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    सूरए माएदा; आयतें 55-59 (कार्यक्रम 176)

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    आइए पहले सूरे माएदा की 55वीं और 56वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آَمَنُوا الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ (55) وَمَنْ يَتَوَلَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالَّذِينَ آَمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَالِبُونَ (56)(हे ईमान वालो!) तुम्हारा अभिभावक तथा स्वामी केवल ईश्वर, उसका पैग़म्बर और वे ईमान वाले हैं जो नमाज़ क़ाएम करते हैं और रूकू की स्थिति मे ज़कात देते हैं। (5:57) और जो कोई ईश्वर, उसके पैग़म्बर तथा ऐसे ईमान वालों की अभिभावकता और स्वामित्व स्वीकार करे तो (जान लो कि) निसन्देह, ईश्वर का गुट ही प्रभुत्व करने वाला है। (5:56)इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि एक दिन एक भिखारी मस्जिद में आया और उसने लोगों से सहायता मांगी। किसी ने उसे कुछ न दिया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने, जो उस समय नमाज़ पढ़ रहे थे और रुकू की स्थिति में थे, अपना हाथ भिखारी की ओर बढ़ाया और अपनी अंगूठी दान कर दी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के इस कार्य की प्रशंसा में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास ईश्वर ने यह आयत भेजी।पैग़म्बरे इस्लाम के एक वरिष्ठ अनुयायी अम्मारे यासिर कहते हैं कि इस घटना और इस आयत के उतरने के पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा था कि मन कुंतो मौलाहो फअलीयुन मौलाहो अर्थात जिसका मैं स्वामी और अभिभावक हूं, उसके स्वामी और अभिभावक अली हैं।स्पष्ट है कि इस आयत में प्रयोग होने वाले वली शब्द का अर्थ अभिभावक और स्वामी है न कि मित्र, क्योंकि मित्रता तो सभी मुसलमानों से संबंधित है न कि केवल उन लोगों से जो नमाज़ में रुकू की स्थिति में दान करते हैं। इसके अतिरिक्त इस आयत का सीधा संबंध हज़रत अली अलैहिस्सलाम से है, क्योंकि यह घटना केवल उन्हीं के साथ घटी है और इस आयत में ईमान वालों का शब्द बहुवचन में आया है तो यह आदर के लिए है। जैसा कि क़ुरआन में कई अन्य स्थानों पर कई शब्द बहुवचन आये है परन्तु उसका संबोधन एक ही व्यक्ति है।इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लाम, शासन से विरक्तता का भी धर्म है और उसे स्वीकार करने का भी। पिछली आयतें काफ़िरों की अभिभावकता और उनके शासन को स्वीकार करने से रोकती थीं जबकि यह आयत ईश्वर, पैग़म्बर और विशेष ईमान वालों की अभिभावकता को स्वीकार करने पर बल देती है।जो लोग, ईमान, नामज़ और ज़कात वाले नहीं हैं, उन्हें ईमान वालों पर शासन और अभिभावकता का कोई अधिकार नहीं है।वंचित तथा दरिद्र लोगों की सहायता में नमाज़ बाधा नहीं बनती। इस आयत में नमाज़ और ज़कात एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं।जो व्यक्ति समाज के वंचित और दरिद्र लोगों पर ध्यान नहीं देता वह इस्लामी समाज का शासक नहीं बन सकता।ईमान वाले यदि केवल ईश्वर, पैग़म्बर तथा ईमामों की अभिभाविकता को स्वीकार कर लें तो निसन्देह, उन्हें कोई भी पराजित नहीं कर सकता।आइए अब सूरए माएदा की 57वीं और 58वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَكُمْ هُزُوًا وَلَعِبًا مِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِكُمْ وَالْكُفَّارَ أَوْلِيَاءَ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (57) وَإِذَا نَادَيْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ اتَّخَذُوهَا هُزُوًا وَلَعِبًا ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَعْقِلُونَ (58)हे ईमान वालो! आसमानी किताब वालों में जिन लोगों ने तुम्हारे धर्म को मज़ाक़ और तमाशा बना लिया है, उन्हें और काफ़िरों को अपना अभिभावक न बनाओ और ईश्वर से डरते रहो, यदि तुम वास्तव में ईमान वाले हो। (5:57) और जब तुम नमाज़ के लिए बुलाते हो अर्थात अज़ान देते हो तो यह उसे मज़ाक़ और तमाशा बना लेते हैं, इसलिए कि यह बिल्कुल मूर्ख जाति है। (5:58)यह आयतें पुनः ईमान वालों के मित्रों के लिए विशेषकर कमज़ोर ईमान वालों को संबोधित करती हैं जो बहुत ही जल्दी काफ़िरों और आसमानी किताब वालों से प्रभावित होकर उनमें मिल जाते हैं और उनसे अभिभावकता का संबंध स्थापित करने का प्रयास करने लगते हैं। यह आयतें अत्यधिक ज़ोर देकर उन्हें इस बात से रोकती हैं। यह आयतें कहती हैं कि तुम काफ़िरों के पीछे किस प्रकार से भागते हो जबकि वे तुम्हारे धर्म, विचार और आस्था के आधार को ही स्वीकार नहीं करते तथा तुम्हारे धर्म और नमाज़ का जो तुम्हारे धर्म का आधार है, परिहास करते हैं और मज़ाक उड़ाते हैं।दूसरे शब्दों में वे तुम्हारे साथ तर्कसंगत व्यवहार नहीं करते बल्कि मूर्खता के साथ तुम्हारे धर्म का परिहास करते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान की शर्त, धार्मिक सम्मान तथा अयोग्य और परिहास करने वाले लोगों से दूरी है।भय या लोभ के कारण, काफ़िरों से मित्रता करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हमें केवल ईश्वर और उसके दण्ड से डरना चाहिए।काफ़िर नमाज़े जमाअत से भयभीत रहते हैं और उसका परिहास करते हैं अतः हमें उसे सुदृढ़ बनाना चाहिए। मज़ाक और परिहास मूर्खता की निशानी है। बुद्धिमान सदैव तर्कसंगत प्रयास करते हैं।आइए अब सूरए माएदा की 59वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ هَلْ تَنْقِمُونَ مِنَّا إِلَّا أَنْ آَمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنْزِلَ مِنْ قَبْلُ وَأَنَّ أَكْثَرَكُمْ فَاسِقُونَ (59)(हे पैगम्बर!) कह दीजिए कि हे आसमानी किताब वालो! क्या तुम हम से इस बात पर अप्रसन्न हो कि हम ईश्वर पर और जो कुछ उसने हमारी ओर और हमसे पहले उतारा है, उन सब पर ईमान लाए जबकि तुममें से अधिकतर (लोग) अवज्ञाकारी हैं। (5:59)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहती है कि काफ़िरों के परिहास के उत्तर में उनसे कह दो कि क्या तुम हमारे ईमान के कारण हमारे और हमारे धर्म के साथ ऐसा ग़लत व्यवहार करते हो? जबकि हम क़ुरआन पर भी ईमान रखते हैं और तुम्हारी तौरैत तथा इंजील पर भी, परन्तु तुम तो अपनी किताब पर भी प्रतिबद्ध नहीं हो और उसके आदेशों का उल्लंघन करते हो।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों के साथ भी भली और सटीक वार्ता करनी चाहिए। उनके उल्लंघनों और अपराधों को सीधे और भड़काऊ रूप में नहीं बल्कि प्रश्न के रूप में सामने लाना चाहिए। शत्रु के मुक़ाबले में न्याय को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।अपने धर्म की सत्यता में संदेह नहीं करना चाहिए, क्योंकि काफ़िरों की शत्रुता का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है।