islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए माएदा; आयतें 67-68 (कार्यक्रम 179)

    सूरए माएदा; आयतें 67-68 (कार्यक्रम 179)

    Rate this post

    आइए पहले सूरए माएदा की 67वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ وَإِنْ لَمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ وَاللَّهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ (67)हे पैग़म्बर! आपके पालनहार की ओर से जो आदेश आप पर उतारा गया है उसे (लोगों तक) पहुंचा दीजिए और यदि आपने ऐसा न किया तो मानो आपने उसके संदेश को पहुंचाया ही नहीं और (जान लीजिए कि) ईश्वर आपको लोगों से सुरक्षित रखेगा। निसन्देह, ईश्वर काफ़िरों का मार्गदर्शन नहीं करता। (5:67)इस आयत में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे, पहले और बाद की आयतों से अलग करती हैं। इसकी पहली विशेषता यह है कि इसमें पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को या अय्योहर्रसूल कह कर संबोधित किया गया है। इस प्रकार का संबोधन पूरे क़ुरआन में केवल दो बार ही आया है और दोनों बार इसी सूरए माएदा में इसका उल्लेख है।दूसरी विशेषता यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम को एक ऐसे विषय को पहुंचाने का दायित्व सौंपा गया है जिसे उनकी समस्त पैग़म्बरी के बराबर बताया गया है। इस प्रकार से कि यदि उन्होंने इस बात को लोगों तक नहीं पहुंचाया तो मानो उन्होंने ईश्वरीय दायित्व को पूरा ही नहीं किया।तीसरी विशेषता यह है कि ईश्वर के निकट इस विषय का अत्यधिक महत्त्व होने के बावजूद, इसे पहुंचाने के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम चिन्तित हैं। उन्हें इस बात का भय है कि लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे। आयत के अंत में ईश्वर उन लोगों को, जो द्वेष और शत्रुता के कारण इस महत्त्वपूर्ण बात का इन्कार करें, धमकी देता है कि वे लोग ईश्वर के विशेष मार्गदर्शन से वंचित हो जाएंगे।अब यह देखना चाहिए कि यह कौन सा महत्त्वपूर्ण विषय था जिसे बिना किसी डर के लोगों तक पहुंचाने का पैग़म्बर को दायित्व सौंपा गया था और कहा गया था कि इस बारे में वे लोगों के विरोध से न डरें?पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के जीवन के अन्तिम वर्ष में इन आयतों के उतरने के दृष्टिगत स्पष्ट है कि यह विषय नमाज़, रोज़ा, हज, जेहाद या और कोई अन्य अनिवार्य धार्मिक कर्म नहीं था क्योंकि इन सब बातों के बारे में पहले के वर्षों में बयान किया जा चुका था और उन पर कार्य भी हो रहा था।तो फिर पैग़म्बरे इस्लाम की पवित्र आयु के अन्तिम दिनों में यह कौन सा इतना महत्त्वपूर्ण विषय है जिस पर ईश्वर बल देता है और पैग़म्बर भी मिथ्याचारियों की ओर से उसके विरोध को लेकर चिन्तित हैं?यह एकमात्र मामला, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के उत्तराधिकारी और इस्लाम व मुसलमानों के भविष्य का हो सकता है जिसमें यह सारी विशेषताएं हों। इसी कारण सुन्नी मुसलमानों में क़ुरआन के बड़े-बड़े व्याख्याकारों ने इस आयत की संभावनाओं के रूप में पैग़म्बर के उत्तराधिकार को स्वीकार किया है और इससे संबंधित घटनाओं तथा कथनों का अपनी तफ़सीरों में उल्लेख किया है।अलबत्ता शीया मुसलमानों का, जो क़ुरआन की व्याख्या को पैग़म्बर के परिजनों के कथनों के परिप्रेक्ष्य में स्वीकार करते हैं, यह मानना है कि यह आयत हज़रत अली अलैहिस्सलाम को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का उत्तराधिकारी बनाने के बारे में उतरी है। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने अंतिम हज से वापस होते समय ग़दीरे ख़ुम नामक स्थान पर हाजियों को रोका और उसके पश्चात वे एक ऊंचे स्थान पर गए और उन्होंने अपने स्वर्गवास के निकट आने की घोषणा करने के पश्चात अपनी पैग़म्बरी के 23 वर्षों में अपने सबसे निकट अनुयायी अर्थात हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी निर्धारित किया और कहाःमन कुंतो मौलाहो फ़हाज़ा अलीयुन मौलाहो अर्थात जिस-जिस का मैं स्वामी और अभिभावक था, मेरे पश्चात अली उसके स्वामी और अभिभावक हैं। फिर आपने कहा जो कोई इस समूह में उपस्थित है वह, अनुपस्थित लोगों तक यह समाचार पहुंचा दे।