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    सूरए माएदा; आयतें 64-66 (कार्यक्रम 178)

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    आइए अब सूरए माएदा की 64वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَتِ الْيَهُودُ يَدُ اللَّهِ مَغْلُولَةٌ غُلَّتْ أَيْدِيهِمْ وَلُعِنُوا بِمَا قَالُوا بَلْ يَدَاهُ مَبْسُوطَتَانِ يُنْفِقُ كَيْفَ يَشَاءُ وَلَيَزِيدَنَّ كَثِيرًا مِنْهُمْ مَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ طُغْيَانًا وَكُفْرًا وَأَلْقَيْنَا بَيْنَهُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَاءَ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ كُلَّمَا أَوْقَدُوا نَارًا لِلْحَرْبِ أَطْفَأَهَا اللَّهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الْأَرْضِ فَسَادًا وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُفْسِدِينَ (64)और यहूदियों ने कहा कि ईश्वर के हाथ बंधे हुए हैं जबकि वास्तव में स्वयं उन्हीं के हाथ बंधे हुए हैं और अपने इस कथन के कारण उन पर धिक्कार हुई। बल्कि ईश्वर (की शक्ति) के दोनों हाथ खुले हुए हैं और वह जिस प्रकार चाहता है, प्रदान करता है। और जब भी अपने पालनहार की ओर से आप पर कोई आदेश उतारता है तो अधिकांश यहूदियों में ईमान के स्थान पर उनकी उद्दंडता और कुफ़्र में निश्चित रूप से वृद्धि हो जाती है और हमने (उनकी इसी भावना के कारण) उनके बीच प्रलय तक के लिए द्वेष व शत्रुता डाल दी है। जब भी उन्होंने युद्ध की आग भड़कानी चाही, ईश्वर ने उसे बुझा दिया। और वे धरती में बुराई तथा तबाही फ़ैलाना चाहते हैं और ईश्वर बुराई फैलाने वालों को पसंद नहीं करता। (5:64)पिछले कार्यक्रम में हमने कुछ ऐसी आयतें सुनी थीं जो पारिवारिक, शिष्टाचारिक और आर्थिक मामलों में यहूदी समाज के भ्रष्टाचारों के एक पहलू की ओर संकेत करती थीं। यह आयत ईश्वर के बारे में यहूदियों की एक ग़लत धारणा और उनके अनुचित कथन की ओर संकेत करती है।यहूदियों का विचार था कि सृष्टि के आरंभ में ईश्वर के हाथ खुले हुए थे और वह जिसे जो चाहता था प्रदान करता था परन्तु धीरे-धीरे उसकी शक्ति समाप्त होती गई और मनुष्य, का इरादा ईश्वर की इच्छा से प्रबल हो गया।यह ग़लत धारणा उनके बीच इतनी प्रचलित हो गई थी कि जब वंचितों को दान देने या ऋण संबंधी आयतें उतरीं तो वे कहने लगे। यह रहा ईश्वर के हाथ बंधे होने का प्रमाण। ईश्वर में यदि क्षमता होती तो वह स्वयं वंचितों को प्रदान कर देता और उसे हमसे यह कहने की आवश्यक्ता नहीं होती कि हम वंचितों की सहायता करें।इसके उत्तर में ईश्वर कहता है कि ईश्वर की शक्ति न कभी सीमित थी न ही होगी। वह जिसे जितना देना चाहता है देता है। दान या ऋण का आदेश, ईश्वर की विवश्ता या उसके हाथों के बंधे होने की निशानी नहीं है बल्कि यह ईमान में मोमिनों की सच्चाई की निशानी और ईश्वरीय धर्म स्वीकार करने के लिए अपरिहार्य है।आगे चलकर आयत कहती है कि इस प्रकार की ग़लत आस्थाएं, यहूदियों के बीच द्वेष और शत्रुता फैलाने का कारण बनीं यहां तक कि वे आसमानी किताब रखने वालों और इस्लाम के अनुयाइयों से भी युद्ध करके, उन्हें पराजित करने के बारे में सोचने लगे। परन्तु इस्लाम के आरम्भिक दिनों में यहूदियों ने युद्ध की जो आग भड़काई, ईश्वर ने उसका अंत मुसलमानों के हित में किया। ख़ैबर के युद्ध में यहूदियों की पराजय इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।