसमानी किताबों के अनुयाइयों के साथ क़ुरआन शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने की सिफ़ारिश करता है। जो बात वर्जित है वह उनका वर्चस्व स्वीकार करना है। आइए अब सूरए माएदा की 52वीं और 53वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।فَتَرَى الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ يُسَارِعُونَ فِيهِمْ يَقُولُونَ نَخْشَى أَنْ تُصِيبَنَا دَائِرَةٌ فَعَسَى اللَّهُ أَنْ يَأْتِيَ بِالْفَتْحِ أَوْ أَمْرٍ مِنْ عِنْدِهِ فَيُصْبِحُوا عَلَى مَا أَسَرُّوا فِي أَنْفُسِهِمْ نَادِمِينَ (52) وَيَقُولُ الَّذِينَ آَمَنُوا أَهَؤُلَاءِ الَّذِينَ أَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ إِنَّهُمْ لَمَعَكُمْ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فَأَصْبَحُوا خَاسِرِينَ (53)(तो हे पैग़म्बर!) आप देखते हैं कि जिनके हृदयों में रोग हैं वे काफ़िरों से जा मिलने में एक दूसरे को पीछे छोड़ देना चाहते हैं और वे इसके औचित्य में कहते हैं कि हमें भय है कि हम पर कोई मुसीबत न आ जाए। तो हो सकता है कि ईश्वर अपनी ओर से कोई विजय या कोई अन्य बात प्रकट करे तो यह अपने हृदयों में छिपाई हुई बातों पर लज्जित हो जाएंगे (5:52) और तब ईमान वाले कहेंगे कि क्या यही वे लोग हैं जिन्होंने ईश्वर के नाम पर बड़ी-बड़ी सौगंध खाई थी कि हम तुम्हारे साथ हैं? इनका सब किया धरा व्यर्थ हो गया और यह घाटा उठाने वाले हो गए। (5:53)ईश्वर द्वारा काफ़िरों के वर्चस्व का कारण बनने वाले हर प्रकार के संबंध से रोकने के बावजूद कुछ कमज़ोर ईमान वाले और मिथ्याचारी, काफ़िरों से मित्रता और उनका समर्थन प्राप्त करने के लिए एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।क़ुरआने मजीद कहता है कि जब इस्लाम को शक्ति एवं विजय प्राप्त होगी और ईश्वर अपनी गुप्त सहायताओं से ईमान वालों को सम्मानित करेगा तो वे लोग जो काफ़िरों की विजय के भय से उनसे जा मिले थे अपने काम पर लज्जित होंगे और जो कुछ उन्होंने हृदय में छिपा रखा था वह सब स्पष्ट हो जाएगा और वे अपमानित होंगे।उस दिन वास्तविक ईमान वाले आश्चर्य से कहेंगे कि यह लोग जो ज़बान से ईमान का दावा करते थे और अपने दावे के लिए बड़ी-बड़ी क़समें खाते थे, किस प्रकार आज उनके सारे कर्म व्यर्थ और बर्बाद हो गए।इन आयतों से हमने सीखा कि काफ़िरों से मित्रता और उनका समर्थन प्राप्त करने में रुचि, मिथ्या तथा कमज़ोर ईमान की निशानी है।ईमान की कमज़ोरी बड़ी शक्तियों के भय और उनके समक्ष झुकने का कारण है।राजनैतिक सम्मान, आर्थिक शक्ति और सामरिक विजय यह सब ईश्वर के हाथ में है और ईमान के साथ मोमिनों की कटिबद्धता पर निर्भर है। मिथ्या का परिणाम कर्मों का व्यर्थ होना तथा अपमान और लज्जा है।आइए अब सूरए माएदा की 54वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا مَنْ يَرْتَدَّ مِنْكُمْ عَنْ دِينِهِ فَسَوْفَ يَأْتِي اللَّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ أَذِلَّةٍ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ أَعِزَّةٍ عَلَى الْكَافِرِينَ يُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا يَخَافُونَ لَوْمَةَ لَائِمٍ ذَلِكَ فَضْلُ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ (54)हे ईमान वालो! तुममें से जो कोई अपने धर्म से फिरेगा (वह जान ले कि इससे ईश्वर को कोई हानि नहीं होगी क्योंकि) भविष्य में ईश्वर ऐसे लोगों को लाएगा जिन्हें वह पसंद करता होगा और वह भी ईश्वर को पसंद करते होंगे। वे ईमान वालों के समक्ष नर्म और काफ़िरों के समक्ष कड़े होंगे। वे ईश्वर के मार्ग में जेहाद और संघर्ष करेंगे तथा किसी धिक्कार करने वाले की धिक्कार से नहीं डरेंगे। यह ईश्वर की कृपा है जिसे वह जिसको चाहता है प्रदान करता है और ईश्वर अत्यंत समाई वाला (और) जानकार है। (5:54)पिछली आयत में ईमान वालों को काफ़िरों का हर प्रकार का वर्चस्व स्वीकार न करने का आदेश देने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि ध्यान रहे कि यह बात धर्म से तुम्हारे निकलने और कुफ़्र का कारण न बन जाए। और यह भी याद रखो कि यदि तुम काफ़िरों के ख़तरों से बचने या उनका समर्थन प्राप्त करने के लिए काफ़िरों के पास जाओगे तो भी ईश्वरीय धर्म समाप्त नहीं होगा और ऐसे लोग मौजूद हैं जिनमें ईश्वर पर ईमान और उससे प्रेम उनके अस्तितव में इस प्रकार से भरा हुआ है कि वे धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के मार्ग मे जेहाद करते हैं और बिल्कुल नहीं डरते।रोचक यह है कि इस प्रकार के ईमान वालों की सराहना में ईश्वर कहता है कि शत्रु के मुक़ाबले में भरपूर कड़ाई के बावजूद वे एक-दूसरे के समक्ष अत्यंत नर्म और दयालु हैं।इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि इस आयत के उतरने के समय पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपने एक ईरानी अनुयायी सलमान फ़ार्सी के कंधे पर हाथ रखकर कहा, ईश्वर ने जिस गुट की इतनी अधिक प्रशंसा की है वे तुम्हारे देशवासी और फ़ार्स जाति के ही हैं।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म से फिरने का ख़तरा हर ईमान वाले को लगा रहता है अतः हमें अपने अंत के प्रति सचेत रहना चाहिए।धर्म से फिरना, ईश्वर और धर्म से मनुष्य के प्रेम व ज्ञान न होने का परिणाम है। जिस धर्म का आधार सही और गहरी पहचान पर न हो उसे सदैव ही ख़तरा लगा रहता है।ईश्वर को हमारी और हमारी सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसे लोग मौजूद हैं जो उसके धर्म की सुरक्षा करें और उस पर कटिबद्ध रहें।अन्य मुसलमानों के प्रति एक मुसलमान का व्यवहार प्रेम और सौहार्द है तथा शत्रु के मुक़ाबले में कड़ाई तथा सख़्ती। अतः नर्मी या कड़ाई दोनों में से केवल कोई एक नहीं हो सकता।ईश्वर की कृपा केवल धन और पद में सीमित नहीं है। ईश्वर का प्रेम, उसके मार्ग में जेहाद और धर्म में कटिबद्धता भी ईश्वरीय कृपा के नमूने हैं।