पैग़म्बर के कथनों के समाप्त होते ही उस समय के बड़े-बड़े मुसलमानों तथा उपस्थित सभी लोगों ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को पैग़म्बर का उत्तराधिकारी बनने की बधाई दी और उन्हें पैग़म्बर के पश्चात अपना अभिभावक स्वीकार किया।कुछ लोगों का कहना है कि पैग़म्बर का तात्पर्य हज़रत अली से मित्रता और प्रेम रखने से था न कि उनकी अभिभावकता तथा नेतृत्व से। स्पष्ट है कि किसी भी मुसलमान को हज़रत अली अलैहिस्सलाम से पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से प्रेम के बारे में कोई संदेह नहीं था कि पैग़म्बर उतने बड़े समूह में और वह भी अपनी आयु के अंतिम दिनों में इस बात पर बल देते तथा उनके बड़े-बड़े अनुयायी इसे हज़रत अली अलैहिस्सलाम के लिए एक बड़ी सफलता मानते।प्रत्येक दशा में इस आयत का उतरना और इसकी विशेषताएं यह दर्शाती हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तरदायित्व, प्रेम और मित्रता की घोषणा से कहीं बढ़कर था। यह बात किसी भावनात्मक विजय से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी। यह विषय इस्लामी समुदाय से संबंधित था और वह भी सबसे महत्वपूर्ण विषय अर्थात पैग़म्बर के पश्चात इस्लामी समाज के नेतृत्व और मार्गदर्शन का विषय।इस आयत से हमने सीखा कि यदि इस्लामी समुदाय का नेतृत्व ऐसे भले लोगों के हाथों में न हो, जिन्हें ईश्वर ने निर्धारित किया हो, तो धर्म का आधार ख़तरे में है।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को जिस बात से चिंता थी वह बाहरी शत्रुओं का ख़तरा नहीं था बल्कि आंतरिक दंगों, विरोधों और उल्लंघनों का ख़तरा था।आइए अब सूरए माएदा की 68वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لَسْتُمْ عَلَى شَيْءٍ حَتَّى تُقِيمُوا التَّوْرَاةَ وَالْإِنْجِيلَ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ وَلَيَزِيدَنَّ كَثِيرًا مِنْهُمْ مَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ طُغْيَانًا وَكُفْرًا فَلَا تَأْسَ عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ (68)(हे पैग़म्बर!) आसमानी किताब वालों से कह दीजिए कि (ईश्वर के निकट) तुम्हारा कोई महत्त्व और स्थान नहीं है, सिवाए इसके कि तौरैत, इंजील और जो कुछ तुम्हारी ओर ईश्वर ने भेजा है, उस पर कटिबद्ध रहो। (हे पैग़म्बर!) निसन्देह, ईश्वर ने जो क़ुरआन आप पर उतारा है (उसका इन्कार) इनमें से अधिकांश के कुफ़्र और उद्दंडता में वृद्धि कर देगा तो आप काफ़िर गुट के लिए दुखी मत होइए। (5:68)पिछले कार्यक्रम में सूरए माएदा की 66वीं आयत में भी इसी आयत के समान बातें कही गई थीं। यह आयत एक बार फिर इस्लाम और मुसलमानों के संबंध में आसमानी किताब वालों की नीतियों का उल्लेख करती है और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को दायित्व सौंपती है कि उनसे कह दें कि केवल हज़रत मूसा और हज़रत ईसा जैसे पैग़म्बरों के अनुसरण का दावा पर्याप्त नहीं है बल्कि वास्तविक ईमान की निशानी सभी व्यक्तिगत व सामाजिक क्षेत्रों में ईश्वरीय आदेशों का पालन है। चूंकि पूरे इतिहास में पैग़म्बरों को भेजना एक ईश्वरीय परंपरा रही है अतः अगले पैग़म्बर को स्वीकार न करना स्वयं एक प्रकार की धार्मिक या जातीय सांप्रदायिक्ता है जो मनुष्य की प्रगति में बाधा और उद्दंडता तथा सत्य छिपाने का कारण बनती है। अतः ईश्वर इस आयत में सभी आसमानी किताबों को स्वीकार करने और उन पर ईमान लाने पर बल देता है और एक बार फिर पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहता है।अधिकांश आसमानी किताब वाले क़ुरआन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं और यही बात तथा विरोध उनके कुफ़्र का कारण है और चूंकि उन्होंने जान-बूझ कर और ज्ञान के साथ इस मार्ग का चयन किया है अतः आप उनके कुफ़्र पर दुखी मत हों कि उनका हिसाब-किताब ईश्वर के हाथ में है।इस आयत से हमने सीखा कि केवल ईमान का दावा काफ़ी नहीं है बल्कि ईमान को व्यवहारिक रूप में सिद्ध करना भी आवश्यक है। जिसके पास कर्म नहीं है वस्तुतः उसके पास धर्म नहीं है।ईश्वर के निकट लोगों का मूल्य और महत्त्व, धार्मिक आदेशों से उनकी प्रतिबद्धता के अनुपात से है। समाज में भी ऐसा ही होना चाहिए और लोगों का महत्त्व तथा स्थान, इसी आधार पर निर्धारित होना चाहिए।हममें अनुचित सांप्रदायिकता नहीं होनी चाहिए। हमें दूसरों की आस्थाओं का भी सम्मान करना चाहिए और अपना मार्ग भी प्रस्तुत करना चाहिए।