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    सूरए माएदा; आयतें 7-11 (कार्यक्रम 164)

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    आइए अब सूरए माएदा की 7वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَاذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَمِيثَاقَهُ الَّذِي وَاثَقَكُمْ بِهِ إِذْ قُلْتُمْ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ(7)और अपने ऊपर ईश्वर की अनुकंपा तथा प्रतिज्ञा को याद करो जिसका वह तुमसे वादा ले चुका है, जब तुमने कहा था कि हमने सुना और मान लिया। और ईश्वर से डरते रहो कि निःसन्देह, ईश्वर दिलों तक की बातें जानने वाला है। (5:7)पिछली आयत में ईश्वर ने खाने-पीने के आदेशों, पारिवारिक समस्याओं तथा नमाज़ और उपवास के कुछ आदेशों का वर्णन किया था। इस आयत में वह कहता है कि यह ईश्वरीय मार्गदर्शन, तुम ईमान वालों पर उसकी सबसे बड़ी अनुकंपा है। तो तुम इसका मूल्य समझो और इस अनुकंपा को याद करते रहो।आपको याद होगा कि इस सूरे की तीसरी आयत में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की ख़िलाफ़त अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी के रूप में उनके निर्धारण की घटना का वर्णन हुआ था जो धर्म की परिपूर्णता और अनुकंपा के संपूर्ण होने का कारण बना। यह आयत भी ईमानवालों को, ईश्वरीय नेतृत्व की महान अनुकंपा का मूल्य समझने का निमंत्रण देते हुए उन्हें सचेत करती है कि तुमने ग़दीरे ख़ुम नामक स्थान पर अली इब्ने अबी तालिब की ख़िलाफ़त के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन सुना और स्वीकार किया था। ध्यान रहे कि इस ईश्वरीय प्रतिज्ञा पर तुम कटिबद्ध रहो और इसे न तोड़ो।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम व ईश्वरीय नेतृत्व की अनुकंपा सभी भौतिक अनुकंपाओं से बड़ी है और इस पर सदैव ध्यान रहना चाहिए।ईश्वर ने बुद्धि, प्रवृत्ति और ज़बान द्वारा सभी मुसलमानों से यह प्रतिज्ञा ली है कि वे उसके आदेशों के पालन पर कटिबद्ध रहेंगे अतः इस मार्ग में की जाने वाली हर कमी, प्रतिज्ञा के उल्लंघन समान है।आइए अब सूरए माएदा की 8वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآَنُ قَوْمٍ عَلَى أَلَّا تَعْدِلُوا اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَى وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ(8)

    हे ईमान वालो! सदैव ईश्वर के लिए उठ खड़े होने वाले बनो और केवल (सत्य व) न्याय की गवाही दो और कदापि ऐसा न होने पाए कि किसी जाति की शत्रुता तुम्हें न्याय के मार्ग से विचलित कर दे। न्याय (पूर्ण व्यवहार) करो कि यही ईश्वर के भय के निकट है और ईश्वर से डरते रहो कि जो कुछ तुम करते हो निसन्देह, ईश्वर उससे अवगत है। (5:8)आपको याद होगा कि इसी प्रकार की बातें सूरए निसा की १३५वीं आयत में भी वर्णित थीं। अलबत्ता उस आयत में ईश्वर ने कहा था कि न्याय के आधार पर गवाही दो चाहे वह तुम्हारे और तुम्हारे परिजनों के लिए हानिकारक ही क्यों न हो। इस आयत में वह कहता है कि तुम अपने शत्रुओं तक के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करो और सत्य तथा न्याय के मार्ग से विचलित न हो। कहीं ऐसा न हो कि द्वेष और शत्रुता तुम्हारे प्रतिरोध का कारण बन जाए और तुम अन्य लोगों के अधिकारों की अनदेखी कर दो। सामाजिक व्यवहार में चाहे वह मित्र के साथ हो या फिर शत्रु के साथ, ईश्वर को दृष्टिगत रखो और यह जान लो कि वह तुम्हारे सभी कर्मों से अवगत है और न्याय के आधार पर दण्ड या पारितोषिक देता है।इस आयत से हमने सीखा कि सामाजिक न्याय केवल ईश्वर पर ईमान और उसके आदेशों के पालन की छाया में ही संभव है।न्याय केवल एक शिष्टाचारिक मान्यता ही नहीं है बल्कि परिवार व समाज में तथा मित्र व शत्रु के साथ जीवन के सभी मामलों में एक ईश्वरीय आदेश है।ईश्वर से भय के लिए जाति व वर्ण संबंधी सांप्रदायिकता से दूरी आवश्यक है और यही द्वेषों तथा शत्रुताओं का कारण बनती है।आइए अब सूरए माएदा की 9वीं और 10वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ (9) وَالَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا أُولَئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ(10)