इस आयत से हमने सीखा कि हर प्रकार के अवगुण, दोष और कमी से ईश्वर को मुक्त समझना ही ईमान की शर्त है। यहूदी ईश्वर को स्वीकार करते थे परन्तु उसे कंजूस और विवश समझा करते थे।बुराई फैलाना और युद्ध की आग भड़काना, यहूदियों की विशेषता रही है परन्तु वे कभी भी ईश्वर के इरादे पर नियंत्रण नहीं पा सके। अलबत्ता ईश्वर की यह सहायता तभी तक है जब तक मुसलमान क़ुरआन के मार्ग और पैग़म्बर की सुन्नत अर्थात परंपरा पर चलते रहेंगे।आइए अब सूरए माएदा की 65वीं और 66वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْكِتَابِ آَمَنُوا وَاتَّقَوْا لَكَفَّرْنَا عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلَأَدْخَلْنَاهُمْ جَنَّاتِ النَّعِيمِ (65) وَلَوْ أَنَّهُمْ أَقَامُوا التَّوْرَاةَ وَالْإِنْجِيلَ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْهِمْ مِنْ رَبِّهِمْ لَأَكَلُوا مِنْ فَوْقِهِمْ وَمِنْ تَحْتِ أَرْجُلِهِمْ مِنْهُمْ أُمَّةٌ مُقْتَصِدَةٌ وَكَثِيرٌ مِنْهُمْ سَاءَ مَا يَعْمَلُونَ (66)और यदि आसमानी किताब वाले ईमान ले आते और ईश्वर से डरते तो हम उनके पापों को क्षमा कर देते और उन्हें अनुकंपाओं के बाग़ों में प्रविष्ट कर देते। (5:65) और यदि वे तौरेत, इंजील और जो कुछ उसके पालनहार की ओर से उन पर उतारा गया था सब को क़ाएम करते अर्थात उसपर कार्यबद्ध रहते तो निसन्देह वे अपने ऊपर और पैरों के नीचे से ईश्वरीय विभूतियां प्राप्त करते। उनमें से एक गुट मिथ्याचारी है परन्तु अधिकांश लोग बुरे कर्म करते हैं। (5:66)इन आयतों के अंत में ईश्वर, आसमानी किताब वालों के बुरे कर्मों और ग़लत विचारों के एक अन्य पहलू की ओर संकेत करता है। यह आयतें कहती हैं कि ईश्वर का मार्ग बंद नहीं है और यदि वे तौबा कर लें और अपने ग़लत व्यवहार और कथनों को छोड़ दें तो ईश्वर उनके पिछले पापों को भी क्षमा कर देगा और भविष्य को भी सुनिश्चित बना देगा। वे इस संसार में भी धरती और आकाश से आने वाली ईश्वरीय विभूतियों से लाभान्वित होंगे और प्रलय में भी स्वर्ग की विभूतियों के पात्र बनेंगे।इन आयतों के अंत में ईश्वर एक महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करते हुए कहता है कि अलबत्ता यह बात भी सच है कि आसमानी किताब वालों के बीच ऐसे ईमान वाले मौजूद हैं जो विचारों और कर्मों में हर प्रकार की कमी या अतिशयोक्ति से दूर हैं और सही मार्ग पर अग्रसर हैं, परन्तु ऐसे लोग बहुत ही कम हैं और अधिकांश लोग अपने ग़लत मार्ग पर ही अड़े रहते हैं।यद्यपि यह आयतें यहूदियों और ईसाइयों से संबंधित हैं परन्तु स्पष्ट है कि यह ख़तरे मुसलमानों को भी लगे रहते हैं और यदि वे भी यही कर्म करें तो उन्हें भी यही दण्ड भुगतने होंगे। और इसी प्रकार यदि वे सही धार्मिक मार्ग पर दृढ़ता से अग्रसर रहें तो उन्हें ईश्वरीय सहायताएं भी प्राप्त होंगी और वे ईश्वरीय विभूतियों के भी पात्र बनेंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि पवित्रता के बिना ईमान का कोई लाभ नहीं है। ईश्वर से भय, ईमान को सुरक्षित बनाता है।दयावान ईश्वर पापों को क्षमा करने के अतिरिक्त, पापियों के लिए अपनी कृपा के द्वार भी खोल देता है।ईश्वर पर ईमान और भले कर्मों से, लोक-परलोक दोनों में कल्याण प्राप्त होता है। यदि संसार धार्मिक सिद्धातों का विरोध न करे तो धर्म, संसार के विरुद्ध नहीं है।आसमानी किताबों को केवल पढ़ लेना ही काफ़ी नहीं है, उसके आदेशों को जीवन के सभी मामलों में लागू करना आवश्यक है।