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    सूरए माएदा; आयतें 60-63 (कार्यक्रम 177)

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    आइए अब सूरए माएदा की 60वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ هَلْ أُنَبِّئُكُمْ بِشَرٍّ مِنْ ذَلِكَ مَثُوبَةً عِنْدَ اللَّهِ مَنْ لَعَنَهُ اللَّهُ وَغَضِبَ عَلَيْهِ وَجَعَلَ مِنْهُمُ الْقِرَدَةَ وَالْخَنَازِيرَ وَعَبَدَ الطَّاغُوتَ أُولَئِكَ شَرٌّ مَكَانًا وَأَضَلُّ عَنْ سَوَاءِ السَّبِيلِ (60)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि क्या मैं तुम्हें बताऊं कि किन लोगों को ईश्वर के निकट सबसे बुरा बदला दिया जाएगा। वह जिस पर ईश्वर ने धिक्कार की है और उस पर क्रुद्ध हुआ है। और ऐसे लोगों में से कुछ को उसने बंदर और सूअर के रूप में ढाल दिया है, और जिन्होंने ताग़ूत अर्थात दुष्टता के प्रतीकों की उपासना की। इन्हीं लोगों का सबसे बुरा ठिकाना है और यही लोग सही मार्ग से सबसे अधिक विचलित अर्थात भटके हुए हैं। (5:60)पिछले कार्यक्रमों में हमने कहा था कि कुछ आसमानी किताब वालों के, मुसलमानों की अपेक्षा, अनेकेश्वरवादियों से बेहतर संबंध थे, यहां तक कि वे उपासना करने और नमाज़ पढ़ने वाले मोमिनों का परिहास किया करते थे। यह आयत कहती है कि जो लोग मुसलमानों के धर्म का परिहास करते हैं या उन्हें यातनाएं देते हैं, वे अपने पूर्वजों के लज्जाजनक अतीत पर दृष्टि क्यों नहीं डालते जो ईश्वरीय आदेशों की अवज्ञा तथा परिहास के कारण ईश्वरीय दण्ड के पात्र बने तथा उनका रूप या चरित्र बंदरों या सुअरों के समान हो गया। तुम उनसे पाठ क्यों नहीं सीखते?स्पष्ट है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल में बनी इस्राईल के लोग बंदर या सुअर के रूप में नहीं थे परन्तु चूंकि यहूदी जाति स्वयं को एकजुट तथा विशेष धार्मिक पहचान वाली जाति समझती थी और अतीत के गौरवपूर्ण कार्यों को स्वयं से संबंधित समझती थी, अतः क़ुरआन उन्हें संबोधित करता है ताकि उनका निराधार घमण्ड चकनाचूर हो जाए और वे अपमानित हों। ईश्वरीय धिक्कार और क्रोध का अर्थ भी पापी मनुष्य का ईश्वरीय दया व कृपा से वंचित होना और पाप के अनुकूल प्रकोप तथा दण्ड का पात्र बनना है। ऐसी स्थिति में मनुष्य स्वाभाविक रूप से सत्य के मार्ग से भटक जाता है और अत्याचारी व उद्दंड शासकों के अधीन होकर उनका आज्ञापालन करने लगता है।इस आयत से हमने सीखा कि मानवीय सम्मान से दूर होना तथा एक मनुष्य रूपी पशु में परिवर्तित होना, स्वयं एक ईश्वरीय दण्ड है।जिन पर ईश्वरीय धिक्कार या प्रकोप हुआ है, उन्हें ईमान वालों के बीच कोई सम्मान नहीं मिलना चाहिए।आइए अब सूरए माएदा की 61वीं तथा 62वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا جَاءُوكُمْ قَالُوا آَمَنَّا وَقَدْ دَخَلُوا بِالْكُفْرِ وَهُمْ قَدْ خَرَجُوا بِهِ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا كَانُوا يَكْتُمُونَ (61) وَتَرَى كَثِيرًا مِنْهُمْ يُسَارِعُونَ فِي الْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَأَكْلِهِمُ السُّحْتَ لَبِئْسَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (62)और वे जब भी आपके पास आते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान लाए जबकि वे कुफ़्र के साथ प्रविष्ट होते हैं और कुफ़्र के साथ ही बाहर निकलते हैं, और जो कुछ वे छिपाते हैं, ईश्वर उससे भलि-भांति अवगत है। (5:61) और आप उनमें से अधिकांश को देखते हैं कि पाप, अतिक्रमण और हरामख़ोरी की ओर दौड़े चले जाते हैं, और कितना बुरा काम है जो वे करते हैं। (5:62)ईमान वालों के साथ आसमानी किताब वालों के व्यवहार का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि इतने बुरे व्यवहार के बाद भी वे ईमान का दावा करते हैं और स्वयं को मोमिन समझते हैं, जबकि वे कभी भी ईमान नहीं लाए और उनके हृदय कुफ़्र व इन्कार से भरे हुए हैं। वे कुफ़्र की भावना के साथ ही ईमान वालों के गुट के बीच आए और इसी प्रकार बाहर निकल गए। यद्यपि वे अपनी इस बात को छिपाते हैं परन्तु ईश्वर उनकी हर बात से भलिभांति अवगत है।उनके कुफ़्र का सबसे स्पष्ट प्रमाण पाप, हरामख़ोरी और अतिक्रमण में उनका एक दसरे से आगे बढ़ना है, क्योंकि यह बात ईमान से मेल नहीं खाती।अलबत्ता क़ुरआने मजीद सभी आसमानी किताब वालों को इसका दोषी नहीं ठहराता बल्कि वह कहता है कि इनमें से अधिकांश लोग ऐसे हैं, क्योंकि स्पष्ट सी बात है कि कुछ आसमानी किताब वाले, सच्चा ईमान रखते हैं और भले कर्म करते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान का दावा केवल ज़बान से काफ़ी नहीं है बल्कि भला कर्म ही वास्तविक और सच्चे ईमान की निशानी है।शिष्टाचारिक, सामाजिक और आर्थिक बुराइयों व भ्रष्टाचार का विस्तार धार्मिक समाजों को पतन की ओर ले जाता है। यह ऐसी बुराइयां हैं जिनकी जड़ वासना, धन तथा सत्तालोलुपता में है।इस्लामी समाज की विशेषता, भलाई में एक दूसरे से आगे बढ़ना है जबकि काफ़िर समाज की निशानी, मिथ्या और बुरे कर्मों में एक दूसरे से आगे बढ़ना है।पाप से बड़ी बुराई, पाप का दिखावा, पाप की आदत और पाप में डूब जाना है।आइए अब सूरए माएदा की 63वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।لَوْلَا يَنْهَاهُمُ الرَّبَّانِيُّونَ وَالْأَحْبَارُ عَنْ قَوْلِهِمُ الْإِثْمَ وَأَكْلِهِمُ السُّحْتَ لَبِئْسَ مَا كَانُوا يَصْنَعُونَ (63)यहूदियों के, ईश्वरीय ज्ञान रखने वाले लोग और धर्मगुरू उन्हें झूठ और ग़लत बातों तथा हराम खाने से क्यों नहीं रोकते? निसन्देह, यह बहुत बुरा कर रहे हैं। (5:63)यह आयत समाज के विद्वानों तथा प्रशिक्षकों के एक महान दायित्व का उल्लेख करते हुए कहती है कि जब लोग पाप और ग़लतियां कर रहे हैं तो विद्वान और जानकार लोग, पापियों को क्यों नहीं रोकते? यहां तक कि ज़बान से भी उन्हें मना नहीं करते हैं।केवल पापों से दूर रहना ही काफ़ी नहीं है बल्कि पापियों को पाप से रोकना भी आवश्यक है अन्यथा पाप होते देखकर चुप रहना उस पर राज़ी होने के समान है जो मनुष्य को पाप के दण्ड का भागीदार बनाता है।इस आयत से हमने सीखा कि मौन और अनदेखी तर्क नहीं बल्कि पाप के फैलने और पापी के दुस्साहसी बनने की भूमिका है।विद्धानों तथा धर्मगुरुओं का सबसे पहला दायित्व, भले कर्मों का आदेश देना और बुराइयों से रोकना है।ज्ञान का मूल्य उसके अभिव्यक्ति और अज्ञानतापू्र्ण व्यवहार को रोकने में है।