    ईश्वर ने ईमान लाने और भले कर्म करने वालों से वादा किया है कि उनके लिए क्षमा और महान पारितोषिक होगा (5:9) और जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया और हमारी निशानियों को झुठलाया वे नरक (में जाने) वाले हैं। (5:10)यह दो आयतें इस महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करती है कि ईश्वर के दण्ड और पारितोषिक का आधार, ईमान व कुफ़्र और अच्छे व बुरे कर्म हैं। ईश्वर किसी भी जाति या गुट का संबंधी नहीं है कि उसे स्वर्ग में ले जाए या उसके शत्रुओं को नरक में डाल दे।पिछली आयत में अनेक बार ईश्वर से डरते रहने की सिफ़ारिश की गई। यह आयतें भी कहती हैं कि यदि तुम इन दो बातों का पालन करो तो तुम वास्तव में ईमान वाले हो और स्वर्ग में जाओगे, अन्यथा तुम भी काफ़िरों के साथ नरक में जाओगे।इन आयतों से हमने सीखा कि स्वर्ग और नरक, ईमान वालों तथा काफ़िरों से ईश्वर का वादा है, और उसके वादे अटल होते हैं।भले कर्म, ग़लतियों की क्षतिपूर्ति और क्षमा का भी कारण है तथा ईश्वरीय पारितोषिक प्राप्त करने का भी।आइए अब सूरए माएदा की 11वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ هَمَّ قَوْمٌ أَنْ يَبْسُطُوا إِلَيْكُمْ أَيْدِيَهُمْ فَكَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنْكُمْ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ(11)

    हे ईमान वालो! अपने ऊपर ईश्वर की उस अनुकंपा को याद करो जब (शत्रु के) एक समुदाय ने तुम्हारी ओर (अतिक्रमण का) हाथ बढ़ाने का इरादा किया तो ईश्वर ने उनके हाथों को तुम तक पहुंचने से रोक दिया। और ईश्वर से डरते रहो और (जान लो कि) ईमान वाले केवल ईश्वर पर ही भरोसा करते हैं। (5:11)इस्लाम के इतिहास में ऐसी अनेक घटनाएं घटी हैं जब शत्रु षड्यंत्रों, युद्धों और झड़पों द्वारा इस्लाम का नाम तक मिटा देना चाहता था परन्तु ईश्वर ने सदैव ही अपनी दया व कृपा से मुसलमानों की रक्षा की और शत्रुओं के षड्यंत्रों को विफल बना दिया।यह आयत कहती है कि हे ईमान वालो! सदैव इन ईश्वरीय कृपाओं को याद रखो और जान लो कि इन कृपाओं और अनुकंपाओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का मार्ग ईश्वर से डरते रहना और पापों से बचना है कि जो इन गुप्त ईश्वरीय सहायताओं के जारी रहने का भी कारण है।ईमान वालों को जानना चाहिए कि मानवीय शक्ति पर भरोसा करने और लोगों से डरने या उनके वादों से लोभ के बजाए केवल ईश्वर की अनंत शक्ति पर भरोसा करें और केवल उसी से डरें। इस स्थिति में उन्हें ऐसी शक्ति प्राप्त हो जाएगी कि वे ईश्वर पर भरोसा करके लोगों की सभी झूठी शक्तियों के मुक़ाबले में खड़े हो सकेंगे। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की कृपा और उसकी अनुकंपाओं की याद, मनुष्य से घमण्ड और निश्चेतना को दूर करके उसमें ईश्वर से प्रेम में वृद्धि कर देती है। असंख्य शत्रुओं से मुसलमानों की रक्षा, ईश्वर की सबसे महत्वपूर्ण अनुकंपाओं में से है और ज़बान तथा कर्मों द्वारा इसके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। (